कहानी - बल -कृष्ण कुमार भगत

कृष्ण कुमार भगत -जन्म : 1 नवम्बर 1958 शिक्षा : हाई स्कूल रचनाएं : हंस, कथाक्रम, सम्बोधन, पुनर्नवा (दैनिक जागरण), युगवाणी, आधारशिला, पाठ, समकालीन अभिव्यक्ति, साहित्य गुंजन, सृजनकुंज, पंजाब सौरभ इत्यादि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित व आकाशवाणी रामपुर से प्रसारण। 40 वर्ष बाद 'क्रांति के मूक स्वर' पहला कहानी-संग्रह जनवरी 2017 में आधार शिला प्रकाशन दिल्ली, देहरादून, नैनीताल से प्रकाशित । 28 जून 2017 से फेस बुक पर सक्रिय (परमाण पत्तर कहानी 'जनपथ' नवम्बरदिसम्बर 2017 में प्रकाशित) सम्प्रति : कृषि


                                                                      ---------------


''यह रिश्ता मैं कैशे मान लू?'' पिता सुनते ही बिफरे।


    “क्यों? क्या कमी है प्रणय में! सुन्दर, पढ़ा-लिखा, नौकरीशुदा और अच्छे परिवार से है।।''


     ब्राह्मण तो नीं?''


    'चन्दर दा तो हैं!'' बहन, अविवाहित भाई को देखते हुए बोली।


     पाण्डे जी निरुत्तर रह गए।


    *"मैं प्रणय से ही मैरिज करूंगी, वरना...''


    “वरना क्या?'' मां ने चुप्पी तोड़ी।


    'सारी उम्र कुंवारी रहूंगी!'' चम्पा का उत्तर दो टूक था।


     *"दीदी ने सही डिसीजन लिया है बाज्यू?''


    ''तुम चुप रहो!'' पाण्डे जी ने मंझले बेटे पवन को डांट दिया।


    ''ईजा, मैं बेला के घर जा रही हूँ?'' स्थिति बिगड़ती देख वह बाहर चली 'गई। चम्पा और बेला! दो बदन एक प्राण, फूलों से ही कोमल मन... कॉलिज लाइफ में 'हंसों का जोड़ा' कह कर पुकारी जाती रहीं।


    समाचार पत्रों में निरंतर आ रहा था कि...लव-जेहाद के तहत बाहर के लोग आ-आ कर पर्वतीय लड़कियों को बरगला रहे हैं, सरकार इसे कड़ाई से रोके! पाक से आए विस्थापितों के एक लड़के की नीयत खराब होने का मामला सामने आया है?...


    पी. डब्लू.डी.विभाग में कार्यरत गौरीशंकर पाण्डे सुनी घाटियों से मौन रहे। चंदर दा के भोलेपन का अहसास चम्पा ने फोर्थ क्लास पिता को होने कब दिया, जो ऑफिस में जिम्मेदारियों से बचते हुए प्रमोशन के अवसर जानबूझ कर टालते रहे। पढाई-लिखाई, कढ़ाई-बुनाई के साथ-साथ वह बाहर के सारे दायित्व सम्भालती चली गई। रमा पाण्डे तो बस किचन की हो कर रह जातीं? अड़ोसीपड़ोसी व नाते-रिश्तेदार चम्पा की प्रशंसा करते...तो मियां-बीवी का सर पहाड़ी शहर में थोड़ा और ऊंचा हो जाता।


    आंचलिक रीति-रिवाजों से जुड़ा... यह ब्राह्मण परिवार... साधारण जीवन शैली होने से भी बिरादरी में अलग-थलग पड़ जाता।


    चुनावों में देश भक्त पार्टी के शीर्ष नेतागण! प्रायः चम्पावत का दौरा करते वक्त चंदर दा को मंच पर साथ बैठाना हरगिज न भूलते ? उसकी ईमानदारी, कर्तव्य परायणता व समर्पण के भाषणों में कसीदे पढते हुए लोगों से वोट देने की अपील होती। रामलीला का आयोजन हर साल वही कराता। इसके अलावा भी शहर में अन्य कोई सामाजिक गतिविधि हो, लोग उसे ही प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंप छुट्टी पा जाते। चम्पावत में सर्वप्रिय चंदर... उस दौरान रात-रात भर घर का मुंह न देख पाता। मगर इसके बावजूद लड़की वाले उसे विवाह योग्य वर न ठहराते। हां, “ग्रेजुएट -टाटा स्काई में नियुक्त पवन उन्हें जरूर पसंद आ जाता। गौरीशंकर भला बड़े लड़के से पहले यह रिश्ता कैसे मंजूर कर लें? चम्पा से पाच साल बड़ा, मंद बुद्धि चंदर, पांचवी से आगे न बढ़ सका था और अब यजमानी करता है!


