संस्मरण - इलाहाबाद कनेक्शन : किस्सा बॉलीवुड-इलाहाबाद संबंधों का - रवीन्द्र श्रीवास्तव

इलाहाबाद इंटर कॉलेज से प्रारंभिक शिक्षा। इविंग क्रिश्चियन कॉलेज इलाहाबाद से उच्च शिक्षा। तत्पश्चात् पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश। दैनिक लोकस्वामी मिडलैंड ऑबजर्वर के भूतपूर्व प्रधान सम्पादक। नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान टाइम्स में विभिन्न पदों पर कार्य। प्रसिद्ध पत्रिका धर्मयुग में मुख्य उपसंपादक के रूप में कार्य। सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन।


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संभवतः जनवरी, १९५४। उस वर्ष इलाहबाद में महा-कुंभ लगा था, जिसमें भाग लेने के लिए दुनिया भर से लाखों-करोड़ों की भीड़ इकट्ठा हुई थी और उसी महाकुंभ में सैकड़ों तीर्थयात्रियों की नागाओं के जुलूस के दर्शन में हुई आपाधापी और संगम के दलदल में फंसने से सैकड़ों तीर्थयात्रियों की अकाल मौतें हुई थीं। उसके बाद नियम बना दिया गया था कि फिर कभी सार्वजनिक जुड़ावों में भारी मात्रा में शीर्षस्थ नेताओं और वी.आई.पी. की एक साथ मौजूदगी नहीं होगी; क्योंकि इससे पुलिस और सुरक्षा बलों की अधिकांश संख्या उनकी सुरक्षा में लग जाती है और आम आदमी पर से उनका ध्यान हट जाता है। गौरतलब है कि आजादी के बाद पड़े उस प्रथम महाकुंभ में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू से लेकर कोई बड़ा नेता नहीं था, जो सपरिवार वहां इकट्ठा नहीं हुआ था।


कपूर खानदान की इलाहाबाद दीवानगी!


उसी महाकुंभ के सर्वाधिक आकर्षणों में एक था-पृथ्वीराज कपूर का पृथ्वी थिएटर्स, जो वहां रोजाना नए-नए नाटकों की मंच-प्रस्तुति करता--दीवार, पठान आदि नाटकों के नाम आज भी, ६८ वर्ष बाद भी, मुझे याद हैं। तब इन नाटकों में पापा जी के तीनों बेटे-राज कपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर और शंकर जयकिशन आदि तमाम लोग नियमित रूप से भाग लेते, नाटकों में एक्टिंग से लेकर म्युजिक विभाग और दूसरे विभागों में सक्रिय रूप से भाग लेते। उस महाकुंभ में शामिल होनेवाले तमाम मेहमान मेरे घर पर भी इकट्ठा हुए थे। मेरे पिता जी इलाहाबाद के प्रख्यात् समाचार ग्रुप लीडर प्रेस में एकाउंट्स आफिसर थे, सो वे सभी के लिए पृथ्वी थिएटर्स के नाटकों के लिए ग्रुप पास लाए थे। हमने पृथ्वी थिएटर्स के न केवल सभी नाटक देखे, बल्कि पृथ्वीराज कपूर से लेकर राज कपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर और शंकर जयकिशन आदि तमाम लोगों से मुलाकात और बातचीत भी की। उस समय मेरी उम्र ११ वर्ष की थी। किसी फिल्म सितारे से मिलने का वह पहला मौका था।


      पृथ्वीराज कपूर को इलाहाबाद इतना भा गया कि वे अकसर अपने पृथ्वी थिएटर्स के नाटकों के मंचन के लिए आने लगे, साथ ही समय निकाल कर इलाहाबाद के साहित्यकारों, नाटककारों और रंगकर्मियों से मिलते और उन्हें अपने नाटक देखने के लिए आमंत्रित करते। प्रख्यात् एकांकीकार डॉ. रामकुमार वर्मा, जो प्रख्यात् नाटककार के साथ-साथ हिंदी विभाग, इलाहाबाद के अध्यक्ष भी थे, से उनके घर पर मिलने गए तो उन्होंने उनके सम्मान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों की प्रमुख शख्सियतों, प्रसिद्ध लेखकों आदि के साथ-साथ प्रेसवालों को भी आमंत्रित कर लिया। इनमें मैं भी था। १९५४ में जब ११ वर्ष की उम्र में मैं उनसे पहली बार मिला था, तब इन सबकी मुझे खास समझ नहीं थी, लेकिन अब एक बड़े अखबार समूह में पत्रकार था। उनसे तब न केवल तमाम विषयों पर तब लंबी बातें हुई थीं, मैंने उनका अलग से एक लंबा इंटरव्यू भी लिया था।


       इसके वर्षों बाद इलाहाबाद रेलवे स्टेशन से होते हम कुछपत्रकार मित्र, काफी हाउस, सिविल लाइंस से वापस ‘दैनिक भारत' कार्यालय नाइट शिफ्ट करने जा रहे थे, अचानक रेलवे पुल पर हलचल और भारी भीड़ दिखलाई पड़ी। दरअसल हम काफी हाउस से दस-पंद्रह मिनट पैदल टहलते हुए या सायकिल से रेलवे स्टेशन आते और रेलवे ब्रिज पार कर बाहर आ जाते, फिर वहां से आफिस पहुंच जाते। यह हमारा शॉर्टकट रास्ता था। उस दिन भी ज्योंही रेलवे ब्रिज पर पहुंचे, राज कपूर अपनी भारी-भरकम यूनिट के साथ बांबे मेल से उतर कर पुल के सिविल लाइन वाले निकास की तरफ जा रहे थे। उनके गिर्द लोगों का मजमा जुटा हुआ था। चूंकि हमारी ड्यूटी का टाइम हो गया था और राज कपूर का आना कोई बहुत बड़ा इवेंट नहीं था कि रुक कर पता लगाया जाए राज कपूर के इलाहाबाद आने का मकसद और उनके प्रोग्राम के बारे में तो पीटीआई से भी पता चल जाता, इसलिए हम सीधे दफ्तर चले आए। वहां आने पर चपरासी ने चीफ रिपोर्टर की स्लिप थमाई, जिसके अनुसार कल मुझे सुबह ११ बजे अपने प्रेस फोटोग्राफर के साथ संगम पहुंचना था।


