लघु कथा - प्रतिशोध - मार्टिन जॉन

मार्टिन जॉन


शताधिक कविताएँ, लघु कथाएँ, पत्र-पत्रिकाओं, वेब मैगजीन, ब्लॉग, फेसबुक समूहों में प्रकाशित। संकलनों में संकलित। आकाशवाणी से प्रसारित । प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत रेखाचित्र, कविता, पोस्टर बनाने में विशेष रुचि। दर्जनों कविता पोस्टर प्रदर्शितपत्रिकाओं में रेखाचित्र प्रकाशित। लघुकथा संग्रह 'सब खैरियत है' और कविता-संग्रह 'ग्राउंड जीरो से लाइव' प्रकाशित।


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प्रतिशोध


वे तीनों इज्ज़तदार और रसूखदार परिवारों के बिगडैल युवा थे।


     वे अपनी घिनौनी हरकतों में फिर एक बार इजाफा करते हुए आज भी एक लड़की को अगवा कर एक सुनसान इलाके में ले गए। लड़की तड़पती रही, छटपटाती रही, रोरोकर रहम करने की मिन्नतें करती रही। लेकिन उन वहशियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वे अमानुषिक ढंग से बारी बारी उसकी अस्मत से खिलवाड़ करते रहे।


     इस कुकृत्य को अंजाम देकर वे तीनों अपनी लग्ज़री कार में सवार होकर जैसे ही भागने को उद्धत हुए, रोती हुई, निढाल लड़की झटके से उठ बैठी। पुलिस, थाना, कोर्टकचहरी कानून से परे अचानक उसके दिमाग में इन वहशियों के लिए एक ऐसी सजा बिजली की मानिंद कौंधी और वह ठठाकर हँस पड़ी। उनकी बर्बरता को झेलने के बाद भी उस लड़की को इस तरह हँसते देख उनपर हैरानगी और घबराहट का भयमिश्रित भाव तत्काल तारी हो गया। उनमे से एक ने बेहूदगी से पूछा, 'पगला गई है का रे?...काहे हँस रही है?'


      लड़की की हँसी पूर्वापेक्षा तेज हो गई, 'तुम सब जीते जी मारे जाओगे .....धीरे-धीरे !'


       क्या बकती है बे?'


      'बक नहीं रही हूँ....सच कह रही हूँ।'


       'तो, बोल न !... कैसे?'


       'मुझे एड्स है!'


       तीनों के दिमाग में एक भयंकर विस्फोट हुआ और तत्काल उन्हें अपने-अपने भविष्य के चिथडे-उड़ते नजर आने लगे।