कविता-  मैं डरता हूँ - आलोक मिश्र
 

कविता-  मैं डरता हूँ - आलोक मिश्र

 

मैं डरता हूँ

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मैं डरता हूं

उस गली से,उस मोहल्ले से , 

उस शहर से, उस गांव से 

उस पहर से

जहाँ कोई चीख रहा है

मगर बहरापन चहुँओर पसरा है

 

हाँ, मैं डरता हूँ

उस कलम से, उस कागज़ से ,

उन बातों से, उस ज्ञान से

उस जुबां से

जो बोलना चाहती है

मगर कंठ में उनके कुछ अटका सा है

 

मैं डरता हूँ.....मैं डरता हूँ

उस साड़ी से, उस दुपट्टे से

उन रीतियों से , उन रिवाज़ों से

उन संस्कारो से

जिनके होते हुए भी ..

कहीँ कोने में दुबके सिसकती है वो ,कराहती है वो

मगर, सबकी आंखे नींद से डबडबायी हुई है

 

मैं डरता हूँ ....उस रिश्ते से , उस नाते से

उन तंत्रो से, उन मंत्रो से

उस व्यवस्था से , उस संस्था से 

जो वायदे करती है

मगर, अपाहिज है

 

हाँ..मुझे डर लगता है

मैं डरता हूँ

इस बहरेपन से

इस गूंगेपन से

इस अंधेपन से

इस डर से।

                      आलोक मिश्र

 


आलोक मिश्र है। फ़िलहाल मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का एम.फिल का विद्यार्थी हूं। मैंने स्नातक और परास्नातक(राजनीति विज्ञान) की शिक्षा काशी हिन्दू विश्विद्यालय से ग्रहण की है। मैं झारखंड के देवघर जिले का रहने वाला हूं। 

 

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