    दूसरे दिन निर्देशानुसार मैं संगम पहुंच गया, लगभग ४-५ घंटे बाद राज कपूर अपने लाव-लश्कर के साथ आएउन्होंने एक बड़ी नौका में सवार हो अपनी फिल्म 'संगम' के अंतिम सीन--राजेंद्रकुमार के अस्थिविसर्जन की शूटिंग शुरू की जो तीन दिन तक चलती रही। इसी दौरान समय पाकर उनसे बात की और उन्हें बतलाया कि मैं उनसे ११ वर्ष की अवस्था में पहली बार महाकुंभ में आयोजित पृथ्वी थिएटर्स के नाटकों में किस तरह मिला, फिर उसके उसके दस वर्ष बाद पापा जी से लंबी मुलाकातों और उनके इंटरव्यू के बारे में बतलाया तो वे बहुत खुश हुए और बोले, “तीन दिन तक मेरी लगातार शूटिंग है, चौथे दिन तुम शाम को होटल में आ जाना, कॉकटेल और डिनर मेरे साथ ही लेना।'' फिर पास खड़े अपने सेक्रेटरी से मेरा परिचय कराते हुए बोले, होटल के रिसेप्शन में पहुंच कर इनसे मिल लेना। यह सब इंतजाम कर देंगे....।'' नियत दिन मैंने उनका लंबा इंटरव्यू भी लिया। उनका कहना था कि चाहे वे कोई भी फिल्म बनाएं या उसकी परिकल्पना गंगा, यमुना, संगम और इलाहाबाद के बिना कर ही नहीं सकते। उन्हें अपने एक फिल्म के गाने 'मेरा दिल है। हिंदुस्तानी, मेरा जूता है जापानी, सिर पे लाल टोपी रूसी...' की शूटिंग इलाहाबाद आकर करनी पड़ी--फाफामऊ से प्रतापगढ़ की सड़कों पर!


    राज कपूर से इस मुलाकात के पहले मेरी मुलाकात अभिनेत्री नंदा, हास्य अभिनेता मुकरी आदि से बमरौली एयरपोर्ट पर हो चुकी थी। दरअसल पत्रकारिता में आने के कुछ ही दिनों बाद इलाहाबाद नगरपालिका और सिटी मेयर का चुनाव होनेवाला था। इस संबंध में सर्वेक्षण के लिए मेरी भी ड्यूटी लगी थी-खुल्दाबाद से बमरौली-मनौरी तक का एरिया मुझे कवर करना था; इसलिए अपने एक मित्र के साथ सायकिल से सुबह नौ बजे ही निकल गया। लगभग १२ बजे, तमाम इलाकों से होता हुआ, मैं बमरौली हवाई अड्डे पहुंचा। ठीक उसी समय वाराणसी से मुंबई जा रही फ्लाइट हवाई अड्डे पर उतरी थी। फ्लाइट में सवार यात्री उतर कर हवाई अड्डे के भीतर रेस्तरां में चले गए थे। तभी मेरी निगाह उसके बाहर टहलते हुए हास्य अभिनेता मुकरी पर पड़ी तो मैं उनके पास जाकर अपना परिचय दिया। चूंकि उस फ्लाइट को दो घंटे तक एयरपोर्ट पर रुकना था, इसलिए मुझे उन सबका इंटरव्यू लेने का मौका मिल गया।


   बालीवुड का इलाहाबाद आकर्षण


दरअसल इलाहाबाद बॉलीवुड के फिल्मकारों का शुरू से ही आकर्षण का केंद्र रहा है, मूक फिल्मों के जमाने से ही फिल्मकार अपनी फिल्मों की शूटिंग के लिए इलाहाबाद आते रहे हैं, भले ही वे सिर्फ संगम या इलाहाबाद के किसी एक हिस्से की शूटिंग कर वापस लौट जाएं। कमाल अमरोही ने तो अपनी प्रथम निर्देशित फिल्म 'महल' का केंद्र स्थल ही इलाहाबाद और नैनी बनाया था। यह बात दूसरी है कि वे अमरोहा के रहनेवाले होने के बावजूद फिल्म की कहानी में यह कह गए कि कानपुर से इलाहाबाद जाते समय रास्ते में नैनी पड़ता है, जबकि नैनी इलाहाबाद के बाद पड़ता है। लेकिन इनमें से किसी का भी ध्यान इलाहाबाद का विकास करने पर नहीं गया सिवाय नर्गिस के। नर्गिस के पूर्वज हडिया, जो इलाहाबाद के पास ही स्थित है, के रहनेवाले थे। वे एक बार अपने पूर्वजों की जन्मस्थली देखने खास तौर इलाहाबाद आईं। तब उन्होंने हँडिया और इलाहाबाद के विकास के लिए प्लान बनाया और उसे कार्यान्वित करने का काम शुरू किया तभी एक घटना घट गई।


     एक बार प्रयाग संगीत समिति के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए वे इलाहाबाद आई तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय व कालेज छात्रों ने उनके विरुद्ध न केवल आंदोलन छेड़ दिया; बल्कि किसी भी कार्यक्रम में उनका भाग लेना दूभर कर दिया। छात्रों के इस व्यवहार से उन्होंने खुद को न केवल बहुत ही अपमानित महसूस किया; बल्कि बहुत ही क्षुब्ध भी हुई। तभी उन्होंने कसम खा ली कि चाहे कुछ भी हो जाए, वे कभी भी इलाहाबाद का भूलकर भी रुख नहीं करेंगी। और न ही वे कभी आई। फलतः हडिया और इलाहाबाद के जिस विकास का उन्होंने सपना देख रखा था, जो प्लानिंग बना रखी थी, वह इलाहाबादियों के उल्टे बांस बरेली' वाले तेवर के कारण अधूरा रह गया। और इलाहाबाद एक आधुनिक सांस्कृतिक महानगार बनते-बनते रह गया। इसकी सारी दास्तान खुद नर्गिस जी ने मुझे मुंबई में कह सुनाई थी, जब मैं पहली बार उनसे मिला था। तब वह इतने गुस्से में थीं कि यह पता चलते ही कि मैं इलाहाबाद का रहनेवाला हूं, उन्होंने मुझसे बात करने से ही मना कर दिया था। इसके बहुत-बहुत बाद १९८४-८५ में अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद, जहां के वे रहनेवाले थे और जहां उनके बचपन के सुनहरे दिन बीते, के सुधार की तब तमाम योजनाएं बनाई, जब उन्होंने इलाहाबाद से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा और भारी मतों से हेमवतीनंदन बहुगुणा को हरा कर सांसद बने; लेकिन सोनिया गांधी के अपमानजनक व्यवहार के कारण लोकसभा और कांग्रेस के साथ-साथ राजनीति से भी संन्यास ले लिया। भले ही वे बॉलीवुड में गंगा किनारे छोरा' और इलाहाबाद के खासे प्रतीक बनकर दोनों हाथों स्टारडम भुनाते रहे, लेकिन इलाहाबाद उनके लिए ठंडे बस्ते की बासी पड़ी चीज' बन कर ही रह गया।


