समय-संवेद्य - छायावाद और गाँधीवाद - कमलेश वर्मा

कमलेश वर्मा - जन्म : 24 जून 1974, पटना जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से पी-एच.डी पुस्तकें : काव्य-भाषा और नागार्जुन की कविता; जाति के प्रश्न पर कबीर; निराला काव्य-कोष; दूसरी परम्परा का शुक्ल-पक्ष, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016; प्रसाद काव्य-कोश, द मार्जिनलाइन्ड, नई दिल्ली, 2017 प्रकाशनाधीन : छायावादी काव्य-कोश; 'दूसरी परंपरा का शुक्ल-पक्ष' पुस्तक की भूमिका सम्प्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी, राजकीय महिला महाविद्यालय, सेवापुरी, वाराणसी, उत्तर प्रदेश


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छायावाद की राजनीतिक दृष्टि को गाँधीवाद से जोड़कर प्रायः देखा जाता रहा है। यह मान लिया गया है कि आधुनिक काल के नागरिक के पास कोई न कोई राजनीतिक दृष्टि ज़रूर होती है, इसलिए छायावाद में प्रत्यक्ष राजनीतिक चर्चा न होने के बावजूद मान लिया गया कि उसमें अपने तरीके से राजनीति मौजूद ज़रूर है। नामवर सिंह ने लिखा है, "इसीलिए कुछ आलोचक कहते हैं कि राजनीतिक ढंग से जो कार्य गाँधीवाद ने किया, साहित्यिक ढंग से वही कार्य छायावाद ने किया। इसी बात को वैज्ञानिक ढंग से कहना चाहें तो कह सकते हैं कि बुद्धिजीवी मध्य-वर्ग के नेतृत्व में भारतीय जनता ने अपनी राजनीतिक और सामाजिक स्वाधीनता के लिए जो संघर्ष किया, उसके कई पहलुओं को छायावाद ने सचाई के साथ प्रतिबिंबित किया और यथाशक्ति उसे आगे बढ़ाने में योग भी दिया।११


    छायावाद की राजनीतिक समझ और चेतना को गाँधीवाद से जोड़कर देखा जाता रहा है। ये दोनों समकालीन थे, एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े थेछायावादी लोग गाँधीजी को जानते थे, मगर पक्की बात है कि गाँधीजी छायावाद को लगभग नहीं जानते थे। उन्होंने इधर-उधर से कुछ सुना ज़रूर होगा। रामविलास शर्मा की पुस्तक 'निराला की साहित्य-साधना' के पहले खंड में गाँधी जी से निराला की एक मुलाकात की चर्चा मिलती है, मगर वह मुलाकात उत्साहजनक नहीं थी।


  गाँधीवाद ने 'राजनीतिक ढंग' से जो काम किया, छायावाद ने 'साहित्यिक ढंग से वही काम किया – इस स्थापना की तथ्यात्मक तरीके से जाँच किए जाने की जरूरत है।


  गाँधीजी की राजनीति की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि वह भारत की बहुत बड़ी आबादी को प्रभावित करने की क्षमता रखती थी। छायावाद में ऐसी कोई क्षमता दिखाई नहीं पड़ती है। छायावादी कविता के पाठकों की संख्या का विस्तार इतना कभी नहीं रहा है कि उसकी तुलना गाँधी की स्वीकृति से की जा सके। इस दृष्टि से प्रेमचन्द को गाँधी के ज्यादा नजदीक रखा जा सकता है। यह एक तथ्य है कि प्रेमचंद का कथा साहित्य गाँधीवाद की तरह बहुत बड़ी आबादी तक अपनी पहुँच बनाने में सफल रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि प्रेमचन्द सोद्देश्य लेखन कर रहे थे। वे हिन्दी समाज के मन को बदलने की कोशिश कर रहे थे। गाँधी जी भी भारत की राजनीति को बदल रहे थे और अपने सिद्धांतों के अनुसार एक दिशा दे रहे थे। छायावाद स्वाधीनता की चेतना को व्यक्त तो जरूर कर रहा था, मगर उस अभिव्यक्ति की पहुँच दूर-दूर तक बिल्कुल नहीं थी। 'अरुण यह मधुमय देश हमारा...' को ठीक-ठीक भला कितने लोग समझ पाते होंगे। 'शक्ति की करो मौलिक कल्पना...' का मर्म कितने लोग आज भी समझ पाते होंगे! यह बात तो तय है कि छायावाद के प्रसार का दायरा गाँधीवाद की तुलना में बहुत छोटा था।


