आलेख- एक कालजयी रचनाकार : हरिवंशराय बच्चन - हितेश कुमार सिंह

हितेश कुमार सिंह - जन्म : 1 जुलाई 1976 लेखक 'प्रयोग पथ' नामक चर्चित पत्रिका के संपादक और रेलवे विभाग में स्टेशन मास्टर हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं। हिन्दी में एम.ए. की शिक्षा


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मस्ती और अल्हड़पन से मधु के गीत गाने वाले हरिवंश राय बच्चन' २७ नवंबर १९०७ को प्रतापगढ़ जनपद के बाबू पट्टी गांव में एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुए। पिता प्रताप नारायण श्रीवास्तव और माता सरस्वती जी की तीन संतानों (दो पुत्र और एक पुत्री )में से एक थे बच्चन। सन् १९२५ में हाईस्कूल पास कर 'बच्चन' १९२९ में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में बी.ए. पास किया। इसी बीच सन् १९२७ में श्यामा नामक युवती से उनका विवाह हो गयासन् १९३० में कुछ पारिवारिक और तत्कालीन राजनीतिक हलचल के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। अगले कई वर्ष अत्यंत कठिन व विषम परिस्थितियों में बीते। कई विद्यालयों में अध्यापन कार्य करने के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बी.टी. की परीक्षा पास कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुनः प्रवेश लिया। इसी बीच नवंबर १९३६ को उनकी पत्नी श्यामा का देहावसान हो गया, इससे बच्चन को गहरा आघात लगा।


    सन् १९४२ में बच्चन जी ने तेजी से विवाह किया जो लाहौर की रहने वाली थी। तेजी से उनके दो पुत्र अमिताभ और अजिताभ हुए। यद्यपि बच्चन जी सन् १९४७ से ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में बतौर लेक्चरर अध्यापन कर रहे थे। वह साइकिल से ठीक ९.४५ बजे विश्वविद्यालय के गेट पर पहुंच जाते थे। वे अनुशासनप्रिय एवं वक्त के पाबंद थे, विश्विद्यालय से लेकर आवास तक यह देखने को मिलता था। गोया स्टडी का चार्ट बनता था भोर में ४.०० बजने से जागना, क्लाइव रोड वाले घर में आलीशान मेज होने के बावजूद वहां कुर्सी की बजाय स्टूल पर बैठना, उनकी आदत में शुमार था।


  इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बच्चन जी श्री एच. राय के नाम से जाने जाते थे। उन दिनों विश्वविद्यालय में यू.टी. सी.(यूनिवर्सिटी ट्रेनिंग कोर) हुआ करती थी। एच.राय. इसके कैप्टन थे। इन्हीं के नेतृत्व में १९४७ यू.टी.सी. की एक परेड विश्वविद्यालय में हुई थी जिसकी सलामी डॉ. ताराचंद ने ली थी। सन् १९४२ से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कर रहे बच्चन सन् १९५२ में पीएचडी करने कैब्रिज चले गए और 'डब्लू. बी.येट्स एंड आकटलिज्म' पर डॉक्टरेट की डिग्री लीआयरिश कवि येट्स के तंत्रवाद पर अपना शोध कार्य पूरा कर दो वर्ष उपरांत १९५४ में स्वदेश लौटे और फिर अधिक दिन विश्वविद्यालय में नहीं रहे। कुछ समय आकाशवाणी में रहे और फिर १९५५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित 'नेहरू' द्वारा उन्हें हिंदी का विशेषाधिकार बनाकर दिल्ली स्थित विदेश मंत्रालय में नियुक्त किया गया। वहां से सेवानिवृत्त होने पर ६ वर्ष तक राज्यसभा में मनोनीत सदस्य रहे, वहां से कार्यकाल समाप्त होने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उनसे भारत सरकार का हिंदी सलाहकार बनने का अनुरोध किया जिसे बच्चन ने बडी शिष्टता से अस्वीकार कर दिया और अपनी आत्मकथा लिखने में व्यस्त हो गए।


