स्मृतिशेष/केदारनाथ सिंह -प्रेम के लिए इटली से अच्छी जगह नहीं - शीर्ष कवि केदारनाथ सिंह से अजीत राय की बातचीत

 


यह १७ फरवरी २०१५ की रात है या इतिहास का कोई जीवंत अध्याय। पटना राजधानी एक्सप्रेस १२० किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भाग रही है। नीचे की बर्थ पर मेरे सामने बैठे केदारनाथ सिंह मानों विश्व कविता का पूरा इतिहास खोल रहे हैं। उस नीम अंधेरी रात में हम कविता के एक-दूसरे ही भूगोल में पहुंच गए हैं। वे बताते हैं कि कैसे जब निकारागुआ के पादरी और कम्यूनिस्ट कवि अर्नेस्तो काडैनाल ने हॉलीवुड की ड्रीमगर्ल मर्लिन मुनरो की आत्महत्या पर कविता लिखी तो तहलका मच गया- 'हे ईश्वर/ तुम तो जानते हो वह किससे बात करना चाहती थी।' (फिर धीरे से कहते है - वह अमेरिकी राष्ट्रपति से बात करना चाहती थी। वह प्रेम में थी। कितना दुखद है प्रेम में किसी स्त्री का आत्महत्या करना!) 


       अब बात प्रेम पर शुरू हो गई। स्मृति के गहरे अनंत से गुजरते हुए उन्होंने फिर अर्नेस्तो कार्डेनाल को याद किया, 'जब तुम नहीं होती न्यूयार्क में तो कोई नहीं होता न्यूयार्क में। जब तुम होती हो न्यूयार्क में तो कोई नहीं होता न्यूयार्क में।'


         ऐसे महान कवि को कम्युनिस्ट पार्टी ने निकाल दिया क्योंकि उन्होंने पादरी का फर्ज अदा करते हुए पोप के चरण चूमे थे।


         मैंने उन्हें महान् रूसी कवि मायकोवस्की और स्तालिन का संवाद याद दिलाया। वे बोल पड़े, 'हां, ठीक याद दिलाया तुमने । हुआ यह था कि मास्को के एक छोटे से अनजान कैफे में चार दोस्तों के बीच एक युवा कवि ने स्तालिन के खिलाफ एक कविता पढ़ी। वह मायकोवस्की का शागिर्द था। दूसरे दिन मायकोवस्की के घर स्तालिन का फोन आ गया। स्तालिन ने उस युवा कवि का नाम लेकर पूछा कि वह कैसा कवि है। मायकोवस्की ने डरते हुए घबराकर बोल दिया कि वह साधारण कवि है। स्तालिन ने यह कहते हुए फोन रख दिया, ‘आप अपने दोस्त को बचाना नहीं चाहते।' मायकोवस्की की पत्नी ने उन्हें खूब डांटा। उस रात के बाद उस युवा कवि का कुछ पता नहीं चला। यानी कि स्तालिन जैसा तानाशाह भी किसी कवि को मरवाने से पहले यह जानना चाहता था कि उसका क्या स्तर है। हो सकता था कि मायकोवस्की के यह कहने से उसकी जान बच जाती कि वह एक महत्वपूर्ण कवि है।


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                                                          कवि केदारनाथ सिंह और अजीत राय


         सारी दुनिया घूमने के बाद यदि पूछा जाए कि किस देश में कुछ महीने बिताना चाहेंगे?


        एक क्षण के लिए वे कहीं खो गए। कुछ याद करते हुए बोले- ‘इटली'। मैंने जोड़ा- ‘कवि को प्रेम करने के लिए इटली से अच्छी जगह दुनिया में और कहीं नहीं है।'


        उन्होंने कहा- 'कवि हीं क्यों? किसी के लिए इटली से अच्छी जगह दूसरी कोई नहीं। एक बार रोम और वेनिस के बीच पादुआ गांव में प्रधान के घर ठहरा था। एक १९- २० साल की लड़की मेरी दुभाषिया थी। उसी गांव में माइकल एंजेलो की पहली दीवाल पेंटिंग थी। उस लड़की का एक पचहत्तर साल का प्रेमी था जो कवि था। हम एक ऐतिहासिक इमारत को देखने गए। हमें १२० सीढियां चढ़कर ऊपर पहुंचना था। हम ऊपर पहुंच गए। वहां जो हुआ सो हुआ। कुछ देर बाद अचानक उस लड़की को याद आया कि उसका बुढा प्रेमी तो नीचे छुट गया। वह नीचे की ओर भागी। पीछे-पीछे मैं भी भागा। मैं क्या देखता हूं कि वह बूढ़ा रेंगता हुआ जैसे-तैसे बीस सीढ़ियां चढ़कर सुस्ता रहा था और उदास आँखों से ऊपर की सीढ़ियों की ओर देख रहा था। वह लड़की भागती हुई उसके पास गई और उसे बेतहाशा चूमने लगी।


