समीक्षा - कुलीन लोक से मुठभेड़ करती कविताएँ - उमाशंकर सिंह परमार

कौशल किशोर मूल रूप से वाम कार्यकर्ता हैं। आजीविका के लिए पत्रकारिता की, जीवन भर विभिन्न आन्दोलनों, अभियानों में आयोजनों का गुरुतर उत्तरदायित्व निर्वहन किया और आज जब वह ६७ की उमर के हो चुके हैं, उतने ही उत्साह से जनान्दोलनों में भागीदारी करते हैं जिस उत्साह से सत्तर के दशक में करते थे। पार्टी अभियानों के समर्पण के कारण उन्होंने अपने लिए विशेषकर रचनात्मक जीवन के लिए कुछ अधिक नहीं किया। इनके एक्टिविस्ट स्वरूप ने इनके रचनाकार स्वरूप को दबा कर रखा। यह केवल कौशल की सच्चाई नहीं है, उस दौर के ६७ से लेकर अस्सी के दशक तक के हर वामपंथी लेखक की सच्चाई है। के पी सिंह, गोरख पाण्डेय, महेन्द्र नेह, कौशल किशोर, जैसे सभी लेखक और कवियों ने रचना से अधिक अपने भीतर के कार्यकर्ता को तरजीह दी। यही कारण है, इस पीढी के अधिकांश रचनाकार चर्चा से बाहर रहे। हमारे साहित्य की यह त्रासदी रही है कि जमीनी लोकधर्मी कार्यकर्ताओं की अपेक्षा अभिजात्य लेखन को चर्चा के लिए अधिक उपयुक्त माना गया। महेन्द्र नेह और कौशल किशोर दोनों आज भी निरन्तर रचना रत हैं। कौशल किशोर का पहला कविता संग्रह ‘नयी शुरुआत'' शीर्षक से पाण्डुलिपि बनी मगर प्रकाशित नहीं हो सकी। इसमें १९६७ से लेकर १९७६ तक की कविताओं को एकत्र किया गया है। १९७६ के बाद उनका दूसरा कविता संग्रह ''वह औरत नहीं महानद थी'' २०१७ में छपकर आया। पहले और दूसरे कविता संग्रह के बीच लम्बा अन्तराल रहा। ‘औरत नहीं महानद थी' में दो समयों की कविताएँ हैं।


    ‘औरत नहीं महानद थी' में दो समयों की कविताएँ हैं। एक खण्ड है 'एक मुट्ठी रेत' जिसमें ८६ तक की कविताएँ हैं तो दूसरा खण्ड है 'अनन्त है यह यात्रा' जिसमें २००९ से लेकर अब तक की कविताएँ हैं। पहले खण्ड में २९ कविताएँ तथा दूसरे खण्ड में लगभग ३५ कविताएँ हैं। कुल मिलाकर ६४ कविताएँ इस कविता संग्रह में हैसंक्रमण काल के दौरान की एक भी कविता इस संग्रह में नहीं है। शायद यही संक्रमण काल १९८६ से लेकर २००९ तक का ‘कविता न लिखने का समय है।


    कौशल किशोर के इस कविता संग्रह को पढ़कर एक बात का अन्दाजा हो जाता है कि कवि की काव्य मनोभूमि के निर्माण में साठोत्तरी कविता विशेषकर धूमिल का बड़ा योगदान है। साठोत्तरी कविता ‘‘मोहभंग'' की कविता थी। एक मुट्ठी रेत की भावनिर्मिति ‘‘मोहभंग'' ही है। चूंकि ये कविताएं अस्सी के दशक तक की हैं अस्तु स्वाभाविक है कि कवि अपने समय की चेतना के साथ रहा होगा। नक्सलवादी कविता और मोहभंग का प्रभाव उस दौर के और भी बड़े कवियों पर था। मोहभंग की कविता साठ के दशक के बाद की है। देश आजाद हुआ था, आजाद हिन्दुस्तान में लोग जो ब्रितानी शासन में देश के शोषक वर्ग से आते थे, वही लोकतन्त्र में जनप्रतिनिधि बनकर आ गए। संसद और विधान सभाओं में इस देश का बुर्जुवा काबिज हो चुका था और अपनी व्यवस्था के अनुरूप वह लोकतन्त्र को चला रहा थाअस्तु आजादी एक “छलावा'' बनकर आई। भले ही देश की आम जनता इस तथ्य को नहीं समझ पाई लेकिन संवेदनशील कवि जरूर समझ रहा था। मोहभंग की