    सेवा निवृत होने जा रहे पिता की हालत समझते हुए चम्पा, एम.ए.फाइनल कर जॉब तलाशने लगी। एक प्राईवेट एजेन्सी के तहत सुपरवाइजर पद पर उसका चयन हो गया।


    हिमाचल प्रदेश के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में हेल्थ सर्वे करते हुए प्रणय से वह अत्यधिक प्रभावित हुईउसका सेलेक्शन भी चम्पा के साथ बतौर सुपरवाइजर हुआ था। देर रात तक लैपटॉप से अपनी-अपनी टीम की डिटेल्स रिर्पोट ऊपर भेजते हुए दोनों करीब आ गए।


    चम्पा, दो-तीन मर्तबा प्रणय को घर ले आई। पवन से उसकी मित्रता हो गई। मिसेज पाण्डे विदा करते हुए उन्हें तिलक-वंदन करतीं और आशीष देतीं। प्रणय निश्चय ही उनमें अपनी मम्मी की झलक पाता होगा...जिन्हें गुजरे पांच-छ: साल हो चुके थे। ज्येष्ठ पुत्री की मैरिज उसकी मम्मी स्वयं कर गईं और उनके समय से पहले चले जाने का खामियाजा सबसे ज्यादा छोटी, मीता को भुगतना पड़ा। सत्रहवां पार करते ही जब उसे घरेलु कार्यों के साथ-साथ खेतों में जा कर बाप का हाथ भी बटाना होता था और तीसरे वर्ष बी.ए.फर्स्ट में ही रह जाते हुए अंततः कहना पड़ा, “मैं आगे नहीं पढूंगी, पापा!''


    ''क्यों बेटी?''


    ''मेरा मन नहीं कर रहा!''
    और हंस रूमाली उसके योग्य वर खोजने लगे।


    बेला भी चम्पा के अधीनस्थ कम्युनेटर है। प्रणय ने मीता का विवाह तय हो जाने पर! माह, फरवरी में दोनों सखियोंको आमंत्रित किया। साथ ही एक अन्य लड़की भी राजपुर आई। मीता की आंखें बार-बार भर आतीं। शाम ढले विदाई हो जाने के उपरांत सब लोग आंगन में चुपचाप बैठे थे। सहसा चम्पा धीरे से उठी, उसने बुझा चूल्हा सुलगाया। बेला को संग निभाते देख हंसू रूमाली का माथा ठनका...दाल में काला है? मगर दुर-पास के रिश्तेदारों के बीच शायद अभी चुप रहना बेहतर लगा होगा। गांव में अध्यापन के साथ-साथ खेती से जुड़े ...किस्से-कहानियां आदि गढते-गढते ...जीवन कब एक मार्मिक गाथा बन गया, लेखक महोदय को पता ही न चला।


    प्रणय ट्रैक्टर-ट्रॉली में लादा जा रहा शामियाना, कनाते, बर्तन आदि लौटाने शहर चला गयाचम्पा ठण्डा हो चुका खाना गरम करती रही और बेला मेहमानों को परोसती रही। मानो बेटी के जाते ही घर में सचमुच बहु आ गई हो!


    उधर चम्पावत में भूकम्प आ गया, हिम से ढकी ऊंचीऊंची पहाड़ी चोटियां भरभरा कर गिरने लगीं। एक वर्ण विशेष की आबरू अपने ही राज्य में दांव पर लग गई थीलड़का चम्पावत आ धमका। लड़की साथ मिली। दोनों ने पाण्डे परिवार को मलबे से बाहर निकाला...


    *"बोलो न पापा?'' विनम्र-निवेदन हुआ।


    '' यह तुम्हारा आखिरी फैशला वैरा!''


