कला - मकबूल फिदा हुसैन के चित्रों में एकता सूफी रंग और भारतीय एकता - डॉ. जूही शुक्ला

एसोसिएट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष चित्रकला विभाग, प्रयाग महिला विद्यापीठ डिग्री कालेज, इलाहाबाद चित्रकला एवं अन्य विषयों पर कई पुस्तकें प्रकाशित, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं शोध पत्र प्रकाशित। कविता एवं कहानी लेखन में भी रूचि।


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आज चित्रकार एम. एफ. हुसैन का नाम आते ही अधिकांश लोग उन्हें सरस्वती की विवादस्पद चित्रकृति और तदोपरान्त देश निकाले व्यक्ति के रूप में ही जानते हैं। इनसे इतर कभी माधुरी दीक्षित पर आधारित चित्र श्रृंखला बनाने वाले या फिर कभी किसी फिल्म के निर्माण में व्यस्त अपने-ढंग का चित्रकार के रूप में। आज हुसैन सशरीर हमारे समक्ष नहीं है। उनके विवादास्पद घटनाओं और व्यक्तित्व से हटकर उनके अन्य आयामों को भी देखने की आवश्यकता हैमहज कुछ विवादों के कारण हम हुसैन का हुसैन होना या चित्रकार होना खारिज नहीं कर सकते। हमारे सूफी सन्तों ने जिस स्वविस्मृत सत्ता की बात की है, उसे रचनाकार जीते हैं। सूफीवाद पर चर्चा करना और सूफी हो जाने में बहुत फ़र्क है। यदि कोई सही मायने में सूफी होता है तो फिर चर्चाओं आदि की ज़रूरत ही उसे नहीं होती। रचनाकार बिना सूफ धारण किए सूफी होता है। उसे किसी चोंगे की आवश्यकता नहीं होती। हुसैन, धर्म धर्मनिरपेक्षता और फिर वर्तमान परिस्थितियाँ.. आज जरूरत है धर्मनिरपेक्ष होने की जिसे सूफियों ने बेहतर समझा था। यूं ऑक्सफोर्ड -शब्द कोष के अनुसार धर्मनिरपेक्षता वह मान्यता या सिद्धान्त है कि नैतिकता ईश्वर में विश्वास अथवा भावी जीवन की कल्पना पर नहीं, बल्कि मनुष्य के इसी लौकिक जीवन और उसके कल्याण पर आधारित होनी चाहिए।


        लेकिन सूफियों ने ईश्वर को खारिज न करके मानव कल्याण में ईश्वर भक्ति को स्वीकारा। मध्यकाल में ये अस्तित्व आए। श्री अरविन्द कहते हैं कि हम अपनी सत्ता के एक अतीत रूप की ओर पीछे नहीं हट सकते, परंतु हम नि:संदेह, आगे बढ़कर अपने-आपको फिर से एक व्यापक रूप में प्राप्त कर सकते हैं और अपनी इस प्रगति में हम बीच के अनुभव का अधिक अच्छा अधिक जीवंत, अधिक वास्तविक तथा अधिक आत्मप्रभुत्वपूर्ण प्रयोग करेंगे।'' सूफीवाद आज के दौर की जरूरत है। सूफियाना हो जाना हमें सभी झगड़ों में मुक्त कर देगा। इस सत्य को जितनी जल्दी स्वीकार लें उतना अच्छा है। जैसा कि हम जानते हैं हिन्दू और मुसलमान दोनो की ही अपनी-अपनी बेशकीमती सांस्कृतिक धरोहरें रही हैं


