संस्मरण-आचार्य स्मृति : आदमी बनाम कुत्ते-बिल्लियों की मौत - सतीश नूतन

सतीश नूतन - जन्म : 10 अक्टूबर 1969 शिक्षा : स्नातकोत्तर राजनीति शास्त्र वृति : उच्चतर माध्यमिक विधलय में कार्यरत। प्रकाशन- घोसला चिरई का (कविता-संग्रह) । कविताएँ आलोचना, वागर्थ, साक्षात्कार, जनसत्ता हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स इत्यादि में प्रकाशित तथा दूरर्दशन एवं आकाशवानी पटना से अनेकशः प्रसारित।


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सन् १९८२ के जनवरी माह में मेरा नामांकन वैशाली जनपद के दीघी हाई स्कूल, हाजीपुर में हुआ। मैं बाबूजी ;कवि, गीतकार हरिहर प्रसाद चौधरी 'नूतन' के साथ एक खपरैल घर में रहता था। सड़क के उस पार मेरा स्कूल था, स्कूल में बाबूजी हिन्दी पढ़ाते थे। कवि थे, सो हिन्दी कविताओं को पढ़ाते वक्त कवि के जीवनचरित पर भी दूर तक चले जाते। 'भिक्षुक' जैसी छोटी कविता पढ़ाने में उन्हें दोतीन दिन लग गए। निराला के निरालेपन के कई किस्से उनसे सुने, जो आज तक जेहन में जड़ जमाए हैं।


    डेरे पर नियमित रूप से आनेवाली पत्र-पत्रिकाओं में सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट' भी शामिल था। अस्सी के दशक में डाइजेस्ट ने दुनिया की महान् हस्तियों के किस्सों की एक पुस्तिका प्रकाशित की थीउस पुस्तिका में दो किस्से निराला पर भी थे।


    पाठ्य-पुस्तकों से ऊबता तो पत्र-पत्रिकाओं में डूब जाता। बीच-बीच में आगन्तुकों के चाय-पानी और ठहर जाने पर रोटी-तरकारी में लग जाने की जिम्मेदारी भी मुझ पर ही थी। चाय, राय जी की दुकान से आती थी और भोजन कुन्नी के चूल्हे पर पकता था। चावल, दाल, सब्जी तो मैं अच्छी तरह से पका लेता था, पर रोटी टेढ़ी हो जाती सो बेलने से लेकर फुलाने तक की कला अन्त तक बाबूजी के पास ही रह गई। परथन के लिए थोड़ा आटा लाना बाबू! एक सूखी लकड़ी चुल्हे में लगा दे! देखना! कुन्नी न भड़के! बाबू, ठंडा पानी.. जैसे सहज आदेशों के बीच शुरू होती थी, भोजन बनने से लेकर खाने तक की पूरी प्रक्रिया बीच में जो समय बचता, उसमें बाबूजी अक्सर सुनाते किसी न किसी कवि का कोई न कोई नायाब किस्सा। सो धीरे-धीरे 'ई कवियन' को पढ़ने, सुनने और करीब से जानने का शौक भर आया मुझमें।


    एक बार बेतिया में आयोजित एक कवि सम्मेलन से बाबूजी के साथ लौटे महाकवि आरसी प्रसाद सिंह को लोटा में पानी देने की मजबूरी पर मैं कितना लजा गया था, क्या कहूँ। शाम को लड़-झगड़ कर बाबूजी से चार खंडों वाली स्टील की एक थाली और गिलास खरीदवा कर ही शांत हुआ। गिलास गुम। थाली आज तक सलामत है। चलो बाबूजी की एक निशानी बरकरार है आज तक।


    प्रत्येक शनिवार को गाँव जाते वक्त बाबूजी हमें होटल में खाने के पैसे देते रहे और मैं साथियों के घर मुफ्त का भोजन कर बाबूजी द्वारा दिए पैसों से निराला निकेतन, पेठिया गाछी, राजेन्द्र नगर (पटना) की यात्राएँ करता रहा।