  गाँधीवाद ने सत्य और अहिंसा को अपना मूल आधार बनाया था। उन्होंने अपने आन्दोलनों को इन दोनों के आधार पर दिशा दी थी। अहिंसा का पालन न हो पाने पर उन्होंने फैल चुके आन्दोलन को वापस ले लिया था, जबकि उनके समर्थक चाहते थे कि आन्दोलन आगे बढ़े। संघर्ष भी हो और 'अहिंसा' भी बनी रहे – यह एक कठिन काम है। संघर्ष भी हो और 'सत्य' कभी धुंधला भी न हो - यह भी एक कठिन काम है। मगर गाँधीवाद इन्हीं कठिन सिद्धांतों पर टिका हुआ था। गाँधी जी ने अपनी तरफ से इन दोनों कसौटियों पर अपनी कार्य-योजनाओं को कसते रहने का प्रयत्न हमेशा किया। उन्होंने सिद्धांतों को जाँचने का आधार व्यवहार को बनाया। उनसे उनके सिद्धांतों के बारे में जब भी पूछा गया, उन्होंने यह बात जरूर कही कि मेरा आचरण और मेरे कामों को ही मेरा सिद्धांत माना जाए!


  छायावाद 'सत्य' और 'अहिंसा' के प्रति गाँधीवाद की तरह आग्रही नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं लगाना चाहिए कि छायावाद 'सत्य' के महत्त्व को नहीं समझता या वह हिंसा को बढ़ावा देने में विश्वास करता है अथवा वह युद्धोन्माद को पसंद करता है। जयशंकर प्रसाद के नाटकों में नायकत्व-प्राप्त पात्र भी 'सत्य' के आग्रही नहीं है। वे प्रशस्त पुण्य-पंथ' पर ही चलते हैं, मगर 'सत्य' उनकी प्रक्रियाओं का तकनीकी हिस्सा नहीं है। 'चन्द्रगुप्त' नाटक का प्रमुख पात्र चाणक्य झूठ और भ्रम का सहारा लेता है। 'ध्रुवस्वामिनी' नाटक में शकराज को मारने के लिए झूठ और भ्रम को ही आधार बनाया गया है। यही तकनीक इनकी कथावस्तु का 'टर्निंग पॉइंट' है। गाँधीवाद की स्थिति इससे उलट है। आज तक ऐसा कोई आरोप सामने नहीं आया जिससे पता चले कि गाँधीजी ने किसी भी मामले में अपने प्रतिपक्षी अंग्रेजों से भी 'झूठ' या 'भ्रम' का व्यवहार किया हो! उन्होंने संघर्ष करते हुए 'सत्य' का दामन कभी नहीं छोड़ा।


  यही स्थिति 'अहिंसा' की है। जयशंकर प्रसाद के नाटकों में भारत के प्राचीन काल के इतिहास को आधार बनाकर यह संदेश दिया गया है कि भारतीयों ने विदेशी आक्रान्ताओं को बाहर खदेड़ भगाने में सफलता पाई थी। विदेशी आक्रान्ताओं से संघर्ष का स्वरूप युद्ध और हिंसा से बना हुआ था। प्रसादजी ने 'चन्द्रगुप्त', 'स्कन्दगुप्त', 'ध्रुवस्वामिनी' आदि नाटकों में युद्ध-आधारित संघर्षों को मर्यादित व्यवहार के साथ चित्रित किया है। पौराणिक ग्रंथों में युद्ध की जिन मर्यादाओं का उल्लेख मिलता है, उनका पालन करने की चर्चा इनमें मिलती है। 'स्कन्दगुप्त' नाटक में एक जगह स्कन्दगुप्त कहता है कि मैं स्त्रियों पर शस्त्र नहीं उठाता। स्त्रियों पर शस्त्र नहीं उठाना, एक तरह की मर्यादा है। निराला की कविता 'जागो फिर एक बार', 'महाराज शिवाजी का पत्र' आदि में युद्ध-वीरता को महत्त्व दिया गया है। युद्ध की पृष्ठभूमि के कविताओं में मिलने जा याद कई प्रसंग प्रसाद और निराला की की मर्यादा के साथ युद्ध का पक्ष लिया गया है। 'राम की शक्तिपूजा' का संदेश चाहे जिस दिशा में जाए, मगर एक बात तो सच है कि इसकी कथा-वस्तु में युद्धवीरता की प्रमुखता है। इस कविता में 'शक्ति-पूजा' का लक्ष्य रावण पर राम की विजय का ही है और इस विजय का स्वरूप युद्ध से ही जुड़ा है। यह सही है कि छायावादी साहित्य में युद्ध के ब्योरे क्रूर और हृदय विदारक नहीं हैं। इनमें ब्योरे की जगह सांकेतिकता की प्रधानता है, मगर गाँधीवाद सांकेतिक हिंसा का भी पक्ष नहीं लेता है। इस तरह गाँधीवाद के 'सत्य' और 'अहिंसा' को छायावाद में उसी तरह से व्यक्त होते हुए नहीं देखा जा सकता है.