  बच्चन जी ने अपना व्यवस्थित लेखन १९२९ में कहानी से प्रारंभ किया। तीन-चार वर्ष कहानियाँ लिखते रहें, पर जब उनके पहले कहानी संग्रह की पांडुलिपि को 'हिंदुस्तानी एकेडमी' ने लौटा दिया तो उन्होंने उसे फाड़कर रद्दी की टोकरी में डाल दिया। यद्यपि बच्चन जी का प्रथम कविता संग्रह 'तेरा हार' जनवरी १९३२ में प्रकाशित हुआ परन्तु एक कवि के रूप में उन्हें ख्याति दिसंबर १९३३ में मिली जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शिवाजी हाल में मधुशाला का पहली बार सार्वजनिक पाठ किया।


  _ 'मधुशाला' की कहानी भी बड़ा दिलचस्प है; इसके छदा के छपने के लिए बच्चन जी ने 'विशाल भारत' पत्रिका में भेजा परंतु अस्वीकृत कर दी गईश्री नाथ सिंह (संपादक 'सरस्वती') को यह रचना अच्छी लगी तो उन्होंने प्रधान संपादक 'सरस्वती' पं. देवीदत्त शक्ल से सिफारिश की, कि बच्चन को हिंदी साहित्य में स्थान मिलना चाहिए। पं.देवीदत्त शुक्ल नितांत ग्रामीण परिवेश और तिलकधारी स्वरूप में रहते थे। श्री नाथ सिंह को यह बिल्कुल विश्वास नहीं था कि शुक्ल जी इसे 'सरस्वती' पत्रिका में प्रकाशित करेंगे। खैर, शुक्ल जी ने रचना देखने की इच्छा जताई और श्रीनाथ जी से कहा कि बच्चन से कहो कि इसमें से २०-२५ छंद चुनकर दे दें। बच्चन ने यह अधिकार श्रीनाथ जी को दिया, उन्होंने छंद चुने और फिर शुक्ल जी ने टिप्पणी और बच्चन की तस्वीर के साथ पत्रिका में जगह दी। फिर हिंदी साहित्य में 'मधुशाला' की धूम मच गई।


  अब तक लिखे गए साहित्य से 'मधुशाला' एकदम अलग प्रकार की रचना थी। साधारण लोगों ने इसे केवल मदिरा और मदिरालय तक लिया तो वहीं कुछ लोगों ने आलोचना भी की तो कुछ आलोचकों ने 'हालावाद' की संज्ञा दी। परन्तु वास्तव में यह रचना अपने में जीवन के सर्वाधिक गूढ़ रहस्यों को समाए हुए है। हालांकि बाद में यह उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय रचना सिद्ध हुई। देश-विदेश में भी यही बच्चन जी की प्रसिद्धि का हेतु बनी। लगभग ५० वर्षों तक कवि सम्मेलन में अनिवार्य रूप से पढ़ी जाती रही। यद्यपि पाठ्यक्रम का हिस्सा ना होने के बावजूद यह रचना हिंदी जगत में सर्वाधिक बिकने और अपनाए जाने वाले संग्रहों में से एक है। बकौल बच्चन, "मधुशाला' की लोकप्रियता मेरे लिए भी समस्या है। मैं उसे हजारों की सभा में सैकड़ों बार सुना चुका हूं, पर आज भी जब कहीं कविता सुनाने खड़ा होता हूं तो एक सुर में जनता 'मधुशाला' की मांग करती है मेरी पुस्तकों में 'मधुशाला' सबसे अधिक पढ़ी जाती है।"


