समीक्षा - तुम्हारी आँखों से दुनिया देखना चाहता था - संदर्भ : युवा कवि अशोक सिंह का कविता संग्रह कई-कई बार होता है प्रेम - रुचि भल्ला

अशोक सिंह का कविता संग्रह 'कई-कई बार होता है प्रेम' गत वर्ष बोधि प्रकाशन ये उकाशित हुया है , कविताओं की इस पुस्तक के आवरण पर बना चित्र एल. एम. राय की तूलिका से सुसज्जित है, जहाँ एक स्त्री, एक पुरुष, अरुणिम सूर्य और भरपूर जीवन है प्रेम के संग...।


    किताब का पन्ना पलटती हूँ, ६८ कविताओं से रूबरु होने का मौका मिलता है। इस संग्रह की कविताओं के कई रूप-रंग हैं। कविताओं के विषय-वस्तु में बहुत विविधता भी है। कवि के पास सघन जीवन अनुभव हैं और ये सब उनकी कविताओं में खास रंगों में अभिव्यक्त होते दिखते हैंमानवजीवन के कई आयाम इन कविताओं में मिलेंगे, जिनकी गहराइयों में उतर कर संवेदना की बारीकियों को शब्दों में कलमबद्ध कर काव्यात्मक ढंग से कवि ने उकेरा हैयद्यपि इस संग्रह की कविताएँ प्रेम भाव से प्रेरित हैं पर कई कविताएँ


ऐसी हैं, जो जीवन के सरोकार से जुड़ी हैं और उपदेशात्मक होकर सीख भी देती जाती हैं...।


        कुछ कविताएँ रूपाकार में छोटी भी हैं तो कुछ बड़ी भी...। कवि के रचना-कर्म की प्रकृति इतनी संवेदनशील है कि कवि माँ, दादी, बहनें, बेटियाँ, घर, परिवार, समाज, देश सबकी बात भावपूर्ण तरीके से कहता जाता है और वे कविताएँ उसकी तरह ही भावनात्मक तरीके से अपना रूप लेने लग जाती हैं...। अशोक सिंह जी की लिखी कविताएँ मैंने पत्रिकाओं में भी अक्सर पढ़ रखी थीं पर इस संग्रह की तमाम कविताओं से गुजर कर मैंने जाना कि मामूली विषयों पर भी बहुत गंभीरता से उन्होंने कविताएँ लिखी हैं। अपने परिवेश और स्मृतियों से बने रिश्तों को अनूठे ढंग से लिखने की काव्य संवेदना मिल जाती है इन कविताओं में।


        इन कविताओं के गहन अनुभव, उनके पीछे कीयंत्रणा और मासूमियत सब मिलकर बिंबों की एक ऐसी श्रृंखला रचते हैं, जो मस्तिष्क को खुराक देते जाते हैं। ऐसी कविताएँ साधना सबके बस की बात नहीं है। अशोक सिंह की कविताओं में भावुकता का बखान नहीं है, वे भीतर तक बँधती हुई भावपूर्ण कविताएँ हैं। भाषा और शिल्प की अद्भुत गढून और यथार्थ के टटके बिंब, पहली दृष्टि में ही आकर्षित करते जाते हैं। इस चयन की श्रेष्ठ कविताओं के प्रकाशन के लिए माया मृग जी भी बधाई के हकदार हैं, कवि अशोक सिंह के साथ-साथ। बहुत सुंदर और सारगर्भित हैंये कविताएँ जिन्हें पढ़ना सचमुच एक यादगार अनुभव से गुजरना है।


      पहली ही कविता पढ़ते हुए नजर ठहर जाती है, जिसका शीर्षक है- 'माँ का ताबीज' इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ कहती हैं- “मैं ताबीज नहीं/तुम्हारा विश्वास पहन रहा हूँ माँ।'' कवि की पहली कविता ही मर्म को स्पर्श कर जाती है, वो भी बड़ी कोमलता से। मातृत्व को सलाम करती हुई इस कविता से शुरुआत होती है इस संग्रह की...। अपनी अगली कविता बहनें और घर में कवि कहता है - वे होती हैं/माँ का हाथ/ पिता की आँखें घर की ताजा हवा/घर से विदा होने तक नहीं जानती बहनें कि उन्हीं से यह घर था।


      इस कविता के तहत वे कहते हैं कि कितना जरूरी होता है, बहनों का जीवन में होना। फिर अगली कविता में बेटियों के लिए उनका कहना - घर की बोझ नहीं होती है बेटियाँ बल्कि ढोती है घर का सारा बोझ/और 'घर' घर की तरह लगता हैउनके होने से ही...। यह कविता पूरे दम-खम के साथ कहती है कि “बेटियाँ हैं तो घर है''