     यह बात ठीक है कि छायावाद की समय-सीमा (१९१८-३६) स्वतंत्रता आन्दोलन का एक महत्त्वपूर्ण दौर है और इसकी रचनाओं में इस आन्दोलन की अनुगूंज सुनाई पड़ती है। लाक्षणिक वक्रता की प्रमुखता के कारण स्वतंत्रता की चेतना अप्रत्यक्ष रूप में ज्यादा दिखाई पड़ती है। छायावाद के आलोचकों ने स्वतंत्रता की चेतना को छायावाद की एक प्रमुख प्रवृत्ति के रूप में रेखांकित किया है, जिसके प्रमाण भी दिए गए हैं। मगर, इस बात को


भूलना नहीं चाहिए कि स्वतंत्रता आन्दोलन में अनेक विचारधाराएँ शामिल थीं। इन विचारधाराओं की राजनीति भी अलग-अलग थी। गाँधीवाद से भिन्न प्रकार की राजनीति में विश्वास रखनेवालों के महत्त्व को भी स्वीकार किया जाना चाहिए। क्रांतिकारी विचारों और गतिविधियों से गाँधी जी की सहमति नहीं थी, मगर भगत सिंह और उनके साथियों की भूमिका को सबने स्वीकारा है। १९२५ के बाद वामपंथी और हिन्दू दक्षिणपंथी राजनीति भी स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल हो गई थी। मुस्लिम दक्षिणपंथी तो पहले से सक्रिय थे ही। इन सभी धाराओं के बीच सहमति भले न हो, मगर ये सब लोग अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे थे। स्वतंत्रता आन्दोलन का स्वरूप एकरेखीय नहीं था, बल्कि आपसी अंतर्विरोध के साथ इन सबमें एक प्रकार सह-अस्तित्व था। छायावाद में यदि स्वतंत्रता आन्दोलन कीअनुगूंज खोजनी हो, तो इस खोज को गाँधीवाद तक सीमित कर देना क्या उचित होगा?


    यह भी देखना चाहिए कि चारों छायावादी कवियों पर गाँधीवाद का प्रभाव किस प्रकार का था! क्या ये कवि गाँधीवाद से सीधे जुड़े हुए थे या इस प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल थे? प्रसाद, निराला और महादेवी के बारे में स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि छायावाद के दौर में इनका सम्बन्ध गाँधी जी या काँग्रेस से प्रत्यक्ष रूप से नहीं थापंत ने गाँधी जी के आंदोलनों के प्रभाव में अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। उन्होंने छायावाद के बिल्कुल अंतिम दौर में अप्रैल, १९३६ में एक कविता लिखी थी – 'बापू के प्रति', जो 'युगांत' में संकलित है। इसमें गाँधी जी के प्रति श्रद्धा निवेदित की गई है और उनके महत्त्व को रेखकित किया गया है। सारांश यह है कि छायावादी कवियों ने स्वतंत्रता आन्दोलन को व्यक्त तो किया है, मगर उनका व्यक्तिगत सम्बन्ध गाँधी जी या काँग्रेस से कम ही था।


    गाँधी जी ने सर्व-धर्म-समभाव पर जोर दिया था। उनका विचार था कि सभी धर्मों का अस्तित्व बना रहे और वे परस्पर मेल-मिलाप से रहें। धार्मिक दृष्टि से जो बहुसंख्यक हैं उनका कर्त्तव्य है कि वे अल्पसंख्यक की रक्षा करें। गाँधी जी ने अपने इस विचार का इस हद तक जाकर पालन किया कि अंततः यही उनकी हत्या का कारण बना! वे भारत में मुसलमानों की रक्षा चाहते थे और पाकिस्तान में हिन्दुओं की! छायावाद में निर्बल की रक्षा का भाव तो है, जिसका आधार मनुष्यता है। मगर यह एक सामान्य भाव है जो दूसरे दौर की रचनाओं में भी प्रायः मिल जाता है। यहाँ प्रश्न हिन्दूमुसलमान की परस्पर रक्षा का है। 'महाराणा का महत्त्व' में ऐसी कथावस्तु अपनाई गई है। मगर हिंदूवादी पुनरुत्थान का भाव प्रसाद और निराला में मिल जाता है, जहाँ उनका झुकाव हिन्दुओं की तरफ है और मुसलमानों के प्रति नकारात्मकता का भाव है। 'महाराज शिवाजी का पत्र' शीर्षक कविता में निराला लिखते हैं,