   जिस पर दोनों समुदायों को ही गर्व होना चाहिए। इसलिए इस्लाम और हिन्दुत्व दोनों की अपनी सम्मानित पहचान भी है लेकिन जब हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ रह रहे हो, जीवन के विभिन्न पड़ावों पर कदम-से-कदम मिलाकर चल रहे हों तो ये असंभव ही है कि वे एक दूसरे की संस्कृति से अप्रभवित रह जाएं। इस्लाम की मूल अवधारणा जैसा कि भारतीय एकता, एक ही ईश्वर और भाईचारे की बात को सभी भारतीय महान् चिन्तकों ने स्वीकारा है। ठीक उसी प्रकार से हिन्दुओं की सहनशीलता की भावना और उदारवादी दृष्टिकोण ने मुसलमानों में हिन्दुओं के प्रति विश्वास पैदा किया था। इन सबने मिलकर एक नए विचार को चरम पर पहुँचाया जिसे हम मुसलमानों में सूफी आन्दोलन के नाम से जानते हैं और हिन्दुओं में भक्ति आन्दोलन के रूप में। दोनों ने ही प्रेम, भाईचारे, सहनशीलता मानव सेवा और ईश्वर एक है की धारणा को बल दिया। आज के वैचारिक अस्थिरता के दौर में हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत हैं ये धारणाएं। सूफीवाद इस्लाम में एक उदारवादी और मानववादी आन्दोलन था। इसका उद्भव फारस में मानते हैं जहाँ शिया और सुन्नी में लगातार मतभेद था। सूफी मुसलमान सन्त थे जो समानता और इंसानी रिवायतों को तरजीह देते थे। वे साधारण जीवन के हिमायती थे। वे अधिकांश ऊनी लबादा पहनते थे जिसे अरबी में सूफ कहते हैं। सम्भवतः सूफ ही वह शब्द है जिसके बरक्स वे सूफी कहलाए। उन्होंने धार्मिक सहनशीलता की तरफदारी की और मारकाट एवं कुर्बानी का विरोध किया। उन्होंने ईश्वर भक्ति की वैयक्तिता पर जोर दिया जो केवल प्रेम और मानव सेवा में ही महसूस की जा सकती है। ये सारी बातें हिन्दुओं के योगी और साधुओं में भी पाई जाती रही हैं, सूफी सन्तों ने कुरान और पैगम्बर मोहम्मद के जीवन से प्रेरणा ली, कुछ सूफी विद्वानों ने यूनानी सोफिस्ट से भी प्रेरणा ली, जबकि कुछ वेदान्त और बौद्ध दर्शन से प्रभावित हुए। सूफीवाद के सिद्धान्तों में मुख्य हैं-


     सूफीवाद के सिद्धान्तों में मुख्य हैं-


    १. ईश्वर एक है और सर्वशक्तिमान है। सभी इंसान उसकी संतानें हैं। २. मानव से प्रेम ही ईश्वर से प्रेम है इसलिए सभी को मानवता से प्रेम करना चाहिए। ३. ईश्वर से सच्चा प्रेम कर्मकाण्डों और उपवास से ज्यादा महत्वूपर्ण है४. ईश्वर को महसूस करने के रास्ते और तरीके अनेक हैं। अतः सभी को एक दूसरे की धार्मिक भावना और विश्वास के प्रति सहिष्णु होना चाहिए। ५. सभी मनुष्यों का सम्मान करना चाहिए। ६. किसी को धार्मिक बदलाव की ज़रूरत नहीं है। इतना ही पर्याप्त है कि कोई अपने धर्म और विश्वास को मान रहा है। ७. संगीत एक रास्ता है ईश्वर तक पहुँचने का। ध्यान भी ईश्वर की सत्ता को महसूस करने के लिए आवश्यक है। ८. सभी मनुष्य समान हैं। रंग, जाति के आधार पर किया जाने वाला भेदभाव अस्वीकार्य होना चाहिए। मानवता के लिए वैश्विक भाईचारे की बात सभी धर्मों में होनी चाहिए। (सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दु:खभाक्भवेत) ९. प्रत्येक आत्मा परमात्मा का अंश है और अन्ततः उसी में फिर विलीन हो जाती है। १०. आंतरिक शुद्धता और स्वानुशासन आवश्यक दशाएं हैं, ईश्वर को प्राप्त करने की।


     उपर्युक्त सूफीवाद को जानने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कलाकारों ने सूफीवाद को ज़िन्दा रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कोई भी रचनात्मक कार्य जो अतिशय तल्लीनता से किया जाए वह सूफीवाद के निकट है।


    सभी कलाओं में सूफीवाद या सूफियाना अंदाज हमेशा ही सराहा गया और लोगों ने एक प्रकार का सुकून और आनन्द प्राप्त किया। इसीलिए ये निर्विरोध होकर अपनी रफ्तार से बढ़ते रहे। सम्प्रदायवादियों की भाँति इनमें सत्ता या शासन का लोभ कभी नहीं रहा.......आज धार्मिक गुरू सत्ता को अपनाने से हिचकते नहीं। वे हर तरह के क्रियाकलापों में व्यस्त हैं। व्यापार, व्यभिचार, अनाचार, वैभव कुछ भी धर्म की आड़ में फल-फूल रहा है।