    जिस वर्ष अमिताभ बच्चन अपनी किस्मत आजमाने मुंबई आए उसी वर्ष रेहाना सुल्ताना भी मुंबई आईं। उनसे मेरे दोस्त बाबूराम इशारा ने, जिन्हें सब ‘बाबू दा' कहते थे, परिचय कराया था। बाबू दा अपनी प्रथम फिल्म 'चेतना में रेहाना सुल्ताना, अनिल धवन, शत्रुघ्न सिन्हा आदि को इंट्रोड्यूस कर रहे थे। रेहाना की पढ़ाई-लिखाई इलाहाबाद में हुई थी, उनके पिता की खुल्दाबाद में बिजली की दूकान थी। बाद में बाबूदा और रेहाना ने विवाह कर लिया।


     'धर्मयुग' में मेरे वरिष्ठ सहयोगी प्रेम कपूर ने, जो अहियापुर के रहनेवाले थे, उन्हीं दिनों इलाहाबाद पर एक लंबी डाक्यूमेंट्री फिल्म 'त्रिवेणी' बनाई थी, लेकिन फिल्म्स डिवीजन उसकी खरीद में अड्गे लगा रहा था, तब नौशाद साहब ने मेरे अनुरोध पर महबूब स्टूडियो में उसका ट्रायल शो आयोजित किया, जिसमें दिलीपकुमार, के. आसिफ तथा कई फिल्मी हस्तियों के साथ-साथ फिल्म्स डिवीजन के कई आला अफसरों को भी बुलाया। ‘त्रिवेणी' के मार्ग के सारे रोड़े मिनटों में खतम हो गए।


     बहरहाल ‘बालीवुड-इलाहाबाद' पुराण इतना लंबा है। कि कभी भी खतम होनेवाला नहीं। लेकिन यहां प्रख्यात् संगीतकार नौशाद अली और बालीवुड के मसीहा माने जानेवाले महबूब खान का जिक्र करना जरूरी हैइनमें से एक का बचपन इलाहाबाद में बीता, इलाहाबाद उनकी हमेशा कमजोरी रहीदूसरे ने इलाहाबाद को लेकर फिल्में बनाने के तमाम सपने पाल रखे थे; लेकिन वक्त और अल्लाहताला ने उन्हें पूरा करने की मोहलत ही नहीं दी।


नौशाद : वह अपना इलाहाबाद!


     खुशरोबाग में क्या अब भी आम और अमरूद पैदा होते हैं? एक दिन नौशाद साहब ने मुझसे एकबारगी पूछा तो मैं चौंका। उल्टे मैंने पूछा, “लेकिन इलाहाबाद के बारे में इतनी बारीकी से आपको कैसे मालूम? आप वहां के बारे कैसे जानते हैं?''


    उन्होंने कहा, “अरे भई, मेरा बचपन वहां बीता है! तब तक तो आपका जन्म भी नहीं हुआ होगा। उन दिनों गंगा के किनारे रेत में हरे-हरे तरबूज और खरबूज खूब होते थे, इतने मीठे कि उनकी याद आते ही आज भी मुंह में पानी भर आता है। हरे रंग के धारीदार तरबूजे, लेकिन भीतर से एकदम सुर्ख लाल। इतने कोमल कि उतने बड़े तरबूजे को लोगबाग हल्का -सा मुक्का मार कर उसके दो-फाड़ कर देते थे! वहां एक और जगह थी, उसका नाम याद नहीं आ रहा है। वहां बहुत बड़े आकार के अमरूद तब पैदा होते थे, चिंदियोंदार बहुत ही मीठे! कुछ अमरूद तो एकदम हरे होते, लेकिन भीतर से सुर्ख लाल! ऊपर से खाने में शहद से भी मीठे! अब तो लंबा जमाना गुजर गया है, शायद यह सब अब पैदा नहीं होते होंगे वहां!''।


    "नहीं, नहीं, ये सब खतम नहीं हुए हैंअभी भी ये सब वहां खूब पैदा होते हैं, अब तो इनका खूब एक्सपोर्ट भी होता है!'' मैंने मुस्कराकर कहा, “जिन जगहों के आपने नाम बतलाए, वे सभी जगहें आज भी इलाहाबाद में जैसे के तैसे हैं। आम, अमरूद, तरबूज, खरबूज-ये सब वहां अभी भी खूब पैदा होते हैं। आज भी उनका वही स्वाद है, वही रूप-रंग, वही मिठास ! कुछ भी नहीं बदला है, सिर्फ समयभर बदला है।''


   तभी मुझे एक बात याद आई, मैं बोला, “इलाहाबाद के जिस जगह का नाम आपको याद नहीं आ रहा था, उसका नाम भभकरपुर है, वहां आज भी दर्जनों-दर्जनों वेरायटीज के अमरूद पैदा होते हैं....


    मेरी बात पर वे मुस्कराने लगे, ‘‘हां, हां, भभक्करपुर ! वहां के अमरूदों का मैं दीवाना रहा। मेरे बचपन के दिन इलाहाबाद के राजापुर मोहल्ले में गुजरेज्यादातर लोगों को यही मालूम है कि मैं लखनऊ का रहनेवाला हूं, आप इलाहाबाद के रहनेवाले हैं। आपको देखकर मुझे इलाहाबाद की यादें ताजा हो आती हैं, हालांकि वे बहुत धुंधली हैं; क्योंकि तब मैं बहुत छोटा था। बहुत मन करता है कि इलाहाबाद एक बार हो आऊं; लेकिन वक्त है कि इजाजत ही नहीं देता! अब जब आप यहां आ ही गए हैं तो कभी आपके साथ इलाहाबाद चलूंगा, वहां का आम, अमरूद, तरबूज-खरबूज खाने....उस इलाहाबाद को फिर से देखने, जिसे बचपन में देखा था। अब उसे अपनी भरपूर नजरों से देखना चाहता हूं....''


      इलाहाबाद! उसी इलाहाबाद, जहां कभी नौशाद का बचपन गुजरा था; उसके बहुत-बहुत बाद उसी इलाहाबाद में मेरा बचपन गुजरा था। और उसके बहुत-बहुत बाद हम दोनों ही मुंबई में थे-एक देश का बहुत बड़ा संगीत निर्देशक, दूसरा पत्रकारिता के पांवदान पर खड़ा युवक!