    "मुट्ठी-भर मुसलमान


    पले आतंक से हैं


    भारत के अंक पर१२


    एक चिट्ठी लिखी थी शिवाजी ने 'मिर्जा राजा जयसिंह के नाम'। उस चिट्ठी के भाव को इस कविता का आधार बनाया था निराला ने! 'श्रीकृष्ण संदेश' नामक पत्रिका में शिवाजी की इस चिट्ठी को अनूदित करके प्रकाशित किया गया था, जिससे प्रेरित होकर निराला ने यह कविता लिखी थी। उन्होंने इस कविता के साथ की गई टिप्पणी में लिखा है, "पत्र के भावों पर मैंने स्वयं भी अर्थों के अनुसार कल्पना की है।''३ ऊपर की पक्तियों में निराला ने यही कल्पना की है कि मुट्ठी-भर मुसलमान भारत में आतंक फैला रहे हैंऔर सुनिए,


    "और भी कुछ दिनों तक


    जारी रहा ऐसा यदि अत्याचार, महाराज,


    निश्चय है, हिन्दुओं की


    कीर्ति उठ जाएगी -


    चिह्न भी न हिन्दू-सभ्यता का रह जाएगा।


    इन दोनों अंशों में जिस तरह की चिंता प्रकट की गई है, निश्चित रूप से उसका सम्बन्ध गाँधीवाद से नहीं है। इस तरह के विचारों का सम्बन्ध दक्षिणपंथी राजनीति से है। इसका अर्थ यह नहीं है कि निराला का जुड़ाव दक्षिणपंथी राजनीति से था। वे कभी भी इस राजनीति के पक्ष में नहीं रहे। इसके बावजूद यह तो कहा ही जा सकता है कि इस कविता में जो भावबोध मौजूद है, उसका सम्बन्ध गाँधीवाद से न होकर दक्षिणपंथी राजनीति से है। 'तुलसीदास' में जो सांस्कृतिक चेतना प्रकट की गई है, उसका सम्बन्ध भी इसी ' तरह की राजनीति से जुड़ता है।


    रामविलास शर्मा ने 'निराला की साहित्य-साधना' के दूसरे खंड में एक अध्याय रखा , 'राष्ट्रीय एकता और मुसलमान'। इस अध्याय में निराला के कई गद्य कथन रखे गए हैं, जिनके आधार पर रामविलास जी का निष्कर्ष है कि "समाज में ऊँच-नीच का भेद मिटाकर, अंधविश्वास और रूढ़ियों से मुक्त होकर व्यापक मानवतावाद की भूमि पर हिन्दू और मुसलमान अपनी राष्ट्रीय एकता दृढ़ कर सकते हैं – निराला की शिक्षा का यह सारतत्त्व था।"


    निराला के साहित्य में यदि दोनों तरह की बातें मिलती _ हैं तो दोनों को स्वीकार करना चाहिए। रामविलास जी ने इसी पुस्तक में 'गांधीवाद-छायावाद' शीर्षक से एक अध्याय रखा है, जिसमें गाँधीवाद और निराला के विचारों में निहित असमानताओं पर बात की गई है।


