संस्मरण - खुशनुमा अतीत का मेरा शहर... आज मौन है...!! - विभांशु वैभव

अभिनेता, निर्देशक, लेखक। प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश में जन्म, भारतेन्दु नाट्य अकदमी, लखनऊ से नाट्य कला में डिप्लोमा, श्री राम सेंटर फॉर परफार्मिंग आर्ट्स, दिल्ली के रंगमंडल प्रमुख रहे। देश के प्रसिद्ध नाट्य निर्देशकों के साथ कार्य किया। अनगिनत नाटक लिखे जिनमें मुख्य - महारथी, बाबूजी, गुंडा, मंथन, कहो तो बोलू, ए सोल सागा, ठुमरी। इन दिनों मुंबई में।


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मेरा शहर इलाहाबाद और मैं इलाहाबादी। अभी परिवर्तित नाम प्रयागराज में वो बकैती नहीं, वो आनन्द नहीं, इसलिए हम खुद को इलाहाबादी ही कहलाना पसन्द करेंगे। इलाहाबाद सिर्फ एक शहर नहीं, एक संस्कृति है, एक परम्परा है, अपनी स्मृतियों को सहेजे एक जीवन्त दस्तावेज है। यहां की माटी में कला है, साहित्य है, राजनीति है और एक बेलौस बकैतों की दबंगई है जो किसी अन्य शहर में देखने को नहीं मिलेगीसुबह जो दूध जलेबी खा के दिन की शुरुआत होती है, शाम होते ही संगम का किनारा याद आता है। नेतराम की कचौड़ी, सुलाखी की मिठाई, हरि के समोसे, हाईकोर्ट का लिट्टी चोखा, कॉफी हाउस की कॉफी, डोसे, देहाती का रसगुल्ला, हर मोहल्ले चौराहे पर खड़े होने वाले चाट के ठेले, खोखाराम का दही बड़ा..., और सबसे बढ़कर इलाहाबादी अमरूद, क्या-क्या याद दिलाएं, याद आते ही मुंह में पानी आ रहा हैघूमने के लिए संगम का किनारा, इलाहाबाद हाईकोर्ट, विश्वविद्यालय, आनंद भवन, कम्पनी गार्डेन, बांध पर लेटे हनुमान जी, खुसरू बाग की पुरानी इमारतें, दारागंज की तंग गलियां, सिविल लाइन्स की खूबसूरती कुछ भी भुलाए नहीं भूलता। जो भी इस शहर में रहा उसने खुद को इलाहाबादी कहलाने का गौरव प्राप्त किया है।


    धार्मिक, शैक्षणिक और राजनीतिक पटल पर सर्वोपरि रहने वाला शहर। पुरानी मान्यता के अनुसार इस शहर को ब्रह्मा की यज्ञ स्थली के रूप में जाना जाता है। १५५७ में सम्राट अकबर ने इस शहर की स्थापना की, संगम के तट पर भव्य किले का निर्माण किया। १८५८ में अंग्रेजों ने अकबर के इलाहावास को इलाहाबाद करके आगरा अवध प्रान्त की राजधानी बना दिया। ऐतिहासिक और पौराणिक दोनों ही रूप से इलाहाबाद एक समृद्ध शहर है। ये मात्र गंगा जमुना सरस्वती का संगम ही नही हमारी संस्कृतियों के संगम का शहर है। यहां देश भर से लोग आते हैं, ज्यादातर पढ़ने और कुछ रोजगार की तलाश में। इसी शहर ने इस देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिए हैं, जवाहर लाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह। पर्यटन का मुख्य केन्द्र, महाकुम्भ, अर्द्धकुम्भ और माघ के मेले में देश-विदेश से आए हुए लोग इस शहर की शोभा बढ़ाते है ।