    है। कानपुर से इलाहाबाद शहर में प्रवेश करने वाली सड़क सुलेमसराय से हाईकोर्ट पहुंचते ही दो भागों में विभक्त हो जाती है, एक सड़क दाईं तरफ से होकर खुल्दाबाद, कोतवाली, कीडगंज होते हुए यमुना नदी पार कर नैनी फिर कोलकाता की तरफ निकल जाती है। इसी सड़क का दूसरा हिस्सा शहर के बीचोबीच से-स्टेशन, चौक, दारागंज, झूसी ब्रिज से होते हुए वाराणसी के लिए मुड़ जाती है।


     यही सीमेंटेड रोड जीटी रोड (ग्रांड ट्रंक रोड) के नाम से विख्यात् और ऐतिहासिक महत्व की भारत की प्रथम एक्सप्रेस हाइवे है, जिसे मुस्लिम काल में सुल्तान शेरशाह सूरी ने बनवाया था-पेशावर से कलकत्ता तक की सबसे लंबी सड़क। इसे ब्रिटिश काल में बरतानवी हुकूमत ने पक्की सड़क बनवा कर इसका नाम जीटी (ग्रांड ट्रंक) रोड रख दिया। जब १८५७ में भारत का प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन हुआ तो ब्रिटिश हुक्मरानों ने स्वातंत्र्य सेनानियों-आंदोलनकारियों को कुचलने के लिए इसी रोड से अंग्रेजी कुमुक भेजी थी। तब उन्हें इस सड़क का महत्व समझ में आया था; क्योंकि अगर तब यह सड़क नहीं होती तो वे अपनी सेना को इतनी जल्दी उन स्थानों पर नहीं भेज पाए होते, जहां स्वातंत्र्य आंदोलनकारी आजादी के लिए जंग कर रहे थे।


    गौरतलब है कि इसी अंग्रेजी सेना ने दिन-दहाड़े इलाहाबाद में लोकनाथ-चौक एरिया में सात से अधिक पेड़ों पर सैकड़ों स्वातंत्र्य सेनानियों को जिंदा लटका दिया था। लोकनाथ के प्रवेश-मार्ग पर लगे शिला-पट्ट में इसका जिक्र किया गया है।


     लेकिन हम १८५७ नहीं, १९३०-३५ के आसपास की इलाहाबाद की बात कर रहे थे।


इसी जी. टी. रोड से तब तब पुलिस लाइंस के आगे कचहरी, जिसे कलक्ट्रेट भी कहते थे, से सटी गलीनुमा एक सड़क (स्ट्रीट) राजापुर गांव की तरफ जाती थी, जो उस समय एक छोटा-सा गांवनुमा कस्बा था; लेकिन अब तो शानदार कांक्रीटी इमारतों की शानदार बस्ती, बहुत बड़ा इंडस्ट्रियल हब बन गया है कि पहचाने से भी पहचाना नहींजाता कि १९३०-३२ में यह गांवनुमा एक कस्बा रहा होगा।


      इसी राजापुर गांव में उन दिनों एक मकान में पांच-सात वर्ष के बालक नौशाद का भरा-पूरा परिवार रहता था, जिसमें बच्चों की फौज से ले कर हर उम्र के लोग थे। घर उनकी आवाजों से पूरा दिन गुंजता और मनसायन रहता था। गर्मी के दिनों में शाम होते ही घर की औरतें छतों पर आ जातीं या दिन में बड़ी-बड़ी खिड़कियों से बाहर का नजारा लेतीं-वहां से द्रौपदी घाट का बायां हिस्सा और दाईं तरफ फाफामऊ परबना गंगापुल दीखता था।


     इलाहाबाद तीन तरफ से नदियों से घिरा थाशहर के बाईं तरफ हरिद्वार की तरफ से, द्रौपदी घाट को पार कर फाफामऊ की तरफ जानेवाली, गंगा नदी दीखती जो फाफामऊ पुल के नीचे से होती हुई दाएं घूम कर दारागंज की तरफ मुड़ जाती, फिर इलाहाबाद किले के सामने, शहर की बाईं तरफ से आगरा की तरफ से होती हुई आई यमुना नदी और गुप्त सरस्वती नदी के साथ संगम पर मिल कर सीधे विन्ध्याचल व वाराणसी के लिए मुड़ जाती थी।


    गर्मियों के दिनों में इसी छत व खिड़कियों से गंगा किनारे दूर-दराज तक फैले हरे-भरे तरबूजों व खरबूजों की बेलें दीखती थीं जिनमें बड़े-बड़े तरबूज और हलके मध्यम आकार के हरी-हरी धारियों वाले खरबूजे दीखते थे, जो भीतर से हरे होते; लेकिन खाने में बहुत ही मीठे और स्वादिष्ट। तरबूजों के छिलके बहुत ही मुलायम और पतले कि बहुत से लोग तो उसे चाकू से काटने की बजाय, हल्के से मुके से ही तोड़ देते। भीतर से एकदम सुर्ख और बहुत ही मीठे। इस गांव के दाईं और बाईं तरफ आम और अमरूदों के बड़े-बड़े बाग थे। उनके पेड़ अपेक्षाकृत छोटे लेकिन मौसम के दिनों में बड़े-बड़े अमरूदों या आमों से भरे होते थे। हरे व सुर्ख गुलाबीपना लिए आम और लाल बिंदियों से भरे पीले रंग के अमरूद, जिनमें बीज ढूढ़े से भी नहीं मिलते थे; लेकिन मीठे इतने कि उन्हें देखते ही खाने का मन बरबस हो आता।


     विस्तार से यह सब बताने का मकसद यह था कि घर से सुबह से ही नदारद बच्चों को तलाशने और उन्हें बुलाने के लिए घर की महिलाएं इन्हीं खिड़कियों के सामने या छत पर आ खड़ी होतीं। गर्मी के दिनों में शाम को और ठंड के दिनों में दिन में धूप सेंकने के लिए वहां इनकी महफिलें सज जाती थीं।


     घर के मुखिया यानी नौशाद के अब्बा हुजूर इलाहाबाद कचहरी में एक अंग्रेज जज साहब के पेशकार थे, जो सुबह नौ बजे घर से निकलते तो जज साहब बहादुर के बंगले पर शाम की हाजिरी लगा कर घर लौटते-लौटते सात-साढे सात बज जाते। उनके साथ वकीलों और उनके मुवक्किलों की कुमुक भी होती जिनसे निबटते-निबटते रात के नौ बज जाते।


     सुबह कचहरी के लिए उनके रवाना होते ही घर के छोटे-बड़े सभी बच्चे पिंजरे से परिंदों की माफिक जो फुर्र होते तो दोपहर होते-होते तक भी वे वापस नहीं लौटते। तब घर की औरतें छत पर आ कर उन्हें गंगा किनारे तरबूजोंखरबूजों के खेतों और आम या अमरूद के बगीचों की तरफ आंखें गड़ा-गड़ा कर तलाशतीं। मोहल्ले के दूसरे लड़कों के साथ घर के लड़के वहां पहुंच कर मस्ती करते--गंगा के किनारे घुटने-घुटने भर पानी में दौड़ लगाते, उनके पैर जब बालुई जमीन में धंसने लगते तो उन्हें बहुत मजा आता। इनमें नौशाद भी होते।