  __'मधुशाला' तो पूरी लय में लिखी गई पर बच्चन जी उतने ही सात्विक व्यक्ति थे। हाँ यह जरूर है कि इसके प्रकाशन से बुजुर्गवार नाराज हो गए यह कह कर कि 'नौजवानों को खराब कर देगी।' रामवृक्ष 'बेनीपुरी' ने तो यहां तक कहा कि, “अगर बच्चन बिहार में पाँव रखेगा तो मैं उसको गोली मार दंगा।" कारण यह कि उन्हें लग रहा था कि बच्चन अपनी कविता से मदिरापान का प्रचार कर रहे हैं और इस हिंदी के पवित्र नैतिक वातावरण को दूषित करने में लगे हैं। विवाद देखते हुए पूरी कविता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पास भेजी गई। कविता पढ़ने के बाद गांधी जी ने कहा कि नौजवानों को खराब करने या होने जैसी कोई बात नहीं है। यह शाब्दिक मुहर लगते ही 'मधुशाला' को लेकर विरोध शांत पड़ गया।


    सन् १९३६ में 'मधुबाला' प्रकाशित हुई, जिसमें बच्चन' जी ने अपने जीवन का विश्लेषण बड़ी संजीदगी से किया है -


    'मधु कौन यहां पीने आता


    है किसका प्यालों से नाता


    जग देख मुझे है मदमाता--' 


    'मधुकलश' १९३७ में लिखी गई जिसमें सर्वाधिक लोकप्रिय कविता है -


    'तीर पर कैसे रुकू मैं


    आज लहरों का निमंत्रण'


    इस कविता में कवि के मन और हृदय के साहस एवं उत्साह के प्रति अटूट आस्था दिखाई देती है।


    सन् १९३६ में पत्नी श्यामा की मृत्यु के बाद बच्चन के जीवन में उथल-पुथल मच गया। पढ़ने के साथ-साथ उनका लिखना भी बिल्कुल बंद हो गया। वेदना, निराशा एवं एकाकीपन के बीच उनकी व्यथा को अभिव्यक्त करती हुई उनकी तीन रचनाएं प्रकाशित हुईं। प्रथम 'निशा निमंत्रण' (१९३८) जिसमें एकाकीपन की सघन पीड़ा का चित्र है, जिसमें स्वर्गीय पत्नी के प्रति व्यथित पकार की अभिव्यक्ति है


    साथी अंत दिवस का आया


    जग के विस्मृत अंधकार में


    हमें छोड़कर चली गई


    लो दिन की मौन संगिनी छाया


    साथी, अंत दिवस का आया।


    दूसरा 'एकांत संगीत' (१९३९) जिसमें उदासी एवं निराशा और गाढी हो गई तथा तीसरा 'आकुल अंतर' (१९४३) आया जिसमें वेदना और व्यथा जाता है। यही कारण है कि वे अपने काव्य संग्रह 'सतरंगिनी' , (१९४५) में संकटग्रस्तता से मुक्त होने लगते हैं। जीवनसंगिनी के रूप में तेजी बच्चन का प्रवेश एक नए उल्लास और आनंद का अनुभव कराता है- “जिसके तन की विमल कल्पना/ अमित'/कि बन निकलकर/पुलक उठी मेरे आँगन में।"


    सन् १९४६ में 'खादी के फूल', 'बंगाल का काल' और 'हलाहल' लिखी गई, इन तीनों रचनाओं में तत्कालीन सामाजिक विषमता है और जनमानस के संघर्ष और राजनीतिक सरगर्मी से उभरता हुआ राष्ट्रप्रेम दिखाई देता हैयहाँ बच्चन लोक पुरुष के सामने नतमस्तक हुए और समाज की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझने लगे। उनके मन में तरह तरह के प्रश्न उठे पर मानव की विजय में उनका विश्वास और गहरा हो गया। ‘हलाहल' वास्तव में अपनी व्यथा की आधारशिला पर जीवनदर्शन का काव्य है, जिसमें वैचारिक पक्ष भी उतना ही प्रबल होकर उभरा है जितना उनका प्रणय काव्य। साधारण जन के दुख से भी वे उतने ही उद्देलित हैं जितनी अपनी वेदना से।


  ३० जनवरी १९४८ को महात्मा 'गांधी' की हत्या कर दी गई। इस घटना से बच्चन जी बहुत ही व्यथित हुए और उन्होंने गांधी जी के श्रद्धांजलि स्वरूप 'सूत की माला' कविता लिखी-