    मैं इलाहाबाद में रहा हूं और अब इस शहर से बाहर रह रहा हूं, इसलिए मैं इसकी खूबियां और खामियां दोनों को पूरी तटस्थता से बयान कर रहा हूं। इसे मैं नजदीक से भी देख रहा हूं और दूर से भी। यह शहर मेरी पहचान, मेरे अस्तित्व का हिस्सा है। मेरी जड़ें इस शहर से गहरी जुड़ी हैं, शहर का नाम जो चाहे बदल जाए लेकिन मैं इस शहर से कभी अलग नहीं हो सकता। यह अलग बात है कि प्रतिभा पलायन जितना इलाहाबाद से हुआ है, उतना किसी अन्य शहर से नहीं। इस शहर ने इतनी महान् विभूतियां दी हैं, इतने अद्वितीय रचनाकार दिए हैं जो कोई अन्य शहर कभी सोच भी नहीं सकता। बिना इस शहर से गुजरे कोई महान् साहित्यकार नहीं बना, वो चाहे पन्त हों, निराला हों, महादेवी, बच्चन, इलाचन्द्र जोशी, रघुपति सहाय फिराक, भैरवप्रसाद गुप्त, रामकुमार वर्मा, उपेन्द्रनाथ अश्क, बलवन्त सिंह, श्रीपतराय, अमृतराय, धर्मवीर भारती, अमरकान्त, शेखर जोशी, मार्कण्डेय, कमलेश्वर, दुष्यन्त, लक्ष्मीकान्त वर्मा, विजयदेव नारायण साही, नरेश मेहता, डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, विपिन कुमार अग्रवाल, रघुवंश, जगदीश गुप्त, मलयज, श्रीराम वर्मा, शैलेश मटियानी, दूधनाथसिंह, रवीन्द्र कालिया, गिरिराज किशोर, इस सूची का कोई अन्त नहीं है। अज्ञेय जी इलाहाबाद में काफी रहे और जीवनपर्यन्त आते जाते रहे। फणीश्वरनाथ रेणु ने यहां की ज्ञान गंगा में डुबकी मारी तब जाकर मैला आंचल को प्रसिद्वि मिली। मोहन राकेश भी अपनी मां के साथ यहां रहे, यहां से जाने के* बाद पूरी जिन्दगी घर की तलाश में भटकते रहे, मकान कई मिले पर घर नहीं। नेमिचन्द्र जैन ने भीइलाहाबाद में साहित्यिक तपस्या की थी।


    इलाहाबाद के बारे में यह प्रसिद्व है कि ये शहर बाहर से आए लोगों को बहुत जल्द अपना लेता है। लेकिन जिसने इस शहर को छोड़ा, इस शहर ने भी उसको छोड़ दिया। सर्दियों में ठिठुरता हुआ, गर्मियों में दहकता हुआ, पेरिस जैसी गरिमा लिए यह तीर्थराज प्रयाग। इसी इलाहाबाद में रहकर निराला जी ने लिखा था- वो तोड़ती पत्थर, देखा मैंने उसे, इलाहाबाद के पथ पर। पढ़ाकुओं और काले कोट वाले वकीलों का शहर। चलो में.., कस में..., कस जैसे शब्दों को बोलना इलाहाबादी होने की प्रामाणिकता है। इलाहाबाद पूरी तरह से आपको समर्पित होता है, जो अपना सबकुछ दे देता है, बिना किसी आशा या प्रत्याशा केयह मन मोहने वाला शहर हैजो आपके भीतर एक बेलौस भक्ति जगाता है, एक राग पैदा करता है जो दोस्ती करना सिखाता है। जहां साहित्य और राजनीति की चर्चा हर चौराहे और गली मुहाने पर होती है। जहां संगम के किनारे या डाट के पुल पर, या किसी पुलिया पर आप अकेले बैठकर घण्टों गुजार सकते हैं, आपको अकेलेपन का एहसास नहीं होता क्योंकि यह शहर हमेशा, हर जगह आपका साथ देता है जो कभी किसी से जी नहीं चुराता।