    पाण्डे जी ने लड़की से पूछा।


    ''हां।''


    ''तो शुनो, मैं कन्यादान अपने हाथों शे नीं करूंगा और तुम दोनों को नया घर बशाने शे रोकेंगा भी नहीं!'' सदियों पुरानी बेड़ियां तोड़ न पा रहे पिता लड़की से बमुश्किल कह सके।


    रमा पाण्डे को बड़ा दुःख हुआ कि पेट जाई को अपने हाथों सुर्ख जोड़ा नहीं पहना रही हैं? वह स्वयं ही विदा ले कर चली गईबेला और काठगोदाम से उसकी फुफेरी बहन, बाल विधवा तारा मई में निर्धारित दिन रूद्रपुर पहुंची। प्रणय के साथ भी चंद बाराती आए थे। मून स्टार होटल की छत पर भभकते हॉल में सामान्य आयोजन हुआ। दो प्रेमियों को परिणय-सूत्र में बंधते देख सभी निहारते रहे। बेला और तारा दुल्हन को दूल्हे की गाड़ी में बिठा कर पहाड़ लौट गईं...


    चम्पा अपनी मर्जी से विवाह कर चुकी है


    यह बात पाण्डे दम्पत्ति ने सगे-सम्बंधियों से छिपा ली और प्रचारित किया...वह बाहर कहीं सर्विस करती है? पति पत्नी चाह रहे थे जब तक दोनों लड़के घर न बसा लें, यह रहस्य पर्वतीय लोगों में बना रहे। मिसेज पाण्डे ने ही बेटी का हाल जानने के लिए बेला को तराई भेजा...


    गौरीशंकर दफ्तर से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं! मिसेज पाण्डे को बाजार के सारे काम खुद निपटाने पड़ते, चंदर और पवन तड़के निकल जाते, सूने घर की दीवारें अक्सर चम्पा की याद दिलातीं। उसने बैंक से ऋण लेकर मकान का ग्राउंड फ्लोर बनवाया था, बाद में सेकंड फ्लोर बनवाते समय बापबेटों के पसीने छूट गए........


    दोपहर में यह कौन आ के घण्टी बजाने लगा रे? बड़बड़ाते हुए गौरीशंकर पाण्डे बिस्तर से उठे। प्रातः स्नान ध्यान हेतु जल्दी आंख खुल जाने से आदतन वह थोड़ी देर सो लेना चाह रहे थे कि आंगतुक ने फिर कॉलबेल बजा दी... श्री मति जी भी घर नहीं जो बाहर झांक लेतीं!


    श्री मति जी भी घर नहीं जो बाहर झांक लेतीं!


    ''हलो अंकल?'' मुख्य गेट की सीढ़ियों पर खड़ी बेला चहकी।


    “अरे तू ! कहां शे आ रही है?'' पाण्डे जी नींद टूटने की झुंझलाहट भूल गए।


    “परशों बल मैं दिगी शे लौट रही थी तो दोराहा राजपुर ही बश से उतर ''ई,आंटी कहां हैं?''


    **शायद बाजार गई है...!''


    'चंदर दा और पवन?''


    "बड़का नेताओं के शाथ अभी शे चुनावी तैयारियों में जुट गया है और छुटका, फील्ड में कहीं काम पर होगा!'' पीछे-पीछे ड्रॉइंग रूम जाते हुए गौरीशंकर बोले, “तू बैठ तो जरा में पानी ले कर आता हूं?'' आप रहने दें, में किचन में जाकर खुद पी लूगी! “कह कर वह बेतकल्लुफी से बैग लटकाए इठलाती चली गई। पाण्डे जी सोफे में धंस गए... समझ में नहीं आ रहा था किस मुंह से चम्पा की बाबत पूछे...'


    ''बेला कब आई तू?'' रमा के स्वर ने पति को उबार लिया ,वह उसे रसोई से निकलते देख उत्साह पूर्वक बोलीं, 'मै तेरा पता करने तेरे घर जा ठुरी!''


    “हाय आंटी, कैशी हैं? मैं तो अभी-अभी चम्पावत पहुंची हूं और शोचा ,पहले आप लोगों शे मिलती चलू!'' बालों की आवारा लट गाल से हटाते हुए बेला उनके साथ ड्राइंग रूम में आ बैठी


    "चम्पा के घर गई थी?''


