डायरी - इलाहाबाद डायरी - रुचि भल्ला

जन्म : 25 फरवरी 1972, इलाहाबाद देश के सभी प्रमुख समाचार-पत्र, पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। प्रसारण : ‘शालमी गेट से कश्मीरी गेट तक ...' कहानी का प्रसारण रेडियो FM Gold पर आकाशवाणी के इलाहाबाद, सतारा तथा पुणे केन्द्रों से कविताओं का प्रसारण ...


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इलाहाबाद वाले मेरे घर की खिड़की से दुनिया दूर तलक दिखाई देती थी ....पर धरती जितना फ़लक मैंने फलटन के इस घर की छत पर खड़े होकर देखा है ...देखा तो दूर तलक फरीदाबाद के आठवें माले से भी है....।


    आसमान का छोर दिखाई देता था आठवें माले की बालकनी से.... छोर के पास दिखाई दे जाती थी खड़ी दिल्ली .... दिखता था नई दिल्ली का रेलवे स्टेशन .... प्लेटफार्म पर खड़ी प्रयागराज दिख जाया करती थी ....प्रयागराज जो जाती है मेरे शहर इलाहाबाद ....।


    अब दिल्ली दूर है....इलाहाबाद बहुत दूर .....। जाने को तो हवाई जहाज से भी जाया जा सकता है....हवा में उड़ते हुए तय की जा सकती है दूरी पर जो सुख दिल्ली से इलाहाबाद प्रयागराज गाड़ी से जाने का है, वह सिर्फ प्रयागराज ही समझ सकता है....।


    मुँघरू बाँधे रेलगाड़ी जब भागती थी अपने शहर से मिलने, ईंजन के चेहरे पर रौनक फूल सी खिल आती थी... जो बेचैनी जो तलब घंटे गिन-गिन कर इंतजार में कटती थी, उसके गवाह होते थे सफ़र के साथ भागते शहर और गाँव ....।


   जब मंजिल नज़दीक आती थी.... दिखता था सूबेदारगंज, दिल की धड़कनें बढ़ आती थीं....टंग जाती थी खिड़की पर आँखें कि मेरे इंतजार में खड़ा होगा बाँहें फैलाए मेरा इलाहाबाद ...।


    अब तो खैर! मुझे खत भी नहीं लिखता इलाहाबाद, आवाज़ भी नहीं देता ...देता भी होगा तो मुझ तक आती नहीं है आवाज़.... सातारा के पठार की दीवार से टकरा कर लौट जाती होगी उसके पास...।


    इतना तो यकीन है मुझे कि जितना मुझे उससे प्यार है, वह भी करता है...यह बात अलग है कि मुझसे कुछ कहता नहीं....पर इतना तो यकीन है कि मुझसे बिछड़ कर खुश तो नहीं रहता होगा....।


    अबकि बार जब मिलेगा ....खुसरू बाग में बैठ कर.... हाथों में उसका हाथ लेकर, उसे सुनाऊँगी बशीर बद्र की लिखी हुई गजल- “मुझसे बिछड़ कर खुश रहते हो, मेरी तरह तुम भी झूठे हो....।''


 फोटो : एस.के. यादव


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सर्दियों के वे दिन बड़े सुनहरे होते थे जब सर्दियाँ दिसंबर के दिनों में इलाहाबाद के उस घर में मिलने आती थीं....सूरज को घर का दरवाजा खटखटाने की नौबत नहीं पड़ती थी, साधिकार खिड़की से समूचा चला आता था.... मेरा वह कमरा सूरजमुखी फूल सा खिल जाता था ....।


     सर्दियों में इतवार के दिन बड़े चमकीले होते थे। कमरे के फर्श पर धूप के कतरे दोपहर भर जलतरंग करते थे....कमरे की दीवारों का रंग डैड का पसंदीदा क्रीम होता था .... क्रीम वही रंग जो नर्म मलाई का होता है....सर्दियों की धूप उस कमरे में आकर मलाई का एक कोट और चढ़ा जातीथी...। उस गुनगुनी धूप में पलंग पर बैठ कर डैड अखबार पढ़ते थे, पीते थे अदरक वाली चाय के दसियों कप ...उनकी उंगलियों में सुलगती होती थी कैप्सटन सिगरेट ...स्लेटी धुंए का छल्ला उंगलियों से छूट कर खिड़की के रास्ते हवाओं में तैरता जाता था....। मुझे अच्छा लगता था उसे हवा में उड़ते यूँ देखना...।