    बाबूजी के देहावसान के बाद घर की जवाबदेही ने मेरे पाँव जकड़ लिए। दिल्ली, मुम्बई, भोपाल, कोलकाता खूब घूमा पर शास्त्रीजी, आरसी बाबू, पोद्दार रामावतार अरुण सरीखे बुजुर्गों के पाँव छूने न के बराबर ही पहुँचा।


    लेकिन सारी स्मृतियाँ उसी कुन्नी के चुल्हे में पड़े राख में सुलगती चिंगारी की तरह मौजूद हैं। आज स्मृतियाँ बारबार वापस जा रही हैं 'निराला-निकेतन' बाबूजी के किस्से, किस्सों में शास्त्री जी बार-बार आ रहे हैं। उनकी उनका गजल-


    जिन्होंने हो तुझे देखा


    नयन वे और होते हैं।


    कि बनते वन्दना के छंद


    क्षण वे और होते हैं।


    उत्तर छायावाद के अंतिम उजास आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्रीजी से जुड़ी कुछ यादें-


कवियों की लिस्ट, गुंडों की लिस्ट


    30 मार्च 1989 को रवीन्द्र भवन, पटना में आयोजित एक समारोह में बिहार सरकार के प्रतिष्ठित 'राजेन्द्र शिखर सम्मान' से अलंकृत होने के तुरत बाद शास्त्रीजी का वक्तव्य आया-


    आया नहीं मैं बुलाया गया हूँ


    झुनझुने देकर बहलाया गया हूँ।


    वक्तव्य की शुरुआत में 'झुनझुने देकर बहलाने' की जो बात उन्होंने कही : मैं तुरत बूझ गया पर अपनी बूझ पर कनफिडेंस न होने के कारण बगल में बैठे बाबूजी से पूछा“सरकारे पर न...?” “चुप रहिए, अभी और सुनिए।'' बाबूजी की सलाह पर मैं पूरे कार्यक्रम के दौरान चुप ही रहा। रात को हार्डिंग पार्क में हाजीपुर के लिए बस पकड़ी। साथ में कवि हृदयेश्वर और समाजवादी चिन्तक मनमोहन जी थे। बस खुली तो मैंने बाबूजी को कहा, “शास्त्री जी निडर कवि हैं।'' बाबूजी मुस्कुराए और कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद बोले- ''एक बार पांडेय जी को भी ऐसे ही कह दिया था।'' ''क्या?'' मैंने उत्सुकता के साथ पूछा।


    सदाकत आश्रम में एक कवि-सम्मेलन आयोजित था। मुख्यमंत्री केदार पांडेय अपने स्वागत भाषण के दरम्यान कह गए, “अगर हमारे पास कवियों की कोई लिस्ट होती तो मैं इसी मंच पर बुलाकर उनको बार-बार सम्मानित करता।''


  इतना सुनते ही शास्त्री जी अपने सामने रखी छोटी माइक पर हस्तक्षेप कर बैठे, “मुख्यमंत्रीजी गुंडों की लिस्ट आप रातों-रात बना लेते हैं, कवियों की लिस्ट आज तक नहीं बना पाए?'' पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। एक कांग्रेसी विधायक तमतमाते हुए हॉल से बाहर जाते दिखे। शास्त्रीजी ने माहौल को तुरत हल्का कियाबोले, “बोलिए-बोलिए मुख्यमंत्रीजी, आप तो हमारे मित्र हैं। आपको मैं कुछ भी कह दे सकता हूँ।'' मुख्यमंत्रीजी फिर से बोले, जरूर, पर उनके भाषण की सक्षिप्तता तो कुछ और ही कह गई।


आदमी बनाम कुत्ते-बिल्लियों की मौत


     एक विवाह समारोह में उपस्थिति दर्ज कराकर पटना स्थित हनुमान नगर कॉलोनी जा रहा था। केन्द्रीय विद्यालय के पास कवि मृत्युंजय मिश्र करुणेशजी से मुलाकात हो गई। आवास पर ले जाकर उन्होंने चाय-बिस्किट कराया और अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक 'कहता हूँ गजल मैं' की प्रति प्रदान करते हुए पूछा, “शास्त्रीजी के यहाँ आना-जाना जारी हैकि नहीं?'' मैंने उत्तर दिया, “अगले सप्ताह फिर जाना है।'' * “तो उनके लिए भी एक प्रति लेते जाइए, न।'' मैंने शास्त्रीजी की प्रति भी ले ली।