कविता में सबसे पहले 'आजादी'' और ''लोकतन्त्र'' की विसंगतियों व इसके बुर्जुवा चरित्र को उघाड़ा गया। धूमिल की संसद से सड़क तक और सुदामा पाण्डेय का प्रजातन्त्र इसका गवाह हैं। कौशल की कविताओं में भी आजादी और लोकतन्त्र पर वही स्वर प्राप्त होता है जो मोहभंग की कविता में था। उनकी एक कविता है “अन्धेरे से प्रतिबद्ध लोग'' जो १९७८ में प्रारूप में छपी थी, इसमें आजादी को ‘‘धोखा'' की संज्ञा दी गई है। “अन्धेरे को पहली या / दूसरी आजादी का नाम देते हुए / अपने फन में इस कदर माहिर हैं कि / धोखा और धूर्तता / सारे देश में राज करती है''। इन कविताओं में बड़ी बात यह है कि यहाँ कवि का आत्मसंघर्ष और उसका व्यक्तित्व दोनों परस्पर गुंथ गए हैं। जब एक कार्यकर्ता कविता लिखता है तो उसका आत्मसंघर्ष आक्रोश के रूप में व्यजित होता है। यही आक्रोश युग की विद्रूपताओं का साक्षात्कार कराता है। समय की साजिशों को इस कविता संग्रह में परखा जा सकता है। यहाँ कोई भी घटना और दृश्य अमूर्त नहीं है, सब कुछ स्पष्ट व साफगोई के साथ उपस्थित है क्योंकि कवि भाषा के करतब की अपेक्षा निष्ठापूर्ण जनपक्षधर अभिव्यक्ति पर अधिक जोर देता है। उनकी एक कविता है कैसे कह दें'' इस कविता में खण्डित सपनों और कल्पित सपनों के बीच की अनचाही खाईं को उकेरा गया है “कहते हो/ सम्पूर्ण हुई अधूरी क्रान्ति / बदल गया है राज / बदल रहा सम्पूर्ण समाज / और मैं देख रहा हूँमेरे पड़ोस के बच्चे / पेट दबाए सो जाते हैं''। यही भाषा और यही तेवर साठोत्तरी कविता में भी है। लोकतन्त्र और आजादी के विद्रूप चेहरे और अमानवीय चरित्र को उद्घाटित करती इन कविताओं का मूल्यांकन टकराती हुई सांसों और संघर्ष के लिए तत्पर व्यक्ति के मनोवेगों को भाँपकर ही किया जा सकता है। कविता संग्रह के इस खण्ड की अन्य कविताओं जैसे-इस वक्त के बाद, कारखाने से लौटने पर, ताला, सरकार चाहती है, लिख दें एक नारा दीवार पर, आग और अन्न में यही मोहभंग का भाव प्रधान है।


    इस खण्ड में एक बात और गौरतलब है कि चिड़िया और गौरैया आदि को लेकर कवि ने कई कविताएँ लिखी हैं। इन कविताओं में विविध प्रयोग देखने में आते हैं। जीवन और जगत् के प्रति नकारात्मक अवधारणाओं और परिस्थितियों से निरन्तर टकराव देखने को मिलता है, साथ ही सार्थक संघर्षों द्वारा मनुष्य को उस पार ले जाने की ईमानदार कोशिश भी दिखाई देती है। सकारात्मकता और जीवन के प्रति एकनिष्ठ समर्पण व लोकमानस से जुड़े रहने का अटूट जज्बा इन चिड़िया सिरीज की कविताओं में परिलक्षित होता है। उनकी एक कविता है गौरैया। इस कविता में गौरैया ‘‘मेहनतकश'' वर्ग का प्रतीक बन गई है। जहाँ भी गौरैया या चिड़िया का प्रयोग है, वहाँ उसके श्रमशील चरित्र को अवश्य उकेरा गया है। श्रम और उसका व्यक्तित्व व गौरैया के मासूम सपने सब आपस में आत्मीय रूप से संबद्ध हैं। साथ ही गौरैया के खिलाफ सक्रिय शक्तियों की चर्चा उनके चरित्र का वर्णन इन कविताओं को विपर्यय और गतिरोध के भयानक दिनों में भी निर्माण के हौसलापूर्ण व साहसी संकल्प का मार्ग सुझाती हैं। प्रतीक में वर्गीय चरित्र खोज लेना इन कविताओं को अपनी तरह का विलक्षण विस्तार देता है। गौरैया, चिड़िया, चिड़िया और आदमी एक, चिड़िया और आदमी दो, ऐसी ही कविताएँ हैं जो अपने अभिधार्थ से मुक्त होकर वैचारिक निर्मितियों के ध्वन्यार्थ का निर्वहन करती हैं।