    गुनगुनी दादी वहीं खिड़की के पास लकड़ी की सैटी पर बैठतीं ...उनके हाथ में होती थीं ऊन-सिलाइयाँ मेरे लिए स्कार्फ और मोजे बनाती थीं ....और माँ इतवार की दोपहर के लिए बना रही होती थीं रसोई में कढ़ी और चावल ....।


    जब तक चावल तैयार होते माँ प्याज के पकौड़ों की एक प्लेट हमारे पास कमरे में रख जातीं....। माँ के पास खड़े होकर कढ़ी सीखने की कोशिश मैंने कभी नहीं की, अलबत्ता धूप में पलंग पर लेटे हुए इस तरह पकौड़े खाना बहुत अच्छा लगता था...।


    खाना तैयार हो जाता और माँ कढ़ी-चावल को चीनी मिट्टी की सफेद प्लेट में डाल कर जब उस कमरे में लिए आतीं... धूप सी उजली उन प्लेटों पर रखे हुए चावलों पर कढ़ी ... धूप में ऐसी लगती जैसे रुई वाले बादलों की चादर पर दोपहर का कड़क सूरज पाँव फैला कर लेट गया हो इत्मीनान से......।


     सर्दियाँ तो अब भी आती हैं अपने हर मौसम में...पर वैसी सर्दियाँ नहीं आतीं ...न अब वैसी धूप आती है जैसी आती थी इलाहाबाद के उस घर में...। खिड़कियाँ भी बहुत सी देखीं मैंने अलग-अलग शहरों में पर वैसी खिड़की कहीं नहीं थी जैसी इलाहाबाद वाले घर की थी...जहाँ काँच के शीशों के पार खिला करती थी सूरजमुखी दिसंबर के महीने में ....। दिसंबर भी हर साल आता है पर जब से डैड गए.... साथ में सर्दियाँ नहीं लाता...लाता है सर्द मौसम....


                                                                                                                                                            - २३ नवम्बर २०१६


 


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        माँ बताती हैं कि इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ती जिस औरत को निराला ने देखा था....उस मेहनतकश औरत की छाया इलाहाबाद के घर -घर में थी। घरों के दैनिक कामों में शामिल होता था पत्थर के कोयले को खरीदनालकड़ी की लम्बी सी रेडागाड़ी में रख कर बिकने आता था पत्थर का कोयला... बेचने वाले के कपड़े और शरीर का रंग भी कोयले के रंग में रंगा हुआ दिखता।


       माँ भी उससे पत्थर का कोयला खरीदतीं और फिर उसे घर में लाकर हथौड़ी के प्रहार से टुकड़ों में तोड़ा करती थींपत्थर के कोयले के वे टुकड़े अंगीठी में कंडों के ऊपर रखे जाते और नीचे कागज़ जला कर अंगीठी सुलगाई जाती तब कहीं जाकर खाना पकाने के लिए बर्तन धरा जाता था।


      पत्थर के कोयले से छोटे टुकड़े बनाने के प्रयास में जो चुरा गिरा करता था, माँ उस चूरे को मिट्टी में लपेट कर गोले बनातीं और फिर उसे धूप में सुखाया करती थीं ... शाम तक वे गोले सूख जाते। उन गोलों को डिब्बों में भर कर रख लिया जाता था।


     सुलगती अंगीठी पर दिन के लिए खाना तैयार होता रहता, जब खाना बन जाता ...अंगीठी की आँच मद्धिम होजाती तब उन गोलों को आँच पर धर कर रात के खाने की तैयारी शुरू कर दी जाती थी। दाल या साग को हल्की आँच पर चढ़ा कर रख दिया जाता, घंटे दो घंटे तक धीमी आँच पर खाना पकता रहता, शाम ढलते ही तवे पर रोटियाँ डाल दी जातीं। पत्थर तोड़ती औरतें इस तरह से दिन-रात आँच के सफर को तय किया करती थीं।


                                                                                                                                                                               - २९ मार्च २०१६


                                                                                                    4


     सिन्थिया हक म्योराबाद में रहती थीं। वह नैन-नक्श में इतनी खूबसूरत नहीं थीं लेकिन कुछ था उनके चेहरे में कि वह खूबसूरत से कहीं ज्यादा खूबसूरत दिखती थीं। उनका रंग न गोरा था न साँवला, उनका खास सिन्थिया रंग उनके रंग पर खिलता था। मुस्कराता गोल चेहरा, गुलाबी होंठ, आँखों में ढेर काजल होता था। वह पूर्णिमा के चाँद सी भरी-भरी थीं।कद में लंबी पर पाँव में ऊँची ऐड़ी के सैंडिल पहना करतीथीं। ज्यौर्जट-शिफ़ॉन की साड़ियाँ उनकी बेहद पसंदीदा होती थीं। उनकी आवाज़ नाइटिंगेल सी मीठी और चेहरा मदर मेरी से मिलता था। उनका मासूम चेहरा ताज़ा खिले फूल सा रहता था। वह इंग्लिश पोएट्री लगती थीं।