    हरी-हरी पत्तियों के बीच छितरे पड़े तरबूजों-खरबूजों को छू कर वे अपार खुशियों से भर जाते, फिर खेतवाले या उसके रखवालों की नजरें बचा कर उन्हें उठा कर भागते । उन पर नजर पड़ते ही वह उन्हें दौड़ाता हुआ उनके घर जा पहुंचता। इसी तरह अमरूद या आम के बाग का माली उनका पीछा करता हुआ उनके घर तक जा धमकता और शिकायत करता कि ‘‘मोहल्ले के आवारा-बदमाश लड़कों के साथ-साथ आपके ये बरखुरदार लोग भी अक्सर बाग से अमरूद (या आम) तोड़ कर चुरा लाते हैं और कच्चे फलों को तोड़ कर बाग में फेंक देते हैं। इस तरह से बहुत नुकसान करते हैं हमारे मालिक का।''


     तब उस मकान में रहनेवाले उस पांच-छह वर्ष के बरखुरदार यानी नौशाद की दादी अपनी साड़ी के आंचल की गांठ खोल कर उसे उसके नुकसान की कीमत दे कर विदा कर देतीं और नौशाद को अपनी गोद में भर लेतीं। उनकी वालिदा तब उनसे मीठे स्वर में शिकायत करतीं, “अम्मी, आप अपने इस दुलारे पोते की आदतें बिगाड़ रही हैंअगर यह अभी नहीं सुधरा तो बड़ा हो कर क्या बनेगा, क्या करेगा, इसका अल्लाह ही मालिक है। या परवरदिगार रहम कर....''


    तब दादी प्यार से बोलतीं, “आज यह तरबूज-खरबूज और अमरूद वाले को नचाता है। मेरा यकीन मानो बहू, बड़ा हो कर यह बहुत बड़ा आदमी बनेगा कि सारी दुनिया इसके इर्द-गिर्द नाचेगी....''


    जब नौशाद अक्सर दोस्तों के साथ पैदल ही कटरा, एलनगंज, ममफोर्डगंज तक का चक्कर लगा कर घर लौटते तो दादी उनके दुखते पांवों को दबातीं और प्यार से पूछतीं, “आज तुम लोग कहां-कहां गए, वहां क्या-क्या शैतानियां कीं'' तो वह बेहिचक उन्हें सारी बातें बतला देते; अपनी भी, घर के दूसरे बच्चों की और मोहल्ले के एक-एक लड़के की भी....।


    कुछ समय बाद जज साहब बहादुर का इलाहाबाद कचहरी से लखनऊ ट्रांसफर हो गया तो उनके साथ-साथ पेशकार साहब भी बोरिया-बिस्तर बांध कर सपरिवार लखनऊ आ गए, फिर वहीं सेटल भी हो गए। बालक नौशाद के लिए वही इलाहाबाद, वहां का आम-अमरूद और तरबूज खरबूज, सभी कुछ वक्त और उम्र के साथ-साथ अतीत होता चला गया।


    महबूब खान : इलाहाबाद को सुनहरे पर्दे पर लाने के सपने और गंगा-जमुनी तहजीब!


     १९६३ में मैं मुंबई गया था घूमने के घूमने के लिए, तब फिल्म जगत के कुछ लोगों के साथ-साथ महबूब खान से भी बड़े आत्मीय ढंग से मुलाकात हुई थी।


    १९६१-६२ में मैंने इलाहाबाद से प्रकाशित दैनिक भारत के संपादन विभाग में काम शुरू किया था। उसके ठीक दो महीने बाद ही महबूब खान की 'सन ऑफ इंडिया' रिलीज हुई थी और मैंने उसकी फिल्म समीक्षा लिखी थी- 'दैनिक भारत' (हिंदी) व 'द लीडर' (अंग्रेजी दैनिक) में। संभवतः वह मेरा पहला एसाइनमेंट और मेरी लिखी व छपी पहली फिल्म समीक्षा थी। तब तक मैं मुंबई नहीं आया था।


     उसी वर्ष पृथ्वीराज कपूर भी अपना पृथ्वी थिएटर्स ग्रुप लेकर इलाहाबाद आए थे-अपने नाटकों के मंचन के सिलसिले में। तब उनसे भी मेरी मुलाकात हुई थी। उनका इंटरव्यू और उनके मंचित नाटकों का कवरेज भी मैंने किया था जिन्हें पढ़ कर वे बहुत खुश हुए थे और चलते समय खासतौर पर कहा भी था कि जब भी मुंबई आऊं तो उनसे जरूर मिलें। उन्होंने अपना पता भी दिया था घर का।


     मेरे एक खास रिश्तेदार मुंबई में पेडर रोड पर बने सरकारी आवास में रहते थे और केंद्रीय सरकार के एक विभाग में काफी ऊंचे पोस्ट पर काम करते थे। जब भी वे सपरिवार इलाहाबाद आते तो मंबई आने की अपनी ताकीद जरूर दोहरा जाते थे। पृथ्वीराज कपूर की ताकीद भी जेहन में थी। मुकरी, के.ए. अब्बास आदि के दिए फोन नंबर और उनके पते मेरी डायरी में दर्ज थे ही, इसलिए समय और दफ्तर से अवकाश मिलते ही बांबे-हावड़ा मेल पकड़कर मुंबई आ पहुंचा था। टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप में मेरे एक जिगरी दोस्त पत्रकार थे, जो कालबादेवी में रहते थे। हम दोनों ने इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में ग्रेजुएशन और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पोस्टग्रेजुएट की पढ़ाई साथ-साथ की थी।


    वही मुझे फिल्म की शूटिंग और स्टूडियो दिखलाने के लिए बांद्रा उपनगर स्थित महबूब स्टूडियो ले कर आए थे। उन दिनों महबूब स्टूडियो के अलावा राज कपूर का आर. के. स्टूडियो, चेंबूर; व्ही. शांताराम का राजकमल स्टूडियो, परेल; फेमस स्टूडियो, महालक्ष्मी; और नटराज स्टूडियोज, अंधेरी मुंबई के बहुत प्रतिष्ठित और अत्याधुनिक साज-सामानों से लैस स्टूडियो माने जाते थे जहां दिन-रात शूटिंग होती रहती थी। महबूब स्टूडियो में छह फ्लोर थे। उस समय छहों फ्लोर पर किसी-न-किसी की शूटिंग आदि चल रही थी। एक प्रोड्यूसर बारिश की शूटिंग मुख्य भवन की बाईं तरफ मैदान में कर रहा था जहां पानी की बौछारों के नीचे गाना गातेनाचते हीरो-हीरोइन पर शॉट फिक़राइज किया जा रहा था।


    वहां शूटिंग देख, हीरो-हीरोइन व निर्माता-निर्देशक से मिल-बात कर हम आगे की तरफ बढ़े ही थे कि सामने से आते महबूब साहब दिख गए। मैंने 'औरत' से लेकर ‘सन ऑफ इंडिया' तक उनकी सारी फिल्में इलाहाबाद में देखी थी और उनका प्रशंसक भी था। इसलिए सबसे ज्यादा खुशी उनसे मिलने में हुई थी। हम सब अभी बातें कर ही रहे थे कि तभी मेरे दिमाग में 'मदर इंडिया' का एक सीन याद आयागांव में आई भीषण बाढ़ में गांव के मकानों के टूट-टूट कर डूबने का। इस तरह का सीन उन्होंने कैसे और कहां लियाहोगा-क्या वास्तविक बाढ़ के ये दृश्य थे?