    हालाँकि इनके आचरण हट भी रहे हैंपरन्तु अविश्वास बढ़ता जा रहा है। ये दौर सूफियत की कैफियत को समझने का भी है। फिल्मों में सूफी संगीत हमेशा से परवान चढ़ा, दरगाहों पर बजते संगीत ने हमेशा लोगों को आकर्षित किया, खुवाजा मुईनुद्दीन चिश्ती हों, सलीम चिश्ती हों, हाजी अली हों, रंगीले छबीले हों, लाइन बाबा हों सभी ने सभी धर्मों के लोगों का मन जीता। ठीक ऐसे ही सुफी साहित्य ने भी अपना अलग मुकाम बनाया। जायसी, मंझन, उसमान आदि ने अपने काव्यों के माध्यम से प्रेम को प्रधानता दिलाई। अपने प्रेमाख्यानों में उनका संदेश मानव हृदय को विशालता प्रदान करना तथा उसे परिष्कृत करना ही रहा हैसूफियों ने संकीर्णता को त्यागने की बात की।


     सूफी चित्रकारी में ‘भड्कना' के माध्यम से चित्रकारों ने विराट् भक्ति की हिमायत की है। फैब्रिजियो कासेटना के चित्रों में कुछ ऐसा ही भाव है, जिसमें स्वर्गीय आनन्द को महसूस करती सूफी सन्तों की आकृतियाँ हैं। रेखाओं और आकारों की लयात्मकता देखते ही बनती हैलेकिन इन सूफी विरलिंग के अलावा भी हमारी कलाओं में सूफियत के रंग हमेशा से रहे हैं। चित्रों में मुक्ति का एहसास और इहलोक से इतर एक सुकून हमेशा से अपने पंख फैलाए रहा है। भले ही उन चित्रों का नाम कुछ भी हो लेकिन मध्यकाल के अधिकांश चित्र प्रेम और ईश्वर की ही बात करते हैं। कृष्ण और राधा से बढ़कर कोई सूफी हो ही नहीं सकता। नजीर अबकराबादी ने कृष्का को आधार बनाकर जो लिखा उसके मर्म में सूफियत ही है। अमीर खुसरो, मुल्ला दाउद की रचनाएं प्रेम की बानगी हैं। दुनिया भर के चित्रकारों को सूफी चक्कर ने मोहित और आकर्षित किया हुआ है, सूफी चक्करों में एक उन्मुक्तता की बात है। चित्रकार हुसैन की पिकासो शैली के चित्र सूफी अंदाज में ही बने हैं, यूँ हर रंग में बने उनके चित्रों में एक अजीब सी कशिश है जो उन्हें अपने समकालीनों से अलहदा करती है। मगर हुसैन को लेकर जो विवाद हुएउस पर मुनव्वर राना का ये शेर याद आ गया कि वहशत में तार तार गरेबान कर दिया, तहजीब का असासा भी कुर्बान कर दिया। यारा ने खुश मज़ाक ने अल्लाह की पनाह, उर्दू को बेकुसूर मुसलमान कर दिया''।


      कलन्दरी और फ़कीरी की जन्मदाता उर्दू जुबान जिस पर भी आशिक हो गई उसे तारीख का हिस्सा बना दिया, तहज़ीब का निगहबान और खाकुसारी (विनय-शीलता) की मिसाल बना दिया। अपनी शोकीनी से जिन्दगी की कड़वाहटों को कम करके दीवानगी के उस मुकाम तक ले गई जहाँ नफरतों ने आदाब अर्ज करना सीख लिया और दीवानगी ने गजल...... गुजुल की रट लगाते हुए कलन्दरी के शाबिस्तानों (शयनागारों) में खुशरंग कन्दीले रौशन कर दीं। रफ्ता-रफ्ताइन कुन्दीलों की रौशनी ने सारे हिन्दुस्तान को तहज़ीब का उजाला बना दिया।''


    जावेद अख्तर का एक शेर है-


    **आज की दुनिया में जीने का करीना समझो


      जो मिलें प्यार से उन लोगों को जीना समझो''


