भिखारी ठाकुर : कला में अभिव्यक्त संघर्ष और समाज - जुगेश कुमार गुप्ता

                          भिखारी ठाकुर : कला में अभिव्यक्त संघर्ष और समाज - जुगेश कुमार गुप्ता


                        कलाकार किसी भी जाति, धर्म या संप्रदाय से बड़ा होता है क्योंकि जब वह अभिनय करता है तब उसके सामने हर छोटा- बड़ा व्यक्ति नतमस्तक होकर उसके द्वारा उभारे गए रंगों में सराबोर होकर अपना स्व भूल जाता है, और उसी के अनुरूप खुद का तादात्म्य स्थापित कर लेता है। भिखारी ठाकुर उन्हीं बिरलों में से हैं जिन्होंने अपने कला के माध्यम से आम जनता का मनोरंजन तो किया ही साथ ही अपने वृहत उद्देश्य के साथ समाज में फैली कुरीतियों पर नाटकीय ढंग से प्रहार किया और एक समाज सुधारक की अहम भूमिका अदा की। उन्होंने लोगों को हँसाया भी और रुलाया भी। जीवन के विभिन्न संदर्भों को लोक रंगमंच की भावभूमि से आत्मसात किया और जनता को उसी रूप में सौंप दिया। क्षेत्रीय भाषा का एक अमर गायक जिसने जीवन के आखिरी पड़ाव तक सीखना जारी रखा और निरंतर परिवर्तन को स्वीकार किया। उम्र के ढलान पर कला का निखार बढ़ता ही गया। "अपनी श्रेष्ठता के गुरूर में ऐंठी हवेलियाँ, ड्यौढ़ियाँ जहाँ न्यौता लेकर आने पर भिखारी ठाकुर को कोई पानी तक न पूछता, बैलगाड़ियों पर मखमली ओहारों की सम्पनियों में बैठी राजमाताएँ, उनकी बहुएँ, बेटियाँ जो उनका नाच देखने आती हैं।"


                         किसी भी कला में यह सिखाया जाता है कि जब उसकी प्रस्तुति होनी होती है उस दौरान अगर किसी के परिवार में कुछ अनहोनी हो जाए या आवश्यक कार्य पड़ जाए तब भी वह उसे छोड़कर नहीं जा सकता। क्योंकि उस दौरान अगर वो बीच में चला जाएगा तो लोगों का परस्पर मनोबल कम हो जाएगा साथ ही अगर सामूहिक है तब एक दूसरे से तादात्म्य स्थापित करने में मुश्किलें आ जाएंगी। उससे भी आगे एक कलाकार का कार्य उसकी कला से बढ़कर और कुछ नहीं होता है, कला के जरिए अपने दुःख दर्द को बयां करता है। यही हुआ जब भिखारी ठाकुर की पत्नी मनतुरना देवी का प्लेग से देहांत हुआ, उन्होंने एक सच्चे कलाकार के तौर पर अपना सही स्थान चुना। दूसरी घटना तब हुई जब भिखारी के बहुत ही घनिष्ठ मित्र रामानंद सिंह जी जो भिखारी की कविताओं के पहले श्रोता बनते थे, की मृत्यु हुई, उस समय भी वो उस प्रांत से दूर कहीं पर खेमा लगाकर कर अपनी साधना में लीन थे। भिखारी ने जब अपनी साधना शुरू की तब इस काम से सबको घृणा होती थी, खुद भिखारी ने कई साल तक इसे छिपा कर रखा लेकिन एक कलाकार कब तक अपने जज्बात को दबा सकता है-


" अपना अन्दर जौन कला के भूँख बा, ओकरा संग नियाव करीं।"


                          भिखारी ठाकुर को प्रभावित करने वाले कई व्यक्ति थे, जिनमें उनके सबसे प्रिय मित्र रामानंद सिंह थे जिन्होंने अपने जीते जी भिखारी की हर तरह से मदद की, कभी जातिगत द्वेष से नहीं रखा। हमेशा एक अच्छे सलाहकार की भूमिका निभाकर एक सच्चे कलाकार को सवारने का काम किया -


"कोई- कोई रचना लेखक के मन में लिखी जाने के बाद भी चलती रहती है, जैसे जीवन जो चलता रहता है, जिए जाने के बाद भी"


