कविता  - तुमसे अलग होना, हजार बरस पुरानी नदी का सूख जाना है -  मोहन कुमार झा, 

तुमसे अलग होना, हजार बरस पुरानी नदी का सूख जाना है


 


तुम्हारे साथ चलते हुए मैंने जाना कि


मुझे तुम्हारे साथ उसी तरह चलना चाहिए


जिस तरह नदियों में नावें चलती हैं।


तुम्हारे साथ बात करते हुए मुझे महसूस हुआ कि


मुझे तुमसे उसी तरह बात करनी चाहिए


जिस तरह कबूतरों का जोड़ा आपस में बात करता है।


तुम्हारे साथ रहते हुए मैंने सीखा कि


मुझे तुम्हारे साथ उसी तरह रहना चाहिए


जिस तरह एक मौसम दूसरे मौसम के साथ रहता है


 


तुमसे प्रेम करते हुए मुझे ज्ञात हुआ कि


तुमसे प्रेम न करना,


तुमसे प्रेम करने से ज्यादा मुश्किल है।


तुमसे घृणा करना,


अपने अस्तित्व से इनकार करना है


तुमसे अलग होना


हजार बरस पुरानी नदी का सूख जाना है


और तुमसे रुठ जाना


अपनी जिन्दगी यम को समर्पित कर देना है


 


तुम कौन हो?


मेरी माँ,


मेरा गाँव,


आखरी दोस्त,


पहली प्रेमिका,


सबसे पुराना शहर,


या मेरी कोई आदिम इच्छा?


कौन हो तुम?


 


मेरा हर स्वप्न तुम्हारे विना अधूरा है


तुम मेरे लिए


जीवन के अंतिम क्षण की स्मृति की तरह हो


तुमसे आरंभ में मिलन हो ही नहीं सकता


 


मैं प्रतीक्षारत् हूँ,


समय जो भी निर्णय करेगा


मुझे मंजूर होगा


मैं नियति के चक्र में फंसा मनुष्य हूँ


मेरे वश में न समय है और न तुम !


                                                                                                                                       सम्पर्क : मोहन कुमार झा, अररिया, बिहार