    "उठ गए आज बापू हमारे


    झुक गया आधा झंडा हमारा'


    'मिलन यामिनी' (१९५०) प्रणय पर आधारित काव्य है, जो दूसरी पत्नी तेजी बच्चन को समर्पित है - 'स्वप्न में तुम हो, तुम्हीं हो जागरण में /कब उजाले में मुझे कुछ और भाया / कब अंधेरे ने तुम्हें मुझसे छुपाया /तुम निशा में और तुम ही प्रात: किरण में/ स्वप्न में तुम हो,तुम्हीं हो जागरण मैं'


    विदेश प्रवास के समय बच्चन जी ने 'प्रणय पत्रिका(१९५५) लिखी। इसका एक गीत देखिए -


    'मैं निराला था, निराले देश आया


    औ निराली ही लिए चाहें उमंगें


    पर मिली खुलकर सलिल-बल्कल नलिनियां ।


    और बाहें खोलकर जल कुंतल तरंगे'


    सन् १९५७ में 'धार के इधर-उधर' नाम से बच्चन जी की एक रचना प्रकाशित हुई जिसमें ! विशेष अवसरों मसलन गणतंत्र दिवस, आजादी की वर्षगांठ, अमित के जन्मदिन पर, ९ अगस्त, भारतीय सैनिकों का प्रणय गीत तथा विशेष मानसिक परिस्थितियों में लिखी गई कविताएं हैं। १९५८ में 'आरती और अंगारे' तथा 'बद्ध और नाचघर' काव्य संग्रह प्रकाशित हुए जिसमें बच्चन जी ने अतुकांत कविताएं लिखी हैं। 'बुद्ध और नाचघर' का एक उदाहरण-


    तुम न समझोगे


    शहर से आ रहे हो


    हम गवारों की बात'


    इसी वर्ष 'जन गीता' भी छप कर आई जिसमें तुलसीदास से प्रेरणा लेकर बच्चन जी ने रामचरितमानस शैली में गीतासार को लोक भाषा में प्रस्तुत किया, 'समुद्र परी नहि पार्थ कहुँ, हरिबानी सविवेक/सचकित दृग प्रभु कहुँ चितई, पूछे प्रश्न अनेक।' १९५७ में बच्चन जी ने औथेलो का हिंदी अनुवाद किया। तो वहीं कवि सुमित्रानंदन पंत पर केंद्रित, जिसमें पंत जी पर लिखे गए कुछ निबंध तथा कुछ पत्रों का संग्रह भी है, जिसे समय-समय पर बच्चन जी को पंत जी द्वारा लिखे गए थे, छपी। सन् १९६० में 'त्रिभगिमा' काव्य संग्रह आया जिसमें उत्तर प्रदेश की लोकधनों पर आधारित गीतों की अधिकता है। सन् १९६२ में 'नए पुराने झरोखे' में लगभग ३० वर्षों में लिखे गए निबंधों एवं वार्ताओं का संकलन है। मसलन प्रेमचंद के साथ मेरी रचना प्रक्रिया, अंग्रेजों के साथ दो साल आदि। इसी वर्ष एक कविता संग्रह 'चार खेमे चौदह खूटे' भी आया जिसे बच्चन ने मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, गया प्रसाद शुक्ल, उदय शंकर भट्ट तथा सियारामशरण गुप्त को समर्पित किया है१९६५ में 'दो चट्टानें' और १९६६ में 'चौसठ रूसी कविताएं' प्रकाशित हुई दर्द जिसमें रूस के चौबीस प्रतिनिधि कवियों की रचनाओं का हिंदी अनुवाद बच्चन ने किया है। स्टालिन के समय की कविताएं, १९१७ अक्टबर क्रांति की कविताएं आदि इसमें सम्मिलित हैं। अलेक्सेई कोल्तस्नोव की कविता 'बुलबुल' का पद्यानुवाद है--


    'इस गुलाब की सुंदरता पर


    यह बुलबुल मदमाती है,


    जब देखो तब उस पर झुककर


    मधुमय गीत सुनाती है'