                         एक सच्चे कलाकार का निर्माण रिस- रिस कर बहने वाले झरने के निर्मल पानी की तरह होता है। इस निर्माण प्रक्रिया में कितना कुछ गवाना पड़ता है, इसका गवाह भिखारी का पूरा जीवन है। तपती धूप में डोली ढोने से लेकर एक सफल भिखारी ठाकुर बनने तक का रास्ता बहुत ही कठिन रहा। बचपन से लेकर जवानी और बुढ़ापे तक के वातावरण में जो कुछ भी घटित हुआ उसकी टीस हृदय में समाए हुए अपनी रचनाओं में उड़ेलते रहे जिससे रचना का जीवन सजीव बना रहा। उन्होने अपने आस- पास रहने वाले लोगों के दर्द को जिया और उसी दर्द को अपनी साधना में होम किया और निकलने वाली सुगंध उस वातावरण में फैल गई। भिखारी के जीवन में होने वाली हर एक घटना उन्हें बहुत दिक करती रहती थी, उन घटनाओं पर वे दिन-रात, हफ्ते, महीने विचार में डूबे रहते और जब उससे बाहर निकलते तो एक नई रचना के साथ। एक सच्चे कलाकार में सीखने का को हुनर भिखारी ठाकुर में था वह अद्वितीय था। सुंदरी बाई और दुनिया बाई का नाम सुनकर न जाने कितने कोस धूप में पैदल चले लेकिन हाथ लगा तो बस एक बूढ़ा तबलची जो उनके साथ काम किया था, लेकिन भिखारी ने इस तबलची की बताई गई बातों को ऐसे आत्मसात किया जैसे वह सुंदरी बाई से ही सुन रहा हो। उसकी सुंदरता और गायन की ऐसी कल्पना की जो प्रत्यक्ष से भी ज्यादा नजदीक थी। भिखारी ने अपने जीवन में न जाने कितने पात्रों को बिना देखे उनकी सजीव कल्पना करके अपना रचना पक्ष जीवंत किया। 'बेटी बेचवा' का सृजन भिखारी के जीवन का एक दर्द है जो अपनी बेटी के साथ हुए आत्याचर से निबटने के लिए लिखा था। "बेटियाँ खूसठ बूढ़ों के हाथ हलाल की जा रही हैं, बेटियाँ और उनकी रुलाई को मंतर और गीत और गारी और चुहुल से ढका जा रहा है। मन में घाव - सी पक रही है पीर, मथ और बह रही है पीर। भोकर मार कर रोने का मन करता है ताकि मवाद बाहर आ जाए और जी हल्का हो।"


"रोपेया गिनाइ लिहल-अ, पगही धराइ दिहल-अ


चेरिया के छेरिया बनवल-अ हो बाबू जी


बाबा लेखा खोजला दुलहवा हो बाबू जी,


खाइ के जहर मरि जाइब हम हो बाबू जी,"


बात यहीं तक नहीं रुकी जब इसकी पहली प्रस्तुति हुई तो पता चला के बगल के किसी सज्जन के ऊपर लिखी गई घटना है जिससे बहुत बखेड़ा खड़ा हो गया। रात में पत्नी को समझाते हुए कहा के अभी हम कह रहे हैं तो कोई नहीं सुन रहा है जब हर कोई कहेगा तब तो ये बात सबको माननी ही पड़ेगा। ये विश्वास था एक कलाकार का। इसका प्रभाव बहुत ही सफल रहा -


"लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि आपका नाच देखने के चलते कितनी ही बेटियों ने बूढ़े वारों से शादी करने से इनकार कर दिया, कितनी मंडप से भाग गई, कितनी बारात आने पर, और बहुतों को तो गाँव वालों ने है खदेड़ दिया।"


                           भिखारी ठाकुर को निचली जाति का होने का दंश हमेशा झेलना पड़ा। किसी के एक बुलावे पर छूरा, कैंची, नहन्नी लेकर पहुँचना पड़ता था। न्यौता लेकर जाने पर ढंग से न तो पैसा मिला कभी और न ही भोजन, कोसो- कोस पैदल चलना पड़ता था। यहाँ तक के जब भिखारी ठाकुर का नाम काफी चर्चित हो गया, तब भी ऊँची जाति के कुछ लोग अपना रौब दिखाने के लिए उनके घर पर नाई का काम कराने के लिए आए, लेकिन भिखारी ने कभी किसी का अपमान नहीं किया। पंडित और नाई में बड़ा द्वेष चलता रहा, हालांकि काम ज्यादा नाई को ही करना पड़ता था लेकिन उसमें मिलने वाले ज्यादातर सिक्के पंडित ही हड़प लेता था। कहने को भिखारी 'ठाकुर' थे लेकिन आदर वैसा कभी नहीं हुआ जब तक वो एक सफल कलाकार नहीं बन गए। "बबुआ हुआ तो चार आना और बबुनी हुई तो दो आना। साउरी का काम नह काटने, नहावन कराने तक काम ही काम है नाई- नाइन के, जबकि पंडित बैठे- बैठे जन्मकुंडली और पतरा देखकर बाइस रुपए ऐंठता था।"