    ''वह औरत नहीं महानद थी'', यह शीर्षक स्त्रीवादी कविता का है। स्वाभाविक है स्त्री पर कविताएँ होंगी। इस कविता संग्रह के दूसरे खण्ड में ऐसी कविताएँ हैं। इन कविताओं में विशेषकर “वह औरत नहीं महानद थी'' में कवि एक एक्टिविस्ट संघर्षशील औरत का वर्णन करता है। हमारे समाज में ऐसी लड़ाइयाँ लड़ने वाली औरतें बहुत हैं जो तमाम छोटी बडी लड़ाइयाँ पूरे समर्पण के साथ लड़ रही हैं। कवि ने ऐसी स्त्री को ‘‘महानद'' कहा है। महानद होने का आशय है कि वह अपने वर्ग का प्रतीक हैऔरत को वर्ग के रूप में देखना नव वामपंथ का नजरिया है और यौन विमर्श का रचनात्मक जवाब भी है। स्त्री के समक्ष सबसे बड़ा संकट यह है कि वह वर्ग के रूप में अभी तक अपनी कोई पहचान नहीं बना पाईवह व्यवस्था और भागीदारी से विस्थापित होते-होते पुरुषवर्चस्ववाद के समक्ष हाशिया बनकर रह गई। आधुनिकतावादी लेखकों ने हाशिए के सवालों को लेकर विचारधारा पर सवाल उठाए और तमाम किस्म के विमर्शों को साहित्य में प्रस्तावित किया। इन विमर्शों का स्वरुप भले ही बाजारवादी रहा पर जो वस्तु मुद्दा नहीं थी, वह भी जरूरी का मुद्दा बनी। वामपक्ष के समक्ष दो ही रास्ते थे या तो बाजारवादी भूमंडलीकृत विमर्शों के समक्ष नतमस्तक हो जाए या फिर स्त्री को वर्गीय स्वरूप देकर उसके हक और विस्थापन व संघर्षों को अपने एजेण्डे में सम्मलित करेकौशल किशोर ने खुद को नतमस्तक नहीं किया बल्कि औरत को वर्गीय पहचान दी। चरित्रों के माध्यम से कवि भूमण्डलीकृत वैचारिक समस्याओं व संरचनात्मक समस्याओं से सीधे टकराता है। जिस तरह से आज का नव बुर्जुवा स्त्री को घेर रहा है और विस्थापित कर उसे अपनी उँगली मे नचा रहा है, उस वीभत्स स्थिति का बड़ा गम्भीर अहसास है रचनाकार को। यही कारण है, यह कविता संग्रह कौशल किशोर ने आधी आबादी को समर्पित किया है। स्त्री है वह, मलाला, माँ का रोना, उसका हिन्दुस्तान आदि इसी भावभूमि और कथ्य की कविताएँ हैं। कविता संग्रह का दूसरा खण्ड भूमण्डलीकृत हिन्दुस्तान की जमीनी समस्याओं के सापेक्ष रचनात्मक समस्याओं का नए विजन के तहत वर्णन है। अस्मिता विमर्श और हाशिए के सवालों को लेकर “अनन्त है यह यात्रा'' खण्ड बेहद महत्वपूर्ण है। सबसे बड़ी बात है मोहभंग यहाँ प्रतिरोध में बदल गया है और शत्रु बुर्जुवा की जगह वैश्विक पूँजी से संचालित फासिज्म हो गया है। धूमिल और नक्सलवाड़ी कविता व भाषा दोनों से कवि मुक्त हो गया है। वे समाज की यथार्थ संरचनाओं को लेकर चरित्र आधारित कविताएँ लिखकर जीवन अनुभवों के समकालीन'' बनाए रखने में बेतरह सफल दिखते हैं। अक्सर ऐसा नहीं होता है। उमर के पड़ाव पर रचनाकारों के जीवन अनुभव चुकने लगते हैं। वह अपने आपको दोहराने लगता है। वह नए रचनात्मक खतरों को नजर अन्दाज करते हुए अपने दशक में जड़ होकर बैठ जाता है। यह खतरा बहुत से कवियों में है जो अपने दशक को ही दोहरा रहे