    इस शहर में पत्रकारिता का भी एक बृहद इतिहास है। इलाहाबाद में पत्रकारिता के जनक जूलियन रॉबिन्सन और जार्ज एलेन थे। १८६५ में इलाहाबाद में पायनियर नामक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। यह सरकारी पक्ष का मुख्य पत्र था और उसे एग्लो इंडियन समाज का प्रतिनिधि समझा जाता था। १८७९ में उत्तर प्रदेश के प्रथम राष्ट्रवादी अंग्रेजी पत्र इंडियन हेराल्ड का प्रारम्भ पंडित अयोध्यानाथ ने किया। वह पायनियर का सामना तीन वर्षों तक करता रहा किन्तु पर्याप्त सहयोग के अभाव में १८८२ में इसका प्रकाशन बन्द हो गया। पं. अयोध्यानाथ ने इसके बाद १८९० में इंडियन यूनियन का प्रकाशन आरम्भ किया। १८९२ 9 में अयोध्यानाथ के निधन के बाद इसका प्रकाशन भी बन्द हो गया। सदासुख लाल ने १८६८ में वृतान्त दर्पण नामक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया, दो वर्षों पश्चात यह इसी इलाहाबाद में २६ जून १८७४ पत्र पूर्णरूप से कानूनपत्र हो गया। को हाईकोर्ट के वकील रतनचन्द्र ने नाटकों के मासिक - नाटक प्रकाश का प्रकाशन प्रारम्भ किया। १८७५ में पंडित शिव राखन शुक्ल ने प्रयाग धर्म प्रकाश नामक मासिकपत्र का प्रकाशन शुरू किया, जिसमें धार्मिक कार्यों की सूची छापी जाती थी। १ सितम्बर १८७७ को कायस्थ पाठशाला के बालकृष्ण भट्ट ने -हिन्दी प्रदीप का प्रकाशन किया जो विक्टोरिया प्रेस से छपता था। १९१० में प्रेस अधिनियम के आने पर इसका प्रकाशन सदैव के लिए बन्द हो गया। १८७८ में इलाहाबाद में प्रथम जातिवादी पत्र -कायस्थ समाचार प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष - ज्ञान चन्द्रोदय नामक मासिक पत्र छापा गया। देवकी नन्दन त्रिपाठी ने १८८० से १९८१ तक प्रयाग समाचार का प्रकाशन अपने सम्पादन में किया। १८८६ में - रसिक पंच और १८८७ में प्रयाग मित्र का प्रकाशन शुरू किया। १९०० में हिन्दी की युगप्रवर्तक मासिक पत्रिका- सरस्वती का प्रकाशन हुआ जिसके सम्पादक समिति में बाबू जगन्नाथ रत्नाकर, पं किशोरी लाल गोस्वामी, बाबू राधाकृष्ण दास और कार्तिक प्रसाद खत्री थे। १९०३ में इसका सम्पादन महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सम्हाला। आर्य बाल हितैषी- बच्चों के लिये पत्रिका छापी गई। १९०७ में स्वराज्य आया, इसके कुल ७५ अंक निकले। सरकार की दृष्टि में आपत्ति जनक सामग्री के प्रकाशन के अपराध में इसके सम्पादकों को दंडित किया गया। १९०७ में बसन्त पंचमी के दिन मदनमोहन मालवीय ने - अभ्युदय- साप्ताहिक का प्रकाशन किया। १९०९ में अंग्रेजी पत्र- लीडर आया। रौलेट कमीशन की रिपोर्ट में इन कई समाचार पत्रों को सरकार विरोधी बताया गया। १९१४ में चन्द्रशेखर ओझा शास्त्री ने संस्कृत पत्रिका-शारदा का सम्पादन और प्रकाशन किया। १९१५ में प्रयाग की विज्ञान सम्पादन और प्रकाशन किया। १९१५ परिषद ने विज्ञान मासिक पत्रिका छापी। १९१७ में इंडियन प्रेस ने बच्चों का मासिक निकालासप्रयासी, भविष्य, सेवा, किसान आदि समाचार पत्र भी १९२०- २१ के बीच छापे गए। १९२२ में रामरिख सिंह सहगल के सम्पादन रहा में विविध विषयों वाली पत्रिका निकली- चांद, जिसके कुछ अंक का सम्पादन आचार्य चतुरसेन न शास्त्री ने किया था। आजादी के बाद तो इलाहाबाद से कई दैनिक समाचार पत्र निकले- लीडर, हिन्दू, नार्दर्न इण्डिया पत्रिका, अमृत प्रभात, दैनिक जागरण आदि।