"लड़ाई सिर्फ समर भूमि में ही नहीं लड़ी जाती, सिर्फ आदमी रूपी शत्रु से ही नहीं, सिर्फ पशु, पक्षी, जीव, जंतु से ही नहीं, लड़ाई पाप के विरुद्ध भी लड़ी जाती है। यह लड़ाई दूसरी लड़ाइयों से ज्यादा कठिन होता है।"


                           भिखारी ठाकुर के ज्यादातर पात्र उनके आस- पास के ही थे, उनके निजी जीवन से संबंधित, उनकी पत्नी, बेटी, मीरगंज की वेश्याएं, गौने की दुलहिन से लेकर धनी सिंह बहू, बिंद बहू, धोबाइन भौजी आदि। इन सभी पात्रों को उन्होंने सामने से देखा और महसूस किया। जिसकी परिणति 'बेटी वियोग', 'बेटी बेचवा', 'गबरघिचोर', बिदेशिया', 'गंगा स्नान' आदि में हुई। भिखारी ठाकुर के साथ काम करने वालों लच्छन, लालू, रामचन्नर पंडित, बाबूलाल, जगदेव, तफजुल, महेंदर, चांदी सिंह आदि को भी संघर्ष झेलना पड़ता था लेकिन जो तकलीफ भिखारी ठाकुर ने झेला और उसे जीवंत बनाया उसे किसी दूसरे ने महसूस नहीं किया इसीलिए भिखारी ठाकुर एक बड़ा कलाकार बन पाए। कला का मान कितना बड़ा होता है यह बात भिखारी ठाकुर के जीवन में दो विभिन्न अवसरों पर देखने को मिलती है - जब मिर्चइया बाबा ने आकर भिखारी ठाकुर की माँ के पैर पकड़ लेते हैं और कहते हैं के ऐसे अमूल्य रत्न को जन्म देने वाली कोई साधारण नारी नहीं हो सकती, और दूसरी बार, जब बाबू रामनारायण सिंह के यहाँ पहुँचे तो उनके परिवार का हर सदस्य आकर इनका चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेने लगा, लेकिन छोटी जाति का आदमी झेंप गया।


                          एक निचली जाति से संबंध रखने के साथ कलाकार होने का दण्ड भी उन्हें हमेशा मिला। क्योंकि राजपूत या ब्राह्मण कभी नचनिया बन ही नहीं सकते, उनकी इज्ज़त में कमी आ जाती थी। शुरुआती दौर में भिखारी ठाकुर नचनिया कहे गए, आस- पास के लोग तो कहते ही थे अपने घर में भी माता- पिता से नज़रे मिलाने में झेप जाते थे। किसी भी नए को स्वीकार कर लेने का साहस सब में नहीं होता और ऊपर से अनपढ़ व्यक्ति के लिए तो और कठिन है, क्योंकि वह धार्मिक, और सामाजिक रूढ़ियों में इस प्रकार जकड़ा होता है कि उसको तोड़ने की हिमाकत नहीं कर सकता। नाटक मंडली के लोगों को इकट्ठा करना और उनको बनाए रखना बड़ी बात थी, अभिवावकों से छुपा- छुपा कर कई दिन तक काम किया गया, लेकिन ऐसा कब तक हो सकता था, इसलिए भिखारी ने प्रतिरोध का रास्ता इख़्तियार किया और मुखर अभिव्यक्ति दी। इन रास्तों पर एक कलाकार और उसकी कला को नंगे पाँव तपते हुए पैदल गुजरना पड़ा। और यह समाज की अपनी धारणा है जब व्यक्ति इन सब दुविधाओं से लड़ कर आगे निकल जाता है तो वही विरोध करने वाले साथ भी देते हैं और इज्ज़त भी, जो भिखारी ठाकुर को जीवन में मिला। एक उत्कृष्ट और प्रभावी परंपरा बनाने में बहुत कुछ गवाना पड़ता है - "तमाशा चाहे जितना भी उम्दा कथानक पर बना हो, चाहे जितनी तल्लीनता से उन्हें लिखा जाय, मंच की अग्नि परीक्षा कुछ और ही होती है, जहाँ बहुत कुछ जल जाता है, छँट और छूट जाता है, बहुत कुछ जुड़ जाता है, बल्कि तमाशे हर मंचन के साथ मंजते और सजते चले जाते हैं - हर मंचन ही अग्नि परीक्षा है।"