       मैंने महसूस किया कि यह दृश्य दुनिया की किसी भी महान् कही जानेवाली प्रेम कविता से कम नहीं है। तभी उन्हें कवि बायरन की याद आई। उन्होंने कहना शुरू किया - ‘फ्लोरेंस (इटली) के पास अपने कॉटेज की बालकनी से समुद्र को निहारता हुआ बायरन इतना भाव विह्वल हो गया कि समुद्र में कूद गया। एक-डेढ़ किलोमीटर तैरने के बाद किसी तरह किनारे लगा। आज भी वहां बायरन का स्मारक है।' ।


       मुझे लगा कि मास्को जैसे किसी कसक की तरह उनके जिगर में बसा हुआ है। मैंने लियो तोलस्तोय का प्रसंग छेड़ दिया। एक लंबी सांस लेक किया।  


        ‘तोलस्तोय अपने गांव के लोगों से बहुत प्यार करते थे। उनकी पत्नी गांव वालों को पसंद नहीं करती थी। कारण कि गांव वालों के जूतों में कीचड़ लगा होता था जिससे फर्श गंदा हो जाता था। तोलतोय अपनी पत्नी से डरते थे पर गांव वालों के लिए तरसते रहते थे। इसलिए उन्होंने अपने कमरे की खिड़की से बाहर एक सीढ़ी लगा रखी थी जिससे गांव वाले सड्क से सीधे उनके कमरे में आ जाएं और उनकी पत्नी को पता न चले। हालांकि दूसरी सुबह फर्श साफ कराते समय उन्हें पता चल ही जाता था। तोलतोय ने अपनी मशहूर किताब ‘वॉर एंड पीस' के तेरहवें अध्याय का नाम ही ‘जूता' रख दिया था।


       जब उन्हें लगा कि उनका अंत समय आ पहुंचा है। तो बिना किसी को बताए एक नौकर के साथ चुपचाप बग्घी में मास्को से दूर निकल गए। एक छोटे से अनजान रेलवे स्टेशन पर बग्घी रुकी। तोलस्तोय ने नौकर को अपनी पहचान बताने से मना किया। स्टेशन मास्टर के छोटे से कमरे में उन्हें लिटाया गया। मैं में कभी-कभी सोचता हूं कि दुनिया का यह महान लेखक अनजाने एकांत में क्यों मरना चाहता था। नौकर ने स्टेशन मास्टर को धीरे से बता दिया कि उसके बिस्तर र पर जो शख्स लेटा है, वह लियो तोलस्तोय है। स्टेशन मास्टर को सहसा विश्वास नहीं हुआ। वह यू ही खड़ा रहा। जब उसे होश आया। तो वह स्टेशन की ओर दौड़ा। पलक तो वह स्टेशन की ओर दौड़ा। पलक झपकते ही सारी दुनिया को पता चल गया कि तोलस्तोय नही रहे।


         कुछ देर सन्नाटा छाया रहा। फिर मैंने फ्रांस के ज्याँ पाल सार्च का जिक्र छेड़ दिया जिन्होंने मशहूर नोबेल पुरस्कार अस्वीकार करते हुए कहा था कि, ‘नोबेल पुरस्कार मेरे लिए एक बोरा आलू के बराबर है।'


          अब हम पेरिस में थे।


           उन्होंने कहना शुरू किया- ‘सार्च और सीमोन द बोऊआ का प्रेम विलक्षण था। सीमोन ने सार्च के अंतिम दिनों पर एक किताब लिखी है - ‘अडिऊ' (विदा) । उसमें सात्र के ग्लैमर के बारे में लिखा है कि मरते दम तक पेरिस जवान लड़कियां उनपर फिदा रहती थी। पिछले दिनों मैं सार्च की कब्र पर गया। देखता क्या हैं कि कब्र के उपर और चारों ओर मेट्रो के टिकट बिखरे पड़े है जैसे हम फूल चढ़ाते हैं। मैंने एक टिकट उठाया जिसपर लिखा था-'नींद से उठे तो घर आ जाइएगा।' मुझे बताया गया कि आज भी पेरिस में सार्च को चाहने वाले यह मानने को तैयार नहीं हैं। कि सात्रे मर चुके हैं।