    ___ गाँधी जी की पुस्तक 'हिन्द स्वराज्य' १९०९ में पहली बार छपीइस पुस्तक में 'स्वराज्य' पर विचार किया गया है। इस पुस्तक का चौथा अध्याय है - 'स्वराज्य क्या है?' इसमें गाँधी जी का निष्कर्ष है कि 'स्वराज्य' का अर्थ एक ऐसे देश से है जहाँ हमारा ख्याल रखा जाता हो। जरूरी नहीं है कि उस देश के शासक हमारे देश के लोग ही हों। वे एक प्रश्न के उत्तर में कहते हैं, “मान लीजिए कि हम माँगते हैं, उतना सब अंग्रेज हमें दे दें, तो फिर उन्हें (यहाँ से) निकाल देने की जरूरत आप समझते हैं?१६ इसी क्रम में वे आगे कहते हैं, "अगर वे धन बाहर न ले जाएँ, नम्र बन जाएँ और हमें बड़े ओहदे दें, तो उनके रहने में आपको कुछ हर्ज है?१७ यह पुस्तक इस बात पर जोर देती है कि 'स्वराज्य' का अर्थ एक ऐसे देश से है जहाँ के वासी यह महसूस कर सकें कि यह मेरा देश है। वे महसूस कर सकें कि जो लोग उनके शासक हैं, वे उनकी वास्तविक चिंता करते हैं। शासक के व्यवहार और व्यवस्था से यह प्रकट होगा कि देशवासी 'स्वराज्य' में रह रहे हैं या नहीं? गाँधी जी इस पुस्तक में 'स्वराज' की चिंता नहीं करते। वे ऐसा नहीं कहते कि अंग्रेज चले जाएँ और भारतीय लोग शासक बन जाएँ। भारतीयों को शासक बनाने की चिंता का सम्बन्ध 'स्वराज' से है और भारतवासियों को एक सुंदर देश प्रदान करने की चिंता 'स्वराज्य' है। स्वतंत्रता आन्दोलन से इतनी दूरी तय कर लेने के बाद हमलोग इतना तो समझ ही चके हैं कि 'स्वराज' से बहुत बड़ी चीज़ है 'स्वराज्य'। 'स्वराज' तो हमें मिल चुका है, मगर भारत में अनेक सामाजिक समूह ऐसे हैं जिन्हें आज भी 'स्वराज्य' नहीं मिला है। 'स्वराज' के बावजूद यह 'स्वराज्य' मिलता-छिनता रहा है।


    गाँधी जी की यह पुस्तक 'हिन्द स्वराज' के नाम से भी छपी है, मगर अनुवाद के क्रम में यह बात धुंधली कर दी गई कि १९०९ की यह पुस्तक 'स्वराज' की बात नहीं करती, बल्कि 'स्वराज्य' की बात करती है। 'स्वराज' होने से 'स्वराज्य' की गारंटी नहीं मिल जाती।


    जयशंकर प्रसाद के 'चन्द्रगुप्त' (१९३१) नाटक में चाणक्य का एक संवाद तक्षशिला के राजकुमार आम्भीक के प्रति है, "राजकुमार, ब्राह्मण न किसी के राज्य में रहता है और न किसी के अन्न से पलता है; स्वराज्य में विचरता है और अमृत होकर जीता है। इस संवाद के सन्दर्भ को ठीक से समझने के लिए इसके ठीक पहले कहे गए आम्भीक के संवाद को भी देखना होगा, “(क्रोध से) बोलो ब्राह्मण, मेरे राज्य में रहकर, मेरे अन्न से पलकर मेरे ही विरुद्ध कुचक्रों का सृजन!१९ इस नाटक में ब्राह्मण-बौद्ध-संघर्ष को भी जगह मिली है। इसमें सत्ता बौद्धों के पास है और शर- संधान के लक्ष्य पर हैं ब्राह्मण! सत्ता के दमन का शिकार यहाँ ब्राह्मण हैं। ऐसी स्थिति में चाणक्य का यह संवाद प्रेरक है कि स्वतंत्रता की चेतना का मतलब है 'स्वराज्य' में विचरण करना। पराधीन और प्रताड़ित के मन में स्वतंत्रता की चेतना तो होनी ही चाहिए। प्रसाद के नाटकों की वर्णाश्रमी भाषा का अर्थ वर्णाश्रमी रूप में निकालने पर हम बीच में ही अटक कर रह जाएंगे। 'ध्रुवस्वामिनी' में भी एक पात्र है 'पुरोहित'। उसका एक संवाद है, "ब्राह्मण केवल धर्म से भयभीत है। अन्य किसी भी शक्ति को वह तुच्छ समझता है। तुम्हारे बधिक मुझे धार्मिक सत्य कहने से रोक नहीं सकते।"१० इस तरह के संवादों की भाषा निश्चित रूप से वर्णाश्रमी है, मगर इसी दिशा में अर्थ लगाने पर प्रसाद का दायरा संकुचित हो जाएगा। ब्राह्मणवाद के विरोधी या समर्थक इसका अर्थ ब्राह्मण जाति तक ले जाकर पूरा मान लेंगे और वे प्रसाद की निंदा या प्रशंसा करके समझ लेंगे कि वे सही विश्लेषण तक पहुँच गए हैं।