    जिस वक्त हुसैन अपने चित्रों में उर्दू अक्षरों का इस्तेमाल करते हैं वे पूरे पूरे अक्षर किसी सूफी सन्त की आकृतिनुमा आकार ग्रहण कर लेते हैं, रंगों का कालापन फैलते-फैलते रुक जाता है और एक सफेद आकृति अपनी पूरी ताकत के साथ उभरती है जो इस बात का प्रमाण है कि आपकी अन्तरात्मा उस अदृश्य परम सत्ता से मिलकर प्रकाशित हुई है। मटमैला रंग अपनी मिट्टी और ज़मीनी हकीकत का प्रमाण है। हरे रंग का घोड़ा -शस्य श्यामला धरती का प्रतीक है। इसके अलावा हर देखने वाले को अपने-अपने रंग दिखते हैं उन तस्वीरों में जो ईश्वर को अपने तरीके से प्यार करने जैसा ही है। इसी प्रकार वधेरा आर्ट गैलरी में उनकी बिना शीर्षक चित्रकृति में एक विशाल स्त्री आकृति है जिसके शरीर में ऊपर का वस्त्र नारंगी और नीचे का हरा है। उस स्त्री के पीछे कंधे पर एक नीली आकृति और एक सफेद आकृति है और सीने से एक काली आकृति चिपकी हैं। बैकग्राउंड में मटमैला रंग, काला सूरज और एक मुड़ी तुड़ी सफेद साड़ी। हर रंग अपनी कहानी खुद कहता है। इसी प्रकार सरस्वती नामक चित्र में जो लंदन में है, हरे रंग के बैकग्राउण्ड में पीले रंग से एक स्त्री आकृति वीणा लेकर बैठी है। उसके पीछे वाद्ययंत्र तबले हैं, एक वृत्त है और अग्रभूमि में एक दीपक है। स्त्री आकृति को उभारने के लिए काला या कहिए भूरा रंग भी अपने आप में सूफी सादगी की बयानी करता है। इसी प्रकार उनका मीराबाई नामक चित्र है जिसमें श्वेत साड़ी में मीरा की बड़ी आकृति हाथ में इकतारा लिए है और दाईं जाँघ पर बालकृष्ण की छोटी आकृति है। ऐसे ही १९७२ की कृष्ण नामक चित्रकृति में काली आयाताकार पृष्ठभूमि पर विशालकाय पीले रंग का वृत्त है, उसके आगे बड़ी सी सफेद गाय और गाय के नीचे कृष्ण की छोटी आकृति एक सहृदयता, मातृत्व और प्रकृति की विशालता को दर्शाने वाली भंगिमा, कम रेखाओं में पूरी दुनिया को समेट लेने की कोशिश उसे दैवीयरूप दे देती हैं। ऐसी अनेक चित्रकृतियाँ हैं जो रंगों के माध्यम से एक कोमल भावना को उजागर करती दिखती हैंजैसा हमारे सूफी सन्तों के कृत्यों में देखने को मिलता है। उनके ‘हुनु सुपरमैन' नामक चित्र में हनुमान को पीले रंग से एकदम साधारण रेखाओं में सरलतम रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसने अपनी छाती को चीरकर रखा है, अन्दर सफेद रंग की एक पुरुष और एक स्त्री की सूक्ष्म आकृति है जो हृदय की शान्ति का परिचायक है। यह चित्र मूल रूप से एक लिथोग्राफ है। हुसैन के बाद के सभी चित्रों की सरल आकृति और रूहानी रंग उनके मिजाज के सूफीपन को दर्शाते हैं। हम देखते हैं कि सूफीवाद ने न सिर्फ कवियों, लेखकों एवं संगीतकारों को आकर्षित किया अपितु चित्रकारों ने भी सूफियाना अंदाज में रंगों और रेखाओं के माध्यम से प्रस्तुतियों को रचा है, हुसैन ने तो ‘फ़ना बका' नाम से चित्र श्रृंखला का निर्माण किया, यूँ हुसैन के अधिकांश चित्रों, में एक सूफीवाद रहता ही है। रंग और रेखाओं में बरती गई मितव्ययिता उन्हें सूफीवाद के बहुत निकट लाती है। गांधी का चश्मा वाला रेखांकन इस वस्तुनिरपेक्षता का अतिरेक ही है।


                                                                                                                                                                सम्पर्क : 304 बरसाना अर्पाटमेंट, माधोकुंज, कटरा,


                                                                                                                                                             इलाहाबाद-211002, मो.नं. : 9411082387