    अशोक सिंह लिखते हैं औरतों को संबोधित करते हुए अपनी अगली कविता में - वे सोती हैं/सोता है घर/करवट लेती हैं/बदलता है युग/लंबे समय तक याद रह जाने वाली लगी ये पंक्तियाँ। एक कविता जो कवि ने 'माला' को समर्पित करते हुए लिखी है कि - और तो और/तुम होती हो तो कितना अच्छा लगता हैबाजार से वापस लौट कर जल्दी घर आ जाना...। परस्पर प्रेम को अभिव्यक्त करती हैं ये प्रेममय पंक्तियाँ।


    दुनिया की हर माँ को समर्पित उनकी अगली कविता जिसका शीर्षक है - 'माँ की दुनिया', वे लिखते हैं- माँ!/एक तुम होजो अकेले ही/कितना कुछ बचा रखी हो/अपनी छोटी सी दुनिया में/एक हम सब हैं,कि मिलकर भी बचा नहीं पा रहे हैं तुम्हारी दुनिया...। भावुक कर जाती हैं ये पंक्तियाँ...जो आज के समय का एक बड़ा सच है...।


    'बाजार से बचकर कहाँ भागूंगा' कविता में वह कहते हैं- “मजबूरी में बँधे बाजार के नियम से बच कर/कहाँ भागोगे अशोक सिंह!'' कड़वे सच से सामना कराती हैयह कविता...। एक बहुत ही सुंदर और प्यारी कविता 'मुझे ईष्वर नहीं तुम्हारा कंधा चाहिए' में कवि कहता है- मुझे सिर झुकाने के लिए/ईश्वर नहीं/सिर टिकाने के लिए/एक कंधा चाहिए/और वो ईश्वर नहीं तुम दे सकती हो...।


    कवि ने इस कविता में बड़ी सरलता से ईश्वर की चाह को नकारते हुए जीवन में मनुष्य के कंधे की माँग रखी है अपने लिए...। मनुष्यता पर यकीन को और पुख्ता करती है उनकी यह कविता। अगली कविता है- मोतियों से चमकते/तुम्हारे दाँतों की दुधिया हँसी/मुझे अंधेरे में/आगे का रास्ता दिखाती हैं। ये पंक्तियाँ पढ़ती हूँ तो लगता है जैसे यह दूधिया हँसी चन्द्र किरण हो, जो निराशा के घोर अंधेरे में आषा की किरण बनकर फूटती है कविता में। उसी कड़ी में उसी भावभूमि से जुड़ी एक और कविता की कुछ पंक्तियाँ- मैं चाहता था/तुम्हारी आँखों से दुनिया देखें और खुद/को बचाता रहूं ठोकर खाने से/पर अफसोस, तुमने अपने प्रेम में अंधा बना दिया मुझे। यह कविता उम्मीद रखती हैकि प्रेम ऐसा हो जो अंदर की ज्योति जलाए ! प्रेम कमजोरी नहीं ताकत बनकर उभरे, न कि प्रेम में व्यक्ति को अंधा बना दे...।


  कवि के इस संग्रह का नाम है- 'कई-कई बार होता है प्रेम' कवि ने इस शीर्षक पर जो कविता लिखी है... वहाँ अपनी बात पूरी ईमानदारी से कहते हुए वह अंत में सभी पाठकों से एक जरूरी सवाल पूछ जाते हैं- प्रेम में धोखा खाने/और दुबारा फिर कभी किसी से/प्रेम न करने की घोषणाओं के बावजूद/हम तलाशते हैं दुख के क्षणों में किसी का कंधा/तब क्या सचमुच हम कह सकते हैं पूरे विश्वास से/इस अविश्वास भरे दौर में पूरी ईमानदारी से कि प्रेम जीवन में सिर्फ और सिर्फ एक बार होता है?/कह सकते हैं दिल पर हाथ रख कर पूरी ईमानदारी से? “किसने बचाया टूट कर बिखरने से मुझे'' यह ७७ पंक्तियों वाली लंबी कविता है, पर पढ़ते हुए हर पंक्ति अपने पास रोकती जाती है...। बिछड़े हुए लोग कविता में वे लिखते हैं- वक्त के बंद किवाड़ पर/ दस्तक की तरह होती हैं उनकी यादें जो हवा में साँकल के हिलने से/बजती हैं स्मृतियों में रह-रहकर। ये पंक्तियाँ कवि के संवेदनशील होने का परिचय बखूबी दे जाती हैं। अगली कविता में वह लिखते हैं- काश एक बार फिर तुम्हारा साथ मिलता/और होता हाथों में तुम्हारा हाथ/तो मैं कह सकता पूरे विश्वास के साथ/इस अविश्वास भरे दौर में हत्या लूट आतंक के बीच भी/तुम्हारा हाथ थामे-थामे/भीड़ भरी सड़क पर चलते हुए/कि दुनिया अभी भी/पूरी तरह खाली नहीं हुईअच्छी चीजों से। ये पंक्तियाँ विश्वस्त कराती हैं कि तमाम खामियों के बावजूद दुनिया सुंदर है हर हाल में सुदर रहेगी। यह कविता जीवन की आशा से भरी है। 'प्रेम' शीर्षक वाली कविता पर लिखते हुए कवि कहता है - थककर चूर/थिथिल पड़ी काया के सिरहाने/ताकिया बढ़ाते हाथ है प्रेम/मेहनत और थकान से/माथे पर उभरी/पसीने की श्वेत बूंदों पर/शीतल अँगुलियों की छुअन है प्रेम/रात के अंधेरे में सुनसान सड़क पर खड़ा लैम्पपोस्ट है प्रेम/और तो और/जिन्दगी की रूखी- सूखी रोटी पर/चुटकी भर नमक है प्रेम। अंतिम दो पंक्तियों में वह प्रेम को सरलता से परिभाषित कर जाते हैं। 'पहाड़ पर बैठे एक आदिवासी प्रेमी-युगल की बातचीत' इस कविता में वह एक आदिवासी प्रेमी-जोड़ी के आपसी प्रेम संवाद के बहाने, झारखण्ड में विस्थापन और प्राकृतिक संपदाओं के दोहन का सारा सुख-दु:ख कह जाते हैं और अपील करते हैं कि जल, जंगल, जमीन को बचाना वक्त की सबसे बड़ी माँग है। यह चुप रहने का वक्त नहीं है'- कविता में वह अपनी बात को आवाज दे रहे हैं लिखकर कि चुप रहना किसी भी समस्या का हुल नहीं होता'हमें कुछ करना चाहिए'- यह कविता जीवन को जीवन से जोड़ने की एक कोशिश हैऔर हमारे जीवन में जाने-अनजाने बहुत कुछ छुटते चले जाने की पीड़ा है। समाज को आईना दिखाती एक कविता जिसका शीर्षक है- 'बूशी सोरेन के लिए यह कविता जरूर पढ़ी जानी चाहिए...एक सबक के तौर पर...। अपने झारखण्ड के दिशोम गुरू कहे जाने वाले शिबु सोरेन पर लिखी गई यह कविता अपनी १० पंक्तियों में बहुत कुछ कह जाती है।


