लघुकथा- सहयोगी - सविता मिश्रा 'अक्षजा'

लघुकथा- सहयोगी - सविता मिश्रा 'अक्षजा'


 


सहयोगी



अपनी लाड़ली बिटिया की शादी निश्चित न हो पाने की वजह से परेशान सुमन अपने पति से कह उठी, "घर-वर खोजने में कितना परेशान हो रहे हो, न जाने लाड़ली का भाग्य कहाँ सोया है ?" भाग्य अपनी प्रशंसा सुनकर गदगद हो गया।
 "वर खोजने के लिए शहर-शहर भटकना पड़ता है, पर तुम हो कि पंडितों की बातों में आ जाती थी।" पति ने शिकायती लहजे में पत्नी से बोला।
"बात तो ठीक कह रहे हो, किंतु उसका भाग्य..!”
कोने में खड़ा कर्म पति-पत्नी के मुख से अपनी महिमा सुन ठठाकर हँस पड़ा।
"अब देखो! वर खोजने निकला हूँ तो कहीं वर अच्छा मिलता है तो घर नहीं, घर अच्छा तो परिवार संस्कारी नहीं। बहुत भटकने के बाद एक अच्छा लड़का मिला है, परिवार भी बहुत ही सुसंस्कारी है। लेकिन अपना घर नहीं है उनके पास। किराए के दो कमरे में सब एक साथ रहते हैं।
सुनकर भाग्य ने हेय दृष्टि कर्म पर डाली। कर्म नजरें झुकाए खड़ा था।
"उसके भाग्य में यही लिखा है तो यही सही..!” सुमन ने कहा।
 सुनकर कर्म की निगाहें तिरछी हुई।
 "जितना बड़ा उनका एक कमरा है, उतना बड़ा तो मेरी बिटिया का स्टडीरुम है !" मायूस पति सुमन की आँखों में झांकता हुआ बोला।
पति के मुख से सारा वितांत सुन सुमन भी चिंतित होकर बोली "क्या अपनी लाडो वहाँ एडजस्ट कर लेगी ?”
पति-पत्नी की वार्ता सुनते ही लड़की के भाग्य की स्तिथि देखकर कर्म सीना तान फिर से मुस्कराने लगा।
"मैं भी सोच रहा हूँ, कैसे रहेगी अपनी लाडो वहाँ! कहो तो मना कर दूँ ?" पति सुमन की तरफ प्रश्नवाचक दृष्टी डालते हुए बोला।
यह सुनकर भाग्य, कर्म की ओर देखकर कुटिल हँसी हँस पड़ा।
"चिंता न करो 'जजमान', रह लेगी और ख़ुशी से रह लेगी।"  दरवाजे पर आकर पंडित जी ने गर्व से कहा।
"पंडित जी! आप बड़े अच्छे मौके पर आए हैं, आपको फोन करने ही वाले थे हम। कहाँ-कहाँ नहीं गया परन्तु बिटिया के लिए अच्छा-सा घर-वर नहीं मिल पा रहा है।" पंडित जी को प्रणाम करता हुआ पति बोला।
कर्म शांत था लेकिन भाग्य हँस रहा था।
"अभी तक आप घर बैठे हर तरह से अच्छा रिश्ता मिल जाए, ऐसा चाह रहे थे। इसलिए विलम्ब हो रहा था! अब देखिए आप बाहर निकले, खोजे चारों तरफ तो अच्छा रिश्ता मिल ही गया न!"
 पति-पत्नी की बातें सुनकर घर के कोने में जो भाग्य और कर्म आपस में ही तनातनी कर रहे थे वो चुप्पी साध अपने-अपने कानों को पंडित जी की ओर लगा दिए।
"कहाँ पंडित जी! उनके पास तो रहने की जगह ही नहीं है!” दोनों पति-पत्नी एक स्वर में बोल पड़े।
"बिटिया और इसका होने वाला पति दोनों कर्मशील प्राणी हैं। कुंडली के हिसाब से इसके भाग्य पर भरोसा रखिए आप! घर को बंगला बनते देर नहीं लगेगी। भाग्य कितना भी बढ़िया हो किन्तु बिना कर्म के अर्थहीन है और कर्म कितना भी किया जाय परन्तु भाग्य में हो ही न, तो फिर कैसे मिलेगा कुछ?"
पंडित जी की बात सुनते ही भाग्य और कर्म दोनों आलिंगन बद्ध हो मुस्कराने लगे।
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                                                               सविता मिश्रा 'अक्षजा', देवेन्द्र नाथ मिश्रा (पुलिस निरीक्षक )                                                                 फ़्लैट नंबर -३०२, हिल हॉउस,खंदारी अपार्टमेंट, खंदारी,


                                                                   आगरा २८२००२, फोन नं0-09411418621
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