                             भिखारी ठाकुर की कला बहुत ही महान है, लेकिन उससे भी बड़ी बात है आम जन का कलाकार होना, लोक कलाकार होना। जिसमें समाज के विभिन्न वर्ग, कार्य, परिस्थितियाँ, कला, परंपरा, रीति- रिवाज और वेश- भूषा की भागीदारी सम्मिलित रूप में थी। आखिरी समय के दौरान उन्हें मुंबई की चकाचौंध को भी देखने का अनुभव मिला, लेकिन जिस जीवन की अभिव्यक्ति, जिस जीवन की तलाश उनके नाटकों में चाहने वालों को होती थी वह वहाँ तनिक भी नज़र नहीं आई। उनको गाँव- जवार की मिट्टी, नदियाँ, लोग, भाषा, धर्म, संस्कृति और परम्परा, से बहुत लगाव था। भिखारी ठाकुर बड़ी बातों का अर्थ नही जानते थे, हमेशा अपने लोगों बीच से उपजे दर्द को स्वीकार किया और उसी के अनुरूप अपनी कलाओं में अभिव्यक्ति दी, लेकिन उन्होंने हमेशा बड़े लोगों का सम्मान किया। "देश दुनिया के बारे में बड़का- बड़का नेता गान्ही बाबा, जयपरकाश जी, राजेंदर बाबू सोचेंगे, मुझे तो दुखों से छलनी हो अाए, मुँह दूबर लोगों के बारे में सोचने दो, जिन्हें मैं जनम से देखता रहा हूँ, चिन्हता रहा हूँ!"


                            जिस कलाकार ने जीवन भर लोगों की समस्यायों को आगे रख कर अपने जीवन का लक्ष्य बनाया, उसका अंतिम समय बहुत ही उथल- पुथल और संघर्षपूर्ण रहा। हजारों- लाखों लोगों के सामने, बड़े- बड़े अधिकारियों के बीच बहुत सम्मान मिला, बहुत प्यार मिला, लेकिन बीच- बीच में मन टूट जाता था, जब एक स्थिति आती है और वह कुछ नहीं कर पाता। चन्ननपुर से लेकर कलकत्ता, बंबई, खड़गपुर, फतनपुर, आरा, बलिया, छपरा, बनारस, गोरखपुर, धनबाद, आसनपुर, कोइलौरी, में बाबू, बाबा, बबुआ, माई और बहोर आदि के बीच कला का रंग बिखेरता गया। भिखारी को जब प्यार और दुलार की आवश्यकता थी तब उनके साथ खड़ा होने के लिए बहुत कम लोग बचे थे, ज्यादातर लोग उनको छोड़ कर पहले ही विदा हो लिए थे। लेकिन एक सच्चा कलाकार जिंदा रहता है अपनी रचनाधर्मिता के बल पर, अपनी अभिव्यक्ति के बल पर और अपने कर्मों के बल पर। जिसने अपनी रचनाओं में ऐसे नैतिक चरित्रों का निर्माण किया, जिससे उसका खुद का चरित्र भी उसमें एकाकार हो पाया। जिसको परवर्ती लोग स्वीकार करते हुए अनुशरण करते रहे तथा अपने जीवन में उतारने का संभव प्रयास करते रहे। विदेशिया की जिस परम्परा का सृजन और संवहन भिखारी ठाकुर ने किया वह आज भी याद की जाती है। एक निम्न जाति का नाई सिर पर पगड़ी, पैर में चमरौंधा जूता, झीनी धोती में लिपटा हड्डियों के सहारे ठुमकता भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक अपने उद्देश्य को फैलता रहा, अनगढ़ और लोक भाषा का सिद्धहस्त एक ऐसा व्यक्ति जो कबीर और तुलसी की लिखी पंक्तियों को अक्षरशः आत्मसात करते हुए समाज को बदलने की छटपटाहट लिए उपेक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्वकर्ता बन गया।


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                                                                                   परिचय -जुगेश कुमार गुप्ता


                                                                                   शोध छात्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय


                                                                                     9369242041