    ‘बहुत दिन बीते' (१९६७) में अतुकांत कविताएं हैं। सन् १९६८ में 'कटती प्रतिमाओं की आवाज़' संग्रह आया जिसमें समाज से प्रभावित कविताएं हैं जैसे परिवार नियोजन, राजनीति आदि घटनाओं पर। इस संग्रह की एक कविता देखिए -


    _ 'सोना /मरने का रिहर्सल है /जो इंसान हर दिन करता है /पर मौत के स्टेज पर आते डरता है।'


    सन् १९६९ में बच्चन जी की अति लोकप्रिय पुस्तक 'क्या भूलूं क्या याद करूं' आई जिसमें बच्चन जी ने बड़ी सहजता और साफगोई से आत्मचित्रण प्रस्तुत किया है। इसी वर्ष उन्होंने 'हैमलेट' के पद्यानुवाद को पुस्तक रूप में प्रस्तुत किया जो उनके पुत्र अमिताभ को समर्पित है जिसने उनके हिंदी औथेलो के प्रथम प्रदर्शन में कैसियो की भूमिका अदा की थी। 'नीड़ का निर्माण फिर फिर' (१९७०) आत्मकथा में तेजी बच्चन से विवाह आदि की घटनाओं का वर्णन कियागया है। अपने पारिवारिक जीवन में तेजी के लिए उन्होंने सर्वाधिक स्थान सुरक्षित रखा। वह पत्नी से अधिक मित्र, सहायक, माता सब कुछ रहीं। इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है - "तेजी जैसी नारी मेरे जीवन में किसी समय आती, वह मुझ में कुछ ना कुछ परिवर्तन अवश्य लाती। वह जिस समय मेरे जीवन में आई, अपनी कुछ विफलताओं, कुछ निराशाओं, कुछ भूलों, कुछ शूलों के कारण मैं एक अजीब से सिनिकल मूड में था।"


  इसी वर्ष 'भाषा अपनी भाव पराए' पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें . ग्यारह कश्मीरी, दो पंजाबी, एक गुजराती, दो मराठी, एक तेलगु, दो कन्नड़, दो मलयालम, एक तमिल, तीन अंग्रेजी और एक स्पेनी से हिंदी कविता में रूपांतरित कविताएं हैं। सन् १९७२ में 'किंग लीयर' का अनुवाद बच्चन जी द्वारा किया और १९७३ में 'टटी छूटी कड़ियां' निबंधों का संग्रह आया जिसे अपनी पुत्रवधू जया बच्चन को समर्पित किया है। सन् १९७७ में आत्मकथा 'बसेरे से दूर' प्रकाशित हुई जिसमें बच्चन जी ने अपने देश-नगर, घर-परिवार से दूर इंग्लैंड में आयरिश कवि येट्स के साहित्य पर शोध के दौरान प्रवास की डायरी शैली आदि की चर्चा बड़ी गंभीरता के साथ किया है।


    हरिवंश राय बच्चन' के रचना संसार में नितांत मौलिकता एवं व्यापकता है। भौतिक जगत से लेकर आध्यात्मिक जगत तक को अपने पद्य एवं गद्य में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा साहित्य जगत में लोकप्रिय होने के साथ-साथ जनसाधारण में भी लोकप्रिय थी। उनकी रचनाएँ मन को छूने वाले भावों की गहराई से ओतप्रोत यथार्थ के धरातल पर खड़ी हैं। उन्होंने जो भी लिखा बड़ी ईमानदारी से लिखा। बाह्य आडम्बरों एवं मिथ्या से परिपूर्ण समाज में अपने अधैर्य को बगैर छिपाए -


    'मैं छिपाना चाहता तो,जग मुझे साधु समझता,


    शत्रु मेरा बन गया है,छल रहित व्यवहार मेरा'


  और छल रहित व्यवहार करने वाला यह सूर्य दिनांक १८ जनवरी २००३ को अस्त हो गया पर उनका विचार आज भी हमें उर्जा प्रदान कर रहा है और भविष्य में आने वाली पीढियों को भी करता रहेगा।