    मैंने उन्हें अपने मन की इस शंका और उत्सुकता के बारे में बतलाया तो वे मुस्कराने लगे, फिर मुझे लेकर स्टूडियो के एक फ्लोर पर ले गए और बोले, “वह सेट हमने यहां लगाया था। पंप से यहां काफी पानी भर दिया गया था। गांव के मकानों के सेट लकड़ी के खंभों पर लगाए गए थे। जब पानी कंधे तक आ गया तो हमारे कुछ वर्कर पानी के भीतर घुसकर उन मकानों के पानी में डूबे खंभों के पास पहुंचेऔर पानी के भीतर से उन खंभों को आरी से काटना शुरू किया--पहले एक तरफ के खंभों को जिससे मकान बाढ़ के पानी में एक तरफ को झुकते, फिर गिरते और डूबते दिखलाई पड़े। दरअसल यह हमारे आर्ट डायरेक्टर, कैमरामैन, एडीटर और वर्करों की कार्य कुशलता का कमाल था, मेरा नहीं।....''


    फिर रुक कर बोले, “मेरा सारा समय घर या ऑफिस में ही बीत जाता है। स्टूडियो (महबूब स्टूडियो) के इस तरफ मैं कुछ और फ्लोर (शूटिंग के लिए स्टूडियो सेट) बनवा रहाथा। पहले वाला रिकॉर्डिंग स्टूडियो छोटा पड़ता है, इसलिए एक काफी बड़ा रिकॉर्डिंग स्टूडियो बनवाने की सोच रहा था। जैसा कि हॉलीवुड में यूनिवर्सल व एमजीएम वालों ने बनवाया है। कितना काम अभी तक हुआ है, यही देखने के लिए स्टूडियो चला आया। दरअसल यह काम 'सन ऑफ इंडिया' के बाद से एक तरह से ठप्प ही पड़ा हुआ है। हां, आज कैसे इधर आना हुआ?''


    “यह हमारे काफी पुराने दोस्त हैं--कॉलेज के दिनों से ही हमारे सहपाठी रहे हैं'' कहते हुए उन्होंने महबूब खान से मेरा परिचय करवाया, “इलाहाबाद से प्रकाशित एक डेली दैनिक समाचारपत्र) में सब-एडीटर-रिपोर्टर हैं। बंबई घूमने आए तो इन्हें शूटिंग व स्टूडियो दिखलाने के लिए ले कर चला आया।''


    “आप कितने दिनों तक हैं बंबई में?'' उन्होंने मेरी तरफ मुखातिब हो पूछा, “काफी कुछ यहां देख लियाहोगा। इलाहाबाद तो एक बहुत ही कल्चरल, एजुकेशनल, हिस्टॉरिकल और रेलिजस प्लेस है। मेरी तो बहुत इच्छा थी वहां चल कर एक अच्छी-सी फिल्म बनाने की-गंगा, यमुना, संगम और हिस्टॉरिकल फोर्ट (किला) तथा दूसरे पुराने स्थानों पर भी शूटिंग करने का बहुत मन है।''


     “सही पूछिए तो इलाहाबाद को सही ढंग से फिल्मों में एक्सपलायट ही नहीं किया गया, हालांकि वहां पर काफी फिल्मों की शूटिंग हुई हैं या आए दिन होती ही रहती हैं। लेकिन वे सिर्फ शो-पीस भर होती हैं, इलाहाबाद के कल्चर और हिस्ट्री, वहां की गंगा-जमुनी तहजीब से कोई मतलब नहीं होता!'' मैंने अति उत्साह में कहा। महबूब साहब मेरे पसंदीदा डायरेक्टरों में थे, मैं उनसे यूं भी मिलना चाहता था और मेरे जोर देने पर ही मेरे जर्नलिस्ट दोस्त मुझे यहां लेकर आए थे।


    “गंगा-जमुनी तहजीब!'' वे धीरे से मुस्कराए, जैसे कुछ सोच रहे हों।


     आप कभी एक सप्ताह के लिए इलाहाबाद जरूर आइए, मैं आपको वहां सभी जगह ले जाकर दिखलाऊंगा, ऐसी जगहें जहां आमतौर पर फिल्म निर्माता कभी गए ही नहीं। ज्यादातर लोग वहां की सड़कों, मान्युमेंट्स या गंगा-यमुना और संगम के ही कुछ सीन की शूटिंग करके लौट आते हैं।


    "भई, तब तो घर बैठे ही आपसे बहुत सारी इन्फार्मेशंस मिल जाएंगी इलाहाबाद के बारे में'' फिर वे मेरे मित्र से बोले, “कल आपके काम का जो भी शिड्यूल हो, उसे एडजस्ट कर अपने इन इलाहाबादी दोस्त को लेकर कल शाम को मेरे घर जरूर तशरीफ ले आइए। रात का खाना मेरे ही साथ रहेगा....।''


    दूसरे दिन शाम को जब हम उनके मैरीन ड्राइव स्थित घर पहुंचे तो वे दिलीप कुमार के साथ अपने कमरे में बैठे बात कर रहे थे। महबूब साहब ने उनसे हमारा परिचय कराया। मेरे पत्रकार-मित्र दिलीप कुमार को जानते थे। उन्होंने भी मुझे लेकर सेट पर आने की दावत दी जहां वे शूटिंग कर रहे थे। फिर हम लोगों से हाथ मिला कर वे चले गए, “आप लोग महबूब साहब से पुरसुकूनी से बातें कीजिए। ये आप दोनों का ही इंतजार कर रहे थे। मैं तो यूं ही आ गया था यहां महबूब साहब की मिजाजपुर्सी के लिए....।'' फिर वे मेरे पत्रकारमित्र से धीरे से बोले, “महबूब साहब को दिमागी तौर पर ज्यादा परेशान मत कीजिएगा और 'सन ऑफ इंडिया' के बारे तो बातें ही मत कीजिएगा। इससे इनके दिलोदिमाग को शॉक लगता है।'' कह कर वे चले गए।


