समीक्षा - 'इस समय तक' : प्रवासी भारतीय की भारतीय कविताएँ - डॉ. नीलोत्पल रमेश

समीक्षा - 'इस समय तक' : प्रवासी भारतीय की भारतीय कविताएँ - डॉ. नीलोत्पल रमेश


 


प्रवासी भारतीय धर्मपाल महेंद्र जैन का पहला कविता संग्रह 'इस समय तक' अभी-अभी प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह में धर्मपाल महेंद्र जैन की 78 कविताएँ संकलित हैं। धर्म जैन कनाडा के टोरंटो शहर में 1998 से रह रहे हैं, इससे पूर्व पाँच वर्षों तक अमेरिका में भी रहे। प्रवासी भारतीय विश्व के अनेक देशों में रह रहे हैं और वे अपनी रचनाशीलता को कायम रख हिंदी साहित्य के भंडार को समृद्ध कर रहे हैं। आवश्यक यह है कि भारतीय साहित्य में भी उनकी रचनाओं को प्राथमिकता से मूल्यांकित किया जाए, ताकि उनका लिखा सार्थक हो सके। इनका हिंदी साहित्य में उल्लेख किया जाना चाहिए क्योंकि प्रचुर मात्रा में हिंदी साहित्य विश्व के अनेक देशों में लिखा जा रहा है। वे रहते तो विदेश में है लेकिन उनकी अभिव्यक्ति भारतीय परिवेश को वर्णित करने में सफल हो रही है।


   


धर्मपाल महेंद्र जैन के कविता संग्रह 'इस समय तक' में कवि ने अनेक उप-शीर्षकों के माध्यम से कविताएँ लिखी हैं। वे उप-शीर्षक हैं - माँ, प्यार, बेटी, शब्द, मेरा गाँव, प्रकृति, सत्ता, आदमी। 'माँ मैंने देखा' कविता में कवि ने अपनी माँ को याद किया है कि किस प्रकार माँ ने मेरे हाथ को थाम कर शब्दों को लिखवाने की कोशिश की। वे शब्द अनगढ़ थे, फिर सुघड़ हो गए। कवि ने अपनी माँ को ईश्वर की अनंत लीला का सहयोगी कहा है। बचपन की स्मृतियाँ कवि के पास हैं, जैसे माँ का अंगुली पकड़कर चलाना, लोरियाँ सुनाना, शब्दों को आकार दिलाना आदि। ये सारी बातें कवि को याद हैं, तभी तो वह कहता है -


  “याद है मुझे


  तुमने रोपा था अक्षर पट्टी पर


  हाथ थाम मेरा तुम चलाती रहीं चाक


  चाक-सा


  घड़ डाला अक्षर अनाकार-साकार


  माँ मैंने देखा था तब


  ईश्वर मेरा हाथ पकड़ कर लिख रहे थे।"


  'चाहता तो मैं भी था' कविता में कवि ने कहा है कि मैं कठोर होना तो चाहता था, पर तुम्हें जान नहीं पाता। यही कारण है कि कवि अपनी प्रिया के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल रहा है, ताकि दुनिया को ठीक से जाना जा सके। कवि कहता है -


  "चाहता तो मैं भी था


  लौह कवच से जड़ित सीना और


  पाषाण हृदय


  पर मैं कैसे उतर पाता


  तुम्हारे सुकोमल चित्त में


  कैसे जान पाता कि


  भीतर की गहराइयों में


  धड़कता है दिल।"


  ___ 'मेरी किताब हो तुम' कविता में कवि ने अपनी प्रिया को समझने-बूझने की कोशिश की है। वह किताब की तरह कभी अपनी प्रिया को उलट-पलट कर पढ़ना चाहता है ताकि वह प्यार के ढाई अक्षर को जान सके। कवि ने अपनी प्रिया को सृष्टि की श्रेष्ठतम भाषा की संज्ञा दी है।


        'बेटी के जन्म पर' कविता में कवि ने अपनी बेटी के जन्म के समय का मार्मिक चित्रण किया है। वह कहता है कि प्रकृति भी तुम्हारे स्वागत के लिए प्रतीक्षारत थी।


      "मैंने सुना – गा रही थी हवा


      मैंने देखा - थिरक रही थी झील


      अलविदा कह रहा था झिलमिलाता सूरज


      और धरती फैला रही थी बाँहें


      तुम्हारे और चाँदनी के स्वागत में।"


    'बार-बार लिख रहा हूँ' कविता में कवि ने शब्दों की सत्ता का वर्णन किया है। कवि को शब्द चैन की नींद भी नहीं सोने देते हैं। जब वे जन्म लेते हैं तो कवि को बेचैन कर देते हैं कि मुझे लिखो, ताकि मुझे शब्दों की सत्ता में महत्त्व मिल सके। कवि कहता है -


    "क्यों ऐसा होता है हर दिन


    कि सुबह उठने पर


    खड़े हो जाते है बहुत-से शब्द


    जो रात से घेराव कर रहे थे


    नहीं सोने दे रही थी उनकी नारे-बाजी


    क्या मालूम क्या कहना चाहते थे वे


    मैं उनींदा बेखबर रहा उनकी बातों से


    वे रेतीला तूफ़ान बन घुस गए आँखों में


    उड़ा गए नींद।"


    'अंधेरे में टिमटिमाने' कविता में कवि ने शब्दों के वंध्या होने की बात की है। वह कहता है कि अगर शब्द वंध्या होते तो मेरे अंदर किसी तरह की भावनाएँ नहीं जनमतीं और मैं सुविधाभोगी जिंदगी जी पाता।