     रंगमंच का भी एक समृद्ध इतिहास इस शहर का है। यहां की हवा में कुछ कर गुजरने का जज्बा है, यहां की हर बात निराली है। अकबर इलाहाबादी, फिराक, निराला, महादेवी और बच्चन के इस शहर में अचानक कुछ बदलाव सा गया है। यह बदलाव जमाने का है या प्रतिभा पलायन का है, अब इस शहर की रोचकता में कही कोई कमी आई है। ये त्रासदी है इस मेरे शहर की जो धीरे-धीरे अपनी पहचान खो रहा है। कॉफी हाउस में अब वो जमावड़ा नहीं, पुराने लोगों को बिसरा दिया गया है। किसी को किसी से कोई संगत नहीं। जो बच गए हैं वो भी बस पुराने दिनों की याद में खोए अपने आप में सीमित हो गए हैं। कुछ लोग सिर्फ अपनी पीठ ठोकते दूसरों की प्रतिभा को नकारते है। अपनी मौलिकता, रचनात्मकता और कर्मठता के लिए जाना जाने वाला शहर आज सिर्फ अपनी झूठी अकड़ लिए खड़ा हैआज इलाहाबाद जाने पर यह शहर असहाय सा लगता है, जैसे इस शहर का वो जादूगर, वह रखवाला, वह चितेरा कहीं खो गया। मॉल बन रहे हैं, फ्लैट बन रहे हैं, मल्टी स्टोरी बन रही हैं, पर शहर की वो रौनक नहीं। कोई साथी कह रहा था कि अब यह शहर किसी की चाहत पूरी करने की क्षमता नहीं रखता। मेरे इलाहाबादी साथी शायद मेरे इस बात से इत्तफाक न रखें, नाराज भी हो सकते हैं लेकिन मेरे पास अतीत की खुशनुमा यादों का जो गुलिस्ता है, उसके आगे वर्तमान में कुम्हलाई कली है। अब उचके, गुण्डे, मवाली इस शहर की पहचान बन गए हैं। लूटपाट, हिंसा, रक्तपात इस शहर में बढ़ता जा रहा है।


    अब यह शहर बेचैनियों का शहर है, धर्मवीर भारती के गुनाहों के देवता में जिस इलाहाबाद का बयान है, वह अब ढूढे से भी नहीं दिखेगा। बहुत कुछ उजड़ गया है, बहुत कुछ सूख गया, हमारा वह अनूठा, मनमोहक शहर, रोमाटिक शहर लगता हैमाघ मेले में खो गया है। कहीं कुछ तो असंतुलित है, कुछ तो टूट रहा है। आजादी के बाद देश की सर्वोच्च सत्ता का केन्द्र इलाहाबाद था, ध्रुव तारे की तरह चमकने वाले शहर की चमक फीकी पड़ने लगी है। इलाहाबाद ना तो अपना पुराना बचा पाया और न कुछ नया बना पाया। इतनी ज्यादा गिरावट किसी शहर में आई हो, यह मैं नहीं कह सकता। हमारे अस्तिव और पहचान का शहर कब, कैसे कमजोर और असफल हो गयाजिस शहर को बहुत आगे जाना था, वह पिछड़ कैसे गया है? इतना अनूठा और समृद्व इतिहास लिए जो शहर लोगों के लिये प्रेरणा स्थली था, लगता है इसे किसी की नजर लग गई है। इलाहाबादी बकैती की आत्मा ने नया चोला पहन लिया है। मैं आज ढूंढ रहा हूं फिराक के गुले नगमा को, अमरकान्त की कहानियों को, दूधनाथ सिंह के पात्रों को, महादेवी के प्रसंगों कोमैं आज अपने ही शहर से पूछता हूं- कस में ...... लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिलता। मेरा शहर मौन है, न जाने कब यह अपनी चुप्पी तोड़ेगा, ना जाने कब.....?