  इस आलेख के सन्दर्भ में यहाँ विचारणीय शब्द है 'स्वराज्य'। गाँधी जी और प्रसाद के 'स्वराज्य' के अर्थ में एक तरह की एकता दिखाई पड़ती है। दोनों मानते हैं कि 'स्वराज्य' का नागरिक स्वतंत्रता को अपने सही अर्थ में महसूस करते हुए जीवनयापन करेगा। 'चन्द्रगुप्त' और 'धूवस्वामिनी' में जिस सत्ता के खिलाफ संघर्ष है वह 'स्वराज' ही हैदोनों नाटकों के शासक भारतीय हैं, मगर पूरा नाटक उस 'स्वराज' के खिलाफ खड़ा है और 'स्वराज्य' के कायम होने की कार्य-योजना पर काम करता है। स्वयं गाँधी जी देश की आजादी के बाद सरकार से अलग जाकर जनता की समस्याओं के निवारण के लिए सक्रिय थे। वे मिले हुए 'स्वराज' में समस्याओं का समाधान नहीं देख रहे थे, इसलिए 'स्वराज्य' की कामना से आंदोलनरत थे ताकि वंचित भारतीयों को अपने देश में होने का एहसास हो सके।


  छायावाद को गाँधीवाद का साहित्यिक संस्करण कहना ठीक नहीं है। इसके कवियों का व्यक्तित्व विशिष्ट है। उन्हें राजनीति के किसी एक पंथ में बाँध कर नहीं देखा जा सकता है। वे स्वतंत्रचेता हैं, इसलिए देश-दुनिया, समाज और मनुष्य के बारे में उनकी दृष्टि में विविधता और भिन्नता मिलती है। वे इतने सजग हैं कि स्वतंत्रता की कामना के विविध रूपों को अपनी कविताओं में व्यक्त करने में सफल हुए हैं। इन रूपों को आप राजनीतिक भाषा में ठीक-ठीक रूपांतरित नहीं कर सकते हैं। इसी तरह गाँधीवाद केवल विचार नहीं है, वह राजनीति को जनता के बीच में ले जाने की चुनौती स्वीकारता है। उसे मूढ़ जनता के बीच जाकर भी अपने आदर्शों को मनवाना है। यह काम आसान नहीं है।


  दोनों को जनता की चिंता है, मगर एक को जनता के बीच बार-बार जाना है और दूसरे को जनता के काम की बात कहने की जिम्मेदारी है। दोनों की कार्य-प्रणाली में अंतर है, इसलिए समानधर्मा होने के बावजूद इनमें स्पष्ट अंतर दिख जाना अस्वाभाविक नहीं है। हिन्दी आलोचना को इस प्रवृत्ति पर फिर से विचार करना चाहिए कि साहित्य को राजनीतिक विचारों से जोड़ कर व्याख्या-दर-व्याख्या करते जाने में साहित्य का कितना कुछ उपेक्षित हो जाता है! छायावाद के साथ भी यही हुआ। वह गाँधीवाद को व्यक्त करने वाला साहित्य कभी नहीं रहा। ठीक इसी तरह, प्रेमचंद का साहित्य मार्क्सवाद को व्यक्त करने के लिए नहीं लिखा गया था। यहाँ उल्लेखनीय है कि गाँधीवाद और मार्क्सवाद को व्यक्त करने वाली रचनाओं की भी कमी नहीं रही है, मगर इनके रचयिता दूसरे लेखक थे।


                                                 सम्पर्क : A-20, संधिनी, त्रिदेव कॉलोनी, चाँदपुर, वाराणसी-221106, उत्तर प्रदेश ___मो.नं. : 9415256226


सन्दर्भ


१. छायावाद - नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, १९९३, पृ. ७२


२. निराला रचनावली-१, सं.- नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, १९९८, पृ. १६५


३. वही, पृ. १५६


४. वही, पृ. १६५


५. निराला की साहित्य-साधना-२, रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, १९९४, पृ. ५९


६. हिन्द स्वराज्य - अनुवाद - अमृतलाल ठाकोरदास नाणावटी, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, राजघाट, वाराणसी, १९९६, पृ. २८


७. वही, पृ. २९


८. जयशंकर प्रसाद ग्रन्थावली-४, सं.- ओमप्रकाश सिंह, प्रकाशन संस्थान, दरियागंज, नई दिल्ली, २०१४, पृ. १८०


९. वही, पृ. १८०


१०. वही, पृ. ३६५