        जब भी कोई स्त्री किसी लेखक बुद्धिजीवी से प्रेम करती है तो कुछ दिन बाद वह ऊब जाती है क्योंकि उसका प्रेमी तो किताबों में ही खोया रहता है। सीमोन के साथ भी हुआ। एक गबरीले अमेरिकी पर सीमोन फिदा हो गई और सार्च को छोड़कर अमेरिका चली गईं। वहां एक साल में ही वह ऊब गईं। जब वापस लौटीं तो सात्रे कुछ लिख रहे थे। उन्होंने सीमोन को प्यार से देखते हुए कहा- वेलकम बैक। तुम्हारा कमरा उधर है। सार्च को थोड़ा भी गुस्सा नहीं आया, ईष्र्या नहीं हुई। ऐसा प्रेम दुर्लभ है।।


         अभी मेरी कविताओं का संकलन फ्रेंच भाषा में छपा। पेरिस में उसका लोकार्पण हुआ। मुझे भी बुलाया गया। जिस करेक्टर प्रकाशन ने यह किताब छापी है, उसने मुझे इतनी रॉयल्टी दी जितनी आज तक मुझे नहीं मिली। यह रकम मेरे अबतक के जीवन भर की रॉयल्टी से भी अधिक है। मैं उस कैफे में गया जहां ज्याँ पाल सात्रे बैठते थे। वहां उनकी कुर्सी पर टिकट कटाकर बैठने के लिए लंबी लाइन लगी हुई थी। जब रेस्त्राँ मालिक को मेरी अनुवादिका ने मेरे बारे में बताया तो वह दौड़ता हुआ आया और मेरे बारे में घोषणा करके मुझे बिना लाइन के सार्च की कुर्सी पर बिठाया। मैं बता नहीं सकता कि उस क्षण मुझे कितनी खुशी हुई। क्या हम भारत में ऐसा कुछ नहीं कर सकते? फ्रास दुनिया का अकेला देश है जहां कला-साहित्य-संस्कृति-सिनेमा को सबसे अधिक महत्व मिलता है।


        तभी मुझे याद आया कि एक बार उन्होंने अमेरिकी कवयित्री एमिली डिकिंसन का प्रेम-प्रसंग सुनाया था। उन्होंने बताया कि एक बार वे अमेरिका में मौत की घाटी पार करके डी.एच.लॉरेंस का घर देखने गए थे। उस यात्रा


में उन्हें एमिली डिकिंसन की बहुत याद आई। उस लड़की ने अपनी कविताओं से अमेरिका के राष्ट्र कवि कहे जाने वाले वाल्ट ह्विटमैन के पोएटिके एस्थेटिक को बदल दिया था। उसने अपने प्रेमी को जिंदगी में केवल एक बार देखाथा और एकतरफा प्रेम कर बैठी। वह एक पादरी था। उसने । उसके प्रेम में चार सौ से अधिक कविताएँ लिखीं जिससे वह कभी नहीं मिली। उसके मरने के बाद उसकी बहन ने उसके सामान में से ये कविताएं निकालकर किसी प्रेस वाले को दिखाया। जब ये कविताएं छपी तो तहलका मच गया।'


         कुछ देर चुप्पी छाई रही। जब मैंने मशहूर किताब ‘मेरा दागिस्तान' के लेखक रसूल हमजातोव से मिलने की याद दिलाई तो सहसा वे चौंक गए। उन्होंने कहा- ‘बहुत साल पहले मैं मास्को में एक लेखक सम्मेलन में गया था। यह तब की बात है जब सोवियत संघ टूटा नहीं था। राइटर्स यूनियन के सभागार में  मंच पर हम अर्धवृत्ताकार बैठे थे। मेरी बगल में एक व्यक्ति को छोड़कर एक मोटा व्यक्ति बैठा हुआ था। काव्य पाठ चल रहा था। मैंने अपनी सुंदर अनुवादिका से पूछा तो उसने बताया कि ये  रसूल हमजातोव हैं। मैं खुशी से भर उठा' मेरा दागिस्तान के लेखक मेरी बगल में बैठे हुए हैं। मैं उनके पास गया। यह जानकरवे खुश हुए कि में भारत से आया हूं। मुझे बताया गया कि रसूल हमजातोव नस्लभेद के शिकार हैं। मैंने उनसे पूछा कि आपके रहते कोई दूसरा लेखक सम्मेलन की अध्यक्षता कैसे कर सकता है। वे मुस्कुराते हुए बोले- मैं नीची जाति का हूं। जो लेखक अध्यक्षता कर रहा है वह ऊंची जाति का है। मै अवाक रह गया। मैं सोचता था कि भारत में ही जातिवाद है।


     मैंने पूछा- 'आपकी विश्व प्रसिद्ध कविता ‘बनारसको लेकर दुनिया भर में कैसी प्रतिक्रिया रही?'