    उस दिन काफी रात तक महबूब साहब बातें करते रहे। इस बीच उनकी बेगम सरदार अख्तर ने कई बार आकर उन्हें इशारा भी किया कि रात बहुत हो रही है, इन बेचारों को भी बांद्रा-खार तक जाना होगा, जो यहां से काफी दूर है। फिर डॉक्टर ने भी आपको जल्दी सो जाने के लिए कहा है....।हम लोग भी कई बार उठने को हुए, लेकिन उन्होंने हर बार हमारे हाथ पकड़ कर रोक लिए, फिर बेगम सरदार अख्तर से बोले, बेगम साहिबा, ये श्रीवास्तव साहब इलाहाबाद से यहां तशरीफ लाए हैं। वहां के बारे में ऐसी-ऐसी बातें इन्होंने बतलाई हैं कि मन करता है कि अभी कैमरा उठाऊ और इनके साथ ही चल दें वहां शूटिंग के लिए। ये आज हमारे खास मेहमान हैं। क्या पता अल्लाहताला इनसे फिर मिलने की इजाजत दे या नहीं दे।''


    ‘‘महबूब साहब, प्लीज आप तो ऐसा मत कहिए! मैंने काफी हिम्मत कर उनका दायां हाथ पकड़ते हुए कहा, “अल्लाहताला आपको हम सबकी उम्र भी दे दे। आप उन लोगों में हैं जिन्होंने इस फिल्म इंडस्ट्री को जमीन से आसमान पर पहुंचाया है। हम सब आपकी फिल्में देख-देखकर बड़े हुए हैं। मेरे माता व पिता जी ने तो आपकी वे फिल्में भी देखी हैं जिनके बारे में हमने सिर्फ सुना भर था। आप यहां के लीजेंड फिल्म मेकर हैं....।'' मैंने उन्हें 'भारत' व 'लीडर' के वे अंक दिए जिसमें मैंने ‘सन ऑफ इंडिया' की समीक्षाएं लिखी थीं और उनकी, उनकी फिल्म मेकिंग के तकनीक की तारीफे की थीं। मैंने दोनों अंक उनकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, *"मैं यह सब और इतनी बड़ी समीक्षात्मक रचना इसलिए लिख सका था कि मैंने आपकी अधिकांश फिल्में देखी थीं और जो नहीं देखी थी, उनके बारे में अपने माता-पिताजी से सुना था, इसे लिखते समय उनसे डिस्कशंस किए थे....।''


    उन्होंने वे अखबार ले लिए और दोनों समीक्षाओं को पूरे तवज्जो से पढ़ा, फिर सरदार अख्तर की तरफ बढ़ाते हुए बोले, “बेगम, इसे आप भी पूरे तवज्जो से पढ़ें और इन्हें सेफ रख दें। इस लड़के ने जो कुछ लिखा है वह 'सन ऑफ इंडिया' के आलोचकों के लिए करारा जवाब है।'' फिर उन्होंने मेरे पत्रकार-मित्र को एक रिसाला थमाते हुए कहा, * “मुझे आप लोगों की थोड़ी-सी मदद और साथ ही सलाह चाहिए। दरअसल 'सन ऑफ इंडिया' के बॉक्स ऑफिस पर अच्छा बिजजिनेस न करने के बाद कुछ लोगों ने तो मेरे विरुद्ध जैसे कैंपेन ही छेड़ दिया है। इनमें कुछ प्रेस वाले भी हैं। मेरी इन लोगों से कोई जाती अदावत या दुश्मनी नहीं है, बल्कि इन लोगों को मैं जानता भी नहीं हूं; परंतु इन लोगों को....।''


    “देखिए, हम लोग उनकी बातों को कतई सीरियसली नहीं ले रहे थे....।'' महबूब साहब की बात काटते हुए सरदार अख्तर बोलीं, ‘‘लाइमलाइट में हों तो सौ गाली देने या जेलेसी-जलन रखनेवाले निकल ही आते हैं, लेकिन इन लोगों ने तो झूठ की हद ही कर दी है। एकदम अनर्गल और झूठी बातें इनके बारे में लिख और फैला रहे हैं, इससे ये दिमागी तौर पर बहुत ही परेशान रहते हैं। समझ में नहीं आता कि इनकी जबान कैसे बंद किया जाए। अब इस रिसाले को ही लीजिए, कुछ दिन पहले इसमें छपा था कि '....महबूब अपनी जिंदगी में कभी भी एक जगह ठहर कर नहीं रहेपैसों के लिए वे एक प्रोडक्शन कंपनी से दूसरी प्रोडक्शन कंपनियों और फिल्म निर्माताओं के यहां पाला बदलते रहे थेसिर्फ बड़े सितारों के साथ ही फिल्में बनाते रहे। थे....।' आप भी इन्हें आज से नहीं, वर्षों से जानते हैं कि....''


     “अरे भई, मैं भला कब बड़े सितारों या प्रोडक्शन हाउसों के पीछे भागता रहा! हां, स्टोरी और उसके किरदारों को सूट करनेवाले कलाकारों को जरूर चुनता रहा, चाहे वे नए हों या पुराने। लेकिन शोमैनशिप के लिए फालतू बड़ेबड़े सितारों का जमघट-म्यूजियम नहीं खड़ा करता रहा.... ।'' महबूब साहब अचानक सरदार अख्तर की बात काटते हुए बोल पड़े, “ज्यादातर कलाकारों ने अपने अपनी एक्टिंग कैरियर की शुरूआत मेरी फिल्मों से की और और मेहनत कर वे बहुत कामयाब एक्टर बने। अपनी ज्यादतर फिल्मों में मैं नए-नए या कम मशहूर लोगों को चांस देता रहाअपने खुद के प्रोडक्शन हाउस की पहली ही फिल्म 'तकदीर' में १३ वर्ष की नर्गिस को बतौर हीरोइन चांस दिया, जबकि ऐसा रिस्क कोई नहीं लेता‘आन' नादिरा व निम्मी की पहली फिल्म थी, यह बात दूसरी है कि ब्लैक एंड ह्वाइट होने के कारण 'बरसात' पहले पूरी होकर रिलीज हो गई। 'मदर इंडिया' में नर्गिस व कन्हैयालाल के अलावा सभी नए और स्ट्रगलर्स थे--सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार, राजकुमार, सईदा खान, कुमकुम.... ‘सन ऑफ इंडिया' में तो सभी नए कलाकार थे। 'सन ऑफ इंडिया' अगर दर्शकों को पसंद नहीं आई तो उसमें मेरी फिल्म मेकिंग में ही कोई कमी रही होगी, वैसे जो सब्जेक्ट सलेक्ट किया था, उसे पूरी ईमानदारी से बनाया। हर एक ने पूरी मेहनत से काम किया। मैं किसी को भी दोष नहीं दे सकता....।''


     कुछ देर रुक कर वे फिर बोले, “काम या पैसों के लिए मैं तमाम प्रोड्यूसरों व फिल्म कंपनियों के पास भागता नहीं रहा, अव्वल तो मुझे इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी; बल्कि जिन लोगों के साथ काम किया, पूरी ईमानदारी से किया और उनके लिए अच्छी-से-अच्छी फिल्में बनाईंमैंने अपनी जिन्दगी में सिर्फ इंपीरियल कंपनी, सागर मूवीटोन, नेशनल स्टूडियो और अपनी खुद की महबूब फिल्म्स के लिए ही काम किया और तब तक उन लोगों के साथ जुड़ा रहा था, जब तक हमारे-उनके दिल एक-दूसरे के साथ मिले रहे। मैंने हमेशा हीरो का रोल ठुकराया, क्योंकि मैंने हीरो नहीं डायरेक्टर बनने की ठान रखी थी। ऐसा कोई एक्जांपल आपकी निगाह में है? महबूब इज्जत और मान का भूखा है, पैसे और घमंड का नहीं...''