हैं। कौशल इस खतरे से बच गए हैं। दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों को लेकर लिखी गई कविताओं में उनके इस नएपन को ‘‘समकालीनता'' के साथ जोड़कर परखा जा सकता है। वैश्विक पूँजी का सबसे बड़ा करतब है कि वह विभ्रम उत्पन्न करती है। आदर्श और व्यवहार में गड़बड़ी होती हैजो जैसा दिख रहा है, वैसा सरल नहीं होता, सरलता की भीतरी तहोंमें जटिलताओं का अम्बार लगा होता है। कवि इस विभ्रम को पहचानता है और जब वह पहचान लेता है तब सवाल खोजता है, उनसे मुठभेड़ करता है। कौशल भी विभ्रम को पहचानते हैं। उनकी कविता है “जो'' / इस कविता में विभ्रम का उल्लेख है कि “जो जैसा दिखता है / वह होता नहीं / जो जैसा होता है / वैसा दिखता नहीं''। इस विभ्रम का हल है, वैज्ञानिक नजरिया अर्थात् ‘‘द्वन्द्ववाद''। कौशल किशोर इस खण्ड में समस्त विभ्रमों का निराकरण इसी नजरिए से करते हैं और हाशिए की अस्मिताओं का परीक्षण करते हैं। स्त्रीवाद पर हम उनकी चिन्तनधारा पहले बता चुके हैं। इसी वर्गीय विभेद और शोषक-शोषित की नई मान्यताओं को लेकर वे दलित व आम जन का मूल्यांकन करते हैं। इस दृष्टिकोण से उनकी कविता हरिजन बस्ती में गाँधी और राम सेवक की सिसकियाँ, अनुपम मारा गया क्यों, उसकी जिन्दगी में लोकतन्त्र जैसी चरित्र गाथात्मक कविताएँ आती हैं। इन कविताओं में एक तरफ वह विमर्शो को लोकधर्मी स्वरूप देते हैं तो दूसरी तरफ चरित्रों के माध्यम से अस्मिता के वास्तविक सवालों का हल खोजते हैं1


     “वह औरत नहीं महानद थी'' के इस दूसरे खण्ड में कवि का विषय वैविध्य और शिल्प वैविध्य दोनों देखते बनते हैं। साथ ही लोक को लेकर कवि की आशावादी दृष्टि कवि के वैचारिक सरोकारों को और भी परिपक्व, रचनाशीलता के आकाश को और व्यापक कर देती है। मैं कह सकता हूँ कि कौशल किशोर वरिष्ठ कवियो की पीढ़ी में उन गिने चुने लोगों में से हैं जिन्होने अपने दशक और अपनी शुरुआत से विमुक्त होकर समकालीनता का ताना बाना बुना हैइस कविता संग्रह में कुछ आज का है तो कुछ आगे का भी हैअपने शहर, अपने गाँव और अपनी जमीन पर कविता लिखना सहज काम नहीं है। यह दुष्कर कार्य केवल लोकधर्मी कवियों ने किया जैसे केदार ने बाँदा, नागार्जुन ने तरौनी, विजेन्द्र ने धामपुर, सुधीर सक्सेना ने बिलासपुर। वही काम कौशल किशोर अपने लखनऊ को लेकर करते हैं। लखनऊ पर उनकी दो कविताएँ हैं-यह लखनऊ है एक, यह लखनऊ है दो। पहली कविता में लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान व विरासत का आत्मीय वर्णन करते हैं तो दूसरी कविता में आज के विकसित लखनऊ की दुर्व्यव्यवस्था, शोषण, यातनाओं का आक्रोशपूर्ण वर्णन करते हैं-‘जनाब चौंकिए नहीं / हाँफते, भागते, / हैरान, परेशान आप जहाँ पहुँचे हैं। वह लखनऊ ही है''। लखनऊ की भीड़, जाम, गन्दगी, बरोजगारी, तबाह बस्तियाँ, गन्दी गोमती, और प्रकृति की खूबसूरती की जगह भयावह रूप का ताण्डव जिस अन्दाज में वर्णित है, उससे लखनऊ एक शहर का स्वरूप छोडकर हिन्दुस्तान का रूप धारण कर लेता हैपूँजीवादी विभ्रमों के बीच छिपा हुआ शोषित, पीड़ित हिन्दुस्तान चित्र विचारों की आँख जड़ जाता है1