    “हां, मजे में है वो, जीजू और अंकल तो मुझे अभी रोक रहे थे!''


    “काम कितना है, तीन लोगों का खाना बनाना और कपड़े धोना बश!''


    ''झाडू पोंछा?''


    ''महरी कर जाती है!''


    ''खेती बाड़ी?''


    ''ट्रैक्टर शे करते हैं''


  ''फिर भी पहाड़ी-पहाड़ी होते हैं बेटी!!'' गौरीशंकर बोले।


  “ओ नो अंकल ,बहोत अच्छे लोग हैं वो! राजपुर की प्रतिष्ठित फैमिलीज में हैं, जीजू के ग्रांड फादर ने तराई में अपनी काश्ट के छह शात गांव बशाए थे?''


    पाण्डे जी को तनिक आश्चर्च हुआ। ''हंशू अंकल राइटर होने के शाथ-शाथ अच्छे इन्शान भी खैरे!'' बेला पुनः बोली, 'किताबों शे बहोत लगाव है उन्हें!''


    मिसेज पाण्डे ने राहत की सांस ली।


  वे लोग' नफरत के नीं बल शम्मान के हकदार हैंअंकल!'' बेला धारा प्रवाह बोलती रही, “भारत-पाक बंटवारे के रिफूजी हैं तो क्या हुआ? हम लोग तो इधर के ही मूल निवाशी वैरे, फिर भी हमारी और उनकी लाइफ में अंतर क्या है। यही ना कि हम पहाड़ों में पिश रहे हैं और वे लोग मैदान में?''


    गौरीशंकर कसमसा कर रह गए... वाकई गढ़वालियों के हाथ सत्ता रहती है तो कुमाऊंनी टांग खीचते हैं, कुमाऊंनियों के हाथ में रहती है तो गढ़वाली-गढ़वाली एक हो जाएंगे और जब चाहे तब सरकार मिल कर गिरा देंगे ...छि!...छि!...छि!...


  ''हम औरतों का बल क्या जात और कैशा धरम? रमा जी भी पीछे न रहीं, ''जिश मरद के घर जाएंगी उसी की जात हमारी जात और उसी का धरम हमारा धरम!!! “वे लोग'' तो विस्थापित हिन्दू हैं, अंकल?'' बेला


  “वे लोग'' तो विस्थापित हिन्दू हैं, अंकल?'' बेला ने ध्यान खींचा।


  “शूद्र खैरे बल।''


  “ओह, अंकल! हम भी तो ठाकुर हैं? आपशी भेदभाव अब हमें खतम करने होंगे, तभी यह दुनिया सबके रहने लायक बचेगी...देखिए न, लोग फेसबुक, व्हाटसएप्प, हाईक, ई पोस्ट आदि शे जुड़े हैं और मंगल ग्रह पर बशने की तैयारियों में लगे हैं।''


  पाण्डे जी सोफे में ''गहरे धंस गए।''


  “जीजू की ताई भी पहाड़न हैं और हंशू अंकल ने आपके लिए गिफ्ट दिया है।''


  “क्या?'' मियां बीवी एक साथ बोले।


  "किताबें!'' बेला ने पिट् बैग से एक बंडल निकाला, चमकीली पन्नी में गिफ्ट पैक दिखा...'सप्रेम' जिस पर हस्ताक्षर सहित सुंदर अक्षरों में लिखा हुआ था।


    “अंकल, दोस्तों को हर साल बुक्श भेंट करते हैं...''


    ले लो न? आपका खाली शमय बल कट जाया करेगा!'' रमा के आग्रह करने पर गौरीशंकर बिलख पड़े ...हां, बल चम्पा क्या सोचेगी?...?


                                                                                                                                                                             =====


*स्थानीय बोली का एक निरर्थक शब्द जिसका उपयोग कुमाऊंनी बोलने वाले लोग प्रायः करते रहते हैं। जिसके उपयोग से वाक्य के अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होता।


                           सम्पर्क : ग्रा. गोबरा, पो. जोगीपुरा, तह. बाजपुर, जिला ऊधम सिंह नगर-262401, उत्तराखण्ड, मो.नं. : 9258816566