    सरदार अख्तर ने इस मामले में उनके खुद के स्टेटमेंट, उनका बायोडाटा, फिल्मों की लिस्ट, उनकी फिल्मों के फोटोग्रफूस आदि को दो अलग-अलग लिफाफों में रख कर महबूब साहब को दिया और उन्होंने उसे हमारी तरफ बढ़ा दिया, फिर बोले, इन पुलिंदों में शॉर्ट में सारी जानकारी है। शायद आपके काम आ जाए, वैसे इन-वेरी शार्ट बतला भी देता हूं....।


     “मैंने बतौर डायरेक्टर १६३५ में सागर मूवीटोन वालों के साथ अपना कैरियर शुरू किया था फिल्म 'जजमेंट ऑफ अल्लाह' से और उनके साथ १६४० तक लगातार फिल्में बनाता रहा। इस दौरान मैंने उनके लिए ‘जजमेंट ऑफ अल्लाह', ‘मनमोहन', 'जागीरदार', 'हम, तुम और वो', 'वतन', 'एक ही रास्ता और ‘अली बाबा' आदि फिल्में बनाई। उसी वर्ष नेशनल स्टूडियो के साथ मैं बतौर प्रोड्यूसर-डायरेक्टर जुड़ा। वहां 'औरत', 'बहन', 'रोटी' आदि फिल्में बनाई, उनके साथ १९४० से ४३ तक रहा। १९४३ में ही मैंने अपनी खुद की निर्माण कंपनी ‘महबूब प्रोडक्शंस' की शुरुआत की और तकदीर', ‘हुमायू', 'नजमा', 'अनमोल घड़ी', 'ऐलान', ‘अनोखी अदा', 'अंदाज', 'आन', 'अमर', 'आवाज', 'पैसा ही पैसा', 'मदर इंडिया' और 'सन ऑफ इंडिया' बनाई। इनमें से 'आवाज' व 'पैसा ही पैसा' का डायरेक्शन मैंने खुद नहीं किया था, बल्कि दो प्रतिभाशाली नौजवानों को दिया, जो फिल्मों में किस्मत आजमाने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे। वे थे-जिया सरहदी व मेहऋषि। उन दोनों ने बतौर डायरेक्टर अपना अच्छा मुकाम बनाया। अपने होम प्रोडक्शन की पहली ही फिल्म 'तकदीर' में नर्गिस को, तीसरी फिल्म ‘अनमोल घड़ी में सुरैया को और ‘आन' में नादिरा व निम्मी को इंट्रोड्यूस किया था। 'आवाज' से जहां नलिनी जयवंत व उषा किरण स्टार बनी थीं वहीं 'अंदाज' ने दिलीप कुमार, नर्गिस व राज कपूर को पहली बार सुपर-स्टारडम दिया था। लता मंगेशकर को भी 'अंदाज' से ही प्लेबैक सिंगिंग में एक नया अंदाज व पहचान मिली थी'अंदाज' से ही लता मंगेशकर लता मंगेशकर बनी थीं। 'मदर इंडिया' से ही सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार, राज कुमार ने भी अपनी अलग पहचान बनाई...''


     मैं उनके दिल और मन के किसी कोने में फसे उस दर्द को गहराई से भांप और महसूस कर रहा था, जिससे वे बेतरह हलकान थे। लिफाफे में रखे उस पुलिंदे को लेकर अपने ब्रीफकेस में रख लिया। अब मुझे पता नहीं कि मेरे उस दोस्त ने उनका क्या किया; लेकिन इलाहाबाद वापस आने पर उन सब के आधार पर मैंने कुछ अलग-अलग रिपोट्र्स और उनसे हुई बातचीत के आधार पर साक्षात्कारनुमा लेख हिंदी और अंग्रेजी में लिखे और उन्हें टाइप करवाकर उनकी ढेर सारी प्रतियां बनवाई और उन्हें बहुत से अखबारों व पत्रिकाओं में छपने के लिए भेज दिया। अधिकतर ने उन्हें सुखियों में छापा था। उनकी छपी प्रतियां मैंने महबूब साहब के पास रजिस्टर्ड डाक से भिजवा दीं। शायद दूसरे ही महीने उनका तीन-चार पन्ने का बेहद अंतरंगता से भरा पत्र आया जिसमें उन्होंने मेरा बहुत-बहुत आभार माना था और शीघ्र ही मुंबई आने की हिदायत भी दी थी।


    उस रात डिनर के एक-डेढ़ घंटे बाद हम जब उनसे विदा हुए तो उन्होंने एक बार फिर से मुझे गले लगा लिया था, “बेटे, तुमसे मिल कर बहुत अच्छा लगा, अब जब भी बंबई आओ तो बिना झिझक मुझसे मिलने आ जाया करना। हां, जब अगली बार आओगे तो मैं तुम्हें अपने गांव बिलिमोरा ले चलूंगा, जहां से मैं आया था यहां हीरो बनने; लेकिन बन गया डायरेक्टर। यहां से बहुत दूर नहीं है। अगर अल्लाहताला और वक्त ने इजाजत दी तो एक फिल्म इलाहाबाद आकर जरूर बनाऊंगा। मेरी बहुत इच्छा है कि इलाहाबाद के प्राचीन इतिहास, उसकी प्राचीनतम संस्कृति और साहित्यिककलात्मक अतीत और वर्तमान को एक नए नजरिए से पेश करू ताकि आज के दर्शकों से इलाहाबाद के अतीत और वर्तमान से साक्षात्कार करा सके....''


    लेकिन अल्लाहताला और वक्त ने उन्हें इजाजत ही नहीं दी। न तो मैं उनके साथ बिलिमोरा जा सका और न ही वे इलाहाबाद आ सके। उनके ढेर सारे काम जैसे-के-तैसे अधूरे पड़े रह गए।