    करुणेशजी की किताब लेकर मैं अगले सप्ताह 'निराला निकेतन' पहुँचा। शास्त्रीजी अपने पिता के मंदिर के सामने वाले बरामदे पर आराम फरमा रहे थे। चरण-स्पर्श कर मैंने 'कहता हूँ गजल मैं' की प्रति उन्हें थमा दीपन्नों को उलटतेपलटते उन्होंने लगातार दो सवाल किए। पहला, कहाँ मिल गए करुणेशजी और दूसरा यह कि नूतनजी कैसे हैं? “जी, पटना में मिले थे, बाबूजी घर में एक वर्ष के अंदर हुई तीन मौतों से दु:खी हैं।'' मेरे जवाब पर उन्होंने यह न पूछा कि कौन-कौन मर गए हैं घर में, नूतनजी से उनका क्या रिश्ता था और अपना ही दुखड़ा सुनाने लगे, “निराला निकेतन' में भी तीन मौतें हो चुकी हैंगइया का अंतिम संस्कार पहलेजा घाट पर कराना पड़ाट्रक भाड़ा मद में बहुत पैसे खर्च हुए। एक कुत्ता और बिल्ली यहीं बगीचे में दफन हैं।'' (मृत गाय एवं कुत्ते-बिल्ली के उन्होंने नाम भी बताए थे, पर अब याद नहीं हैं)


    मेरे खानदान के दिवंगत लोगों की तुलना उन्होंने कुत्ते- बिल्ली से कर दी, इस तुच्छ सोच में डूबकर मैं आहत होता रहा, शास्त्रीजी कौवों को छीट-छीटकर नमकीन सेब खिलाते रहे।


चुगली


    आरसी बाबू का पोस्टकार्ड आया। आदेश था जल्द से जल्द मिलो। मैं पहुँच गया रोड नं. १३बी., राजेन्द्र नगर, पटना।


    आरसी बाबू टाइपराइटर पर कविताएँ टाइप कर रहे थे। मैंने पूछा, "बाबा, 'बेला' को कविताएँ भेजते हैं कि नहीं?'' आरसी बाबू गरम हो गए। कहा, “अगर जानकीवल्लभ कोकविताएँ नहीं चाहिए, पत्र लिखने की फुर्सत नहीं है तो मुझे भी 'बेला' में छपने की कोई लालसा नहीं।''


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    पटना से प्रकाशित एक अखबार में समाचार छपाकि शास्त्रीजी और नीरजजी के बीच नोक-झोंक हुई। इस समाचार से अवगत कराते हुए मैंने नीरजजी को पत्र लिखा। २ मई १९९३ को उन्होंने पोस्टकार्ड लिखा, “मामला बोकारो का था। मैं जब मंच पर उपस्थित नहीं था तब शास्त्रीजी ने कुछ मेरे संबंध में कहा था। ऐसा मुझे लोगों ने दूसरे दिन बतलाया था। इसी को शायद अख़बार वालों ने नोक-झोंक करके छाप दिया।''


    आरसी बाबू गरम क्यों हुए, नीरज के विषय में शास्त्रीजी ने क्या कहा? इन बातों को जानने के लिए मन कुलबुला रहा था सो एक दिन फिर पहुँचा 'निराला निकेतन'।


