कविता - झुंड - शरद चन्द्र श्रीवास्तव         
कविता - झुंड - शरद चन्द्र श्रीवास्तव            झुंड   मै इन दिनों, एक सपना देखता हूँ, एक संपेरा है, उसकी धुन में, ऐसा सम्मोहन है कि, सारे साँप बाबियों से निकल पड़े हैं, वे नाच रहे हैं, मंत्रमुग्ध हैं वे, नेवले डरे हुए हैं, संपेरा बीच-बीच में, नेवलों का शिकार करता है, तमाशबीन भी सम्…
कविता - रिश्ता - शरद चन्द्र श्रीवास्तव 
कविता - रिश्ता - शरद चन्द्र श्रीवास्तव  रिश्ता   जब रिश्ता - कभी रिसता है तो- रिस जाती हैं, बहुत सारी चीजें, सबसे पहले- टूट जाता है भरोसा, जैसे, कही टूट गया हो एक पेड़ एक भरे पूरे कुनबे के साथ, छूट गया हो- एक हाथ, लहरों के बीच संघर्ष करते-करते, ठीक वैसे ही-, जैसे, बहुमंजिला इमारत …
कविता - फर्क नहीं पड़ता - शरद चन्द्र श्रीवास्तव 
कविता - फर्क नहीं पड़ता - शरद चन्द्र श्रीवास्तव    फर्क नहीं पड़ता   मैं कुछ बोलता नहीं, कुछ बोल सकता भी नहीं, खूटी पर टंगा हुआ एक कपड़ा हूँ, जो चाहे पहन ले, चाहे उतारकर टाँग दे, गंदा ही टांग दे, या, गंदा करके टांग दे, या, पूरी तरह धो डाले, फर्क नहीं पड़ता...... इन्सान!! इन्सान मैं…
कविता - नौजवानों के लिए कवि - शरद चन्द्र श्रीवास्तव 
कविता - नौजवानों के लिए कवि - शरद चन्द्र श्रीवास्तव  नौजवानों के लिए कवि   किसी ने कहा बच्चों के लिए शिक्षक होते हैं और नौजवानों के लिए कवि, इसीलिए कविता रचते हुए कांपती है कलम, कसकर थामता हूँ डूबती उतराती अपनी नब्ज, जिससे, नौजवानों को सिखाया गया सबक, ऐसी उलट बांसी न बन जाए कि. नौज…
कविता - खत लिखना चाहता हूँ - शरद चन्द्र श्रीवास्तव 
कविता - खत लिखना चाहता हूँ - शरद चन्द्र श्रीवास्तव  खत लिखना चाहता हूँ   कितना सुख देता है एक वृक्ष होना, वो भी तब, जब सौंपना हो, किसी को अपने गर्भ का फल, जैसे, सौंपती है एक माँ, अपने गर्भस्थ शिशु को, यह जानकर बड़ा ताज्जुब होगा कि- 'वृक्ष हमारे ही सहजात हैं' हम दोनों की निर्…
कविता - बादल जो बरस चुके - शरद चन्द्र श्रीवास्तव
शरद चन्द्र श्रीवास्तव जन्म : 11 मार्च 1972 प्रतापगढ़, जनपद, उत्तर प्रदेश शिक्षा : एम ए, पी-एच डी. (अर्थशास्त्र), अवध विश्वविद्यालय सम्प्रति : सहायक आचार्य, अर्थशास्त्र विभाग, दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर प्रकाशन : अर्थशास्त्र से सम्बंधित विषयों पर आधारित शोध पत्र एवं आलेख विभिन्…
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