कविता - गुजरता रहा - दफै़रून 

 


गुजरता रहा


 


जो हाँकता था घोड़ा 


वह जानता था


रास्ते में मिलेगा प्रेम का मौसम


सो चढा दिया आँख पर अंधा चश्मा


 


घोड़े के जीवन से बाहर


गुज़रता रहा प्रेम का मौसम


 


गुज़रता रहा


गुज़रता रहा।


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