    शास्त्रीजी निराला निकेतन के बगीचे में एक पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठे थे। उनके हाथ में आम का गाढा जूस भरा ग्लास था। आरसी बाबू ने कैसे कहा? नीरजजी ने क्या लिखा? उन्हें सब बताने लगा। अचानक उनकी भृकुटी तन गईं। व्यंग्य कसते हुए उन्होंने पूछा, “इस चुगली के लिए तुम्हें कितना श्रम करना पड़ा, बताओगे? चुगली की यह अनमोल कला तुमने किससे सीखी?'' मेरी बकार बंद हो गई। असंतुलन के कारण उनके हाथ का ग्लास भी थोड़ा हिल गया। ग्लास के बाहरी परत से नीचे आ रहा जूस उनकी धीती पर टपकता इसके पूर्व ही उनकी गोद में बैठी बिल्ली उठी और उसे चट कर गई। मैंने सोचा शास्त्रीजी पंडित हैं अब तो ग्लास में मुँह भी न लगाएंगे पर वे बेपरवाह जूस सुड़कने लगे। वहाँ से मैं भी तुरंत सरका।


ससुरवाद


    रोज की तरह सुबह-सुबह मनमोहनजी हाजिर हैं। हाजिर है उनके हाथ में रायजी की चाय। बाबूजी ब्रश करने के बाद अपनी जीभ साफ कर रहे हैं। मनमोहनजी ने तीन-चार घूट में ही ग्लास खाली कर बोलना शुरू किया, मारस्साब, नंदकिशोर नवलजी की उपस्थिति में उत्तर छायावाद पर गोष्ठी होती है। उनके दामाद की संस्था 'पुनश्च' का बैनर है। उनके मित्र पंडित सिद्धिनाथ मिश्र शास्त्रीजी पर पर्चा पढ़ते हुए उन्हें ठहरा हुआ कवि कह रहे हैं। अगर जानकीवल्लभ शास्त्री ठहरे हुए कवि हैं तो उत्तर छायावाद में रुद्रजी कहाँ हैं? मानिए या न मानिए, पुनश्च की यह गोष्ठी उत्तर छायावाद पर नहीं बल्कि 'ससुरवाद' पर केन्द्रित थी। गोष्ठी में जो कुछ भी हुआ, उसका विरोध होना चाहिए। बाबूजी मनमोहनजी की बातों को हँस कर टाल गए, पर मनमोहन तो वाकई मनमोहक थे। दिनरात एक कर वे हाजीपुर के कई साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों को ललकारते रहे। हस्ताक्षर अभियान चलाया और मुझे इस प्रसंग को पटना से प्रकाशित दैनिक 'आज' में प्रकाशित कराने हेतु प्रेरित किया। कहा, “शास्त्रीजी खुश हो जाएंगे'बेला' में आपकी कविताएँ फोटो के साथ छपेंगी।'' 'लालच बुरी बला' का अर्थ जानने के बावजूद मैं लालच में पड़ गया। ससुरवाद वाला प्रसंग 'आज' में छपवाने में सफल हो गया।


    अखबार की कटिंग लेकर हम और मनमोहनजी “निराला निकेतन' पहुँचे। दो-तीन कविताएँ और फोटो भी साथ रख लिए कि 'बेला' के अगले अंक में तो छपनी ही है। 'निराला निकेतन' पहुँचते ही कटिंग शास्त्रीजी को दीमनमोहनजी ने मेरी प्रशंसा के कई पुल बाँधे। शास्त्रीजी ने कटिंग को नजदीक से पढ़ा, फिर बगल में रखी पुस्तक से दबा दिया, एक युवक को समोसा लाने को कहा, फिर मेरी तरफ मुखातिब होते हुए कहा, “मेरे और रुद्रजी के नाम पर खूब छीछालेदर की आपलोगों ने।'' तब तक समोसा आ चुका था। गरम था और तीखा भी, सो खाने के क्रम में मैं कुछ ज्यादा ही सुसुआने लगा। शास्त्रीजी ने पूछा, “तीखा है''? मैंने कहा, “जी हाँ'' उन्होंने फिर पूछा, “ससुरवाद वाली खबर से ज्यादा या कम।'' मैं लगातार दो-तीन ग्लास पानी पी गया।


                                                   सम्पर्क : टाउन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, हाजीपुर, वैशाली-844101, बिहार, मो.नं. : 8102962178