     हमें कॉलेज में इंग्लिश पढ़ाती थीं। बहुत प्यार से ...धीरे-धीरे .....ठहराव के साथ पढ़ाया करतीं। उनका पढ़ाने का अंदाज़ भी उनकी तरह ही प्यारा था। इंग्लिश लिट्रेचर से हम सबको प्यार हो गया था और सिन्थिया हक मैम से भी। पैंतालीस मिनट का पीरियड ऐसा लगता जैसे कभी खत्म न हो। उनकी शहद सी मीठी आवाज़ सुनते हुए, मदर मेरी से चेहरे को देखते हुए मैकबेथ ड्रामा हम सब रट जाते। उनकी बड़ी-बड़ी काजल अँजी आँखें ऐसी जैसे जॉन कीट्स ले जा रहे हो हमें La Belle Dame Sans Mercy वाली कविता की गुफा में।


     सबसे सुंदर तो उनके बाल थे ... शोल्डर तक.... पोनीटेल में बंधे स्टेप्स कट...उनमें हमेशा फ्रैश कर्ल होता .. पूरे कॉलेज में चर्चा का विषय थे सिन्थिया मैम के रोलर सैट स्टेप्स कट। मुझे इस कदर पसंद थे कि उनके जैसे बालों की चाह में एक डजन रोलर खरीद लायी थी मैं चौक जाकर ... और वहीं चौक में एक पार्लर में जाकर मैंने अपने घने बालों पर स्टेप्स कटिंग की कैंची चलवा दी थी और तबसे रात में बालों में रोलर लगा कर मैं सो जाती और सुबह मुझे बालों में सिन्थिया हक मैम का कर्ल मिल जाता। शुरू-शुरू में तकलीफ होती थी बालों में लगा कर सोने से लेकिन अब कॉलेज में मेरे बाल भी चर्चा का विषय थे। यह मेरे लिए बहुत बड़ी एचीवमेंट थी। ठीक उस तरह की जैसे क्लास में हाइयेस्ट मार्क्स आने पर होती है


     चूंकि मैं पढ़ाई में वैसे ही ठीक थी... बाकी सिन्थिया मैम खास वजह थीं कि अब सिर्फ एक ही सब्जेक्ट में सबसे ज्यादा दिल लगता था। यूनिवर्सिटी रोड पर जाकर इंग्लिश लिट्रेचर की तमाम किताबें खरीदी जातीं। नोट्स बनाए जातेऔर तो और सिविल लाइंस में जाकर मैकबेथ का वीडियो कैसेट भी खरीद लिया था। वीसीआर में लगा कर हर ऐक्ट -सीन घोंट डाला। हाँ नंबर भी आए थे क्लास में सबसे ज्यादा और सिन्थिया हक मैम के हम फेवरिट भी बन गए थे। उन दिसंबर के दिनों में जब क्रिसमस आया तो वह हरे कागज़ में लपेट कर मेरे लिए प्लम केक स्लाइस लाई थीं। मेरे जन्मदिन पर रूमाल का एक सेट उन्होंने मेरे कॉलेज बैग में डाल दिया था।


     सिन्थिया हक मैम की वह याद मैंने अपनी अलमारी की शेल्फ में तह लगा कर ...सहेजी हुई है अपने पास। अब यादें ही हैं उनकी।...वे अब उस कॉलेज में नहीं हैं....लेकिन अब भी इलाहाबाद में हैं। वह फूल सा चेहरा, काजल अँजी आँखें, वह मासूम मुस्कुराहट, वह शिफॉन की साड़ी, उनके रोलर सैट बाल, शहद सी मीठी जुबान में लिपटी प्रोज़ एन्ड पोएट्री सब कुछ है... कहीं बहुत गहरे .... इलाहाबाद की मिट्टी में दबे हुए तालाबंद एक ताबूत में ...। - २४ अगस्त २०१८


                                                                                          संपर्क : श्रीमंत, प्लॉट नं. zv, स्वमी विवेकानन्द नगर, फलतान, जिला सतारा, महाराष्ट्र-415523,


                                                                                                                                                                                            मो.नं.: 9560180202