    इस संग्रह का एक और खास आकर्षण है- 'एक कथा काव्य : उमो सिंह की ढोलक' इसे पढ़ना जैसे ढोलक की बजती हुई थाप हो, उस पर कुछ कह पाना शब्दों में संभव नहीं...। इसके अलावा भी संग्रह में कई महत्वपूर्ण और पठनीय कविताएँ है- जिसमें पेड़, छोटे लोग, हॉस्टल के लड़के, टूटा हुआ आदमी, बिछुड़े हुए लोग, काली लड़की, बस का इंतजार करती लड़की, अकेली औरत आदि प्रमुख हैं, जिसमें कवि की संवेदना की व्यापकता और सघानता को देख-परखा जा सकता है। संग्रह के अंतिम खंड की कुछ एक कविताओं में एक कविता- “मैं चला जाऊँगा पर कुछ न कुछ तो बचा रह जाऊँगा/तुम्हारे भीतर/बची रह जाती है जैसे/चौखट में अटकी चुटकी भर धूल/लाख बुहारने के बावजूद/चाय पीकर गए मेहमानों के कप में बचीचॅट भर चाय की तरह/बचा रह जाऊँगा मैं कुछ न कुछ/जबजब आएगा हवा का झोंका/डाल से टूटे पीले पत्ते की तरह उड़कर/आ जाऊँगा तुम्हारे आँगन में।'' संग्रह की अंतिम कविता 'पीले पड़ते प्रेम-पत्र' में कवि अंतिम पंक्तियों में लिखता है- “जब तक वो बचे रहेंगे तुम्हारे पास/शायद तब तक मैं भी बचा रहूँ इस धरती पर...''


    देखा जाए तो कवि हर हाल में प्रेम को बचाए रखना चाहता है दुनिया में। क्योंकि प्रेम ही वह तत्व है, जिस पर दुनिया टिकी हुई है...। लोग तो आते-जाते रहेंगे दुनिया में| तमा पर दुनिया का बचा रहना हर हाल में जरूरी है और वह तभी बची रह सकती है, जब बचा रहेगा दुनिया में प्रेम। प्रेम पर आधारित कविताओं का यह संग्रह-''कई-कई बार होता है प्रेम'' समकालीन हिंदी कविता के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अशोक सिंह एक जरूरी और सार्थक कवि के रूप में इस संग्रह में उपस्थित हैं। समाज-संस्कृति-व्यवस्था...और प्रेम के गहरे प्रभावों को समझने के लिए उनकी इन कविताओं से गुजरना जरूरी है। ये कविताएँ पाठकों के मन-मस्तिष्क पर दस्तक देती हैं और जीवन का प्रतीक बन जाती हैं। इस दृष्टि से यह कविता संग्रह बेहद पठनीय हैकवि को इस संग्रह के लिए मेरी हार्दिक बधाई।


        सम्पर्क : श्रीमन्त, प्लॉट नं. जेड भी. स्वामी विवेकान्द नगर, फलटन, सतारा, महाराष्ट्र मो. नं.: 9560180202