    'अकाल में' कविता में कवि ने अकाल की भयावह स्थितियों से पाठकों को रूबरू करवाया है। अकाल से जीवजंतु ही परेशान नहीं होते पेड़-पौधे भी तबाह हो जाते हैं। माँ अपने बच्चे को दूध नहीं पिला पाती हैं, जिसके चलते उनके बच्चे उनका साथ छोड़ दे रहे हैं। वे इस दुनिया से कूच करने जा रहे हैं।


    "कद्दावर बेटे-सा जवान बैल


    दूधारी गाय-भैंस-बकरी


    खा गया दुष्काल


    या ले गए औने-पौने


    बूचड़खाने के जमादार।"


    'पीढी दर पीढी' कविता में कवि ने अपने पिता को याद किया है। वह कहता है कि हमारे पिता ने हमें छोड़ दिया दुनिया में, ताकि मैं दुनिया की रीत सीख सकूँ और इस दुनिया में अपने पैरों पर खड़ा हो सकूँ


    "मेरी देह में


    रोपा एक आदमी पिता ने


    और उछारते हुए कहा


    गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध पत्थर उछालने की


    कोशिश जरूरी है


    आने वाली पीढ़ी के लिए।"


    'ओ चिड़िया' कविता में कवि ने चिड़िया के साथ मानवीय संबंधों की बात की है। चिड़िया का फुदकना, उड़ना, तिनके चुनना, घोंसला बनाना - ये सारी क्रियाएँ कवि को अच्छी लगती हैं। वह कहता है कि मेरी तस्वीर के पीछे जो घोंसला बना रही हो, वह मेरे होने का एहसास दिला रहा है। कवि कहता है -


      "कोई डरा रहा है हमें


    यह कह कर कि


    सूरज नहीं आएगा एक दिन


    ओजोन की परतों में पड़ जाएँगी गहरी झुर्रियाँ


    कार्बन डाई ऑक्साइड के माफिया


    सिलेंडरों में भर लेंगे सब प्राणवायु


    धुंध में उंगली छूट गई तो


    नहीं खोज पाऊँगा तुम्हें मेरे बच्चे"


    'उस समय से' शीर्षक कविता में कवि ने सत्ता के परिवर्तन को 'उस समय से इस समय तक' की बारीकियों को बहुत ही सूक्ष्म दृष्टि से वर्णित किया है। सत्ता के खेल में उस समय से अब तक असंख्य लोगों की जानें गई हैं। कवि कहता है


    ''करोड़ों भेड़ें लील गया महाभारत


    कलिंग में बहीं खुन की नदियाँ


    धुंआ हो गया हिरोशिमा


    वियतनाम, ईरान से सीरिया तक


    आदमी ही कटा, गड़रिए चलते रहे


    उस समय से इस समय तक।"


    ___ 'सत्ता की देह में' कविता में कवि ने देश की राजनीति में नेताओं की भूमिका पर सबसे बड़ा प्रश्न चिह्न लगाया दिया है। वह कहता है कि वे जनता को नहीं देखते हैं बल्कि अपना लाभ देखते हैं।


    "बदलिए दल, जमाइए कुर्सी, बेचिए देश


    भागिए सबसे तेज़, न हाँफिए नेताजी।"


    'आधुनिकता का चेहरा' कविता में कवि ने बाजारवाद की गिरफ्त में आती पीढ़ी की ओर पाठकों का ध्यान खींचा है। यह बाजार भी ऐसा है कि जो चीजें नहीं बिकतीं उन्हें मुफ्त में देकर अपना प्रभुत्व कायम रखता है।


    "इच्छाओं का अवमूल्यन


    बाजार को बेआबरू कर सकता है


    इसलिए दुकानदार एक चीज़ खरीदने पर


    सममूल्य दूसरी चीज़ भेंट करते हैं


    ___ 'इस समय तक' की ये कविताएँ भी पाठकों को बाँधे रखने में सक्षम हैं - 'भोपाल : गैस त्रासदी', 'प्रार्थना कुबूल हो', 'मुझे तुम्हें वह लौटाना है', 'आस्था की खातिर', रिश्तों के जाल में', 'नई पत्तियाँ आ रही हैं', 'साहबान!', बड़े भाई', 'भाषा बनने लगी हथियार', आदि। धर्मपाल महेंद्र जैन की कविताएँ भारत में लिखी जा रही कविताओं से किसी भी मायने में कमजोर नहीं है बल्कि उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। भाषा, भाव, कहन और प्रतीक - सबकी दृष्टि से 'इस समय तक' की कविताएँ बेजोड़ हैं। पुस्तक की छपाई अच्छी है, प्रूफ की गलतियाँ नहीं है। इस अप्रवासी भारतीय कवि की कविताओं का हिंदी संसार में स्वागत किया जाना चाहिए व इनकी कविताओं की ओर पाठकों का ध्यान जाना चाहिए।


      इस समय तक : कविता संग्रह, कवि : धर्मपाल महेंद्र जैन, प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, सीहोर-४६६००१, मूल्य : २५० रुपए, पृष्ठ : १६०, वर्ष : २०१९


      लेखक का पता - धर्मपाल महेंद्र जैन, 1512-17 Anndale Drive, Toronto M2N2W7, Canada, फ़ोन : +4162252415


                      सम्पर्क : पुराना शिव मंदिर, बुध बाजार पो. गिद्दी-ए, जिला-हजारीबाग-829108, झारखंड मो.नं. : 9931117537, 8709791120