      ‘मेरे लिए बनारस शहर और यह कविता किसी। चमत्कार से कम नहीं हैं। यह विस्मयकारी है कि दुनिया भर में इस कविता को इतनी गहराई से ग्रहण किया गया। मुझे याद है कि जब हार्वर्ड विश्वविद्यालय में जब मैं इस कविता को पढ़कर मंच से नीचे उतरा तो सुप्रसिद्ध मराठी कवि अरूण कोल्हटकर ने मेरा ध्यान एक बूढे अमेरिकी की ओर दिलाया जो भीड़ में पीछे खड़ा मेरा ऑटोग्राफ चाहता था। उसने अपनी नोटबुक में हिंदी में हस्ताक्षर के साथ बनारस कविता की एक पंक्ति लिखने का अनुरोध किया।


       इसी तरह अमेरिका के एक छोटे कस्बे संताफे में मेरे साथ पाब्लो नेरूदा के प्रसिद्ध अनुवादक नेथेलियन टार्न ने जब ‘बनारस' कविता का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा तो श्रोताओं में बैठी एक अमेरिकी अधेड़ महिला रोने लगी। में चकित था क्योंकि इस कविता में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे रोना आए। मेरे पछने पर उसने बताया कि वह कविता के लिए नहीं बनारस के लिए रो रही है जहां वह कभी नहीं जा पाएगी। मुझे लगा कि बनारस का जादू सिर्फ उन्हीं के लिए नहीं है जिसने उसे देखा है, बल्कि उनके लिए और भी ज्यादा है जिसने बनारस नहीं देखा है। यह जादू बनारस का है, मेरी कविता का नहीं।


       आपकी अधिकतर कविताएँ ग्रामीण जीवन पर है। यूरोप में इनपर क्या प्रतिक्रिया होती है?


        ‘पश्चिमी यूरोप में अब  गाँव खत्म हो गए हैं। पशु भी चिड़ियाघर में ही दिखाई देते हैं। जब मेरे कविता संकलन ‘बाघ' का इटेलियन में अनुवाद छपा तो वहां पाठकों ने बड़ी दिलचस्पी दिखाई क्योंकि उन्होंने बाघ देखा ही नहीं था। वहां के एक मनोचिकित्सक ने ‘टाइग्रे' (बाघ का इटेलियन नाम) की ढेरों प्रतियां अपने मरीजों को उपहार में दीं।।


        'चीन में कविता का क्या हालचाल है' में बात को आगे बढ़ाता हूं।


         'अच्छा याद दिलाया।' वे कुछ याद करते हुए बोले। ‘कुछ साल पहले जब मैं जे.एन.यू. में था तो चीन की एक सुंदर कवयित्री से मुलाकात हुई थी मैं चकित हूं कि ऐसा कैसे हुआ कि चीन जैसे विशाल देश में हजारों सालों से एक ही भाषा बनी रही। वहां शासन और जनता की भाषा एक ही है। हालाकि वहां सात सौ भाषाओं को दबाकर एक भाषा का वर्चस्व कायम हुआ है। मुझे कुछ युवा चीनी लेखक मिले जो इस बात से परेशान थे कि हम नोबेल पुरस्कार को इतना महत्व क्यों देते हैं और हम पर लिखते समय पश्चिम का इतना दबाव क्यों है। उनका कहना है कि एशियाई देशों के लेखकों को अपने भीतर से साहित्य के मानदंड विकसित करने चाहिए। यह बड़ी बात है। यह भविष्य का संकेत है। तब उसे कोई खास महत्व नहीं मिला था। दस साल बाद जब मैं चीन गया और उसके बारे में पूछा तो पता चला कि उससे मिलने के लिए। हप्तों इंतजार करना पड़ता है। वह इतनी लोकप्रिय हो गई है। 


         यह २०१४ के वसंत की बात है। मैं और केदारनाथ सिंह साहित्य अकादमी के एक सेमिनार में मुबई गए थे और कोलाबा के गेस्ट हाउस में ठहरे थे। सुप्रसिद्ध गीतकार पंडित नरेंद्र शर्मा की गीतकार गीतकार पंडित नरेंद्र शर्मा की जन्म शतवार्षिकी संगोष्ठी (२६२७ फरवरी, २०१४)। जब कवि सुंदर चंद ठाकुर के यहां से तत्व चिंतन के बाद देर रात हम टैक्सी में लौट रहे थे तो अचानक उन्होंने कहा- ‘ए सुन। गुलजार मिलल चाहत बाड़न। फोन कइले रहलन हअ। काल्हू चले के। दिन के भोज-भात ओहिजे होई।' (केदार जी मुझसे हमेशा भोजपुरी में बात करते हैं।) मेरे लिए यह न्यूज थी। जिस गुलजार से मिलने के लिए सारी दुनिया उतावली रहती है,वे केदार जी से मिलने के लिए बच्चे की तरह मचल रहे हैं। की तरह मचल रहे हैं।


          दूसरे दिन हम टैक्सी में बैठ गए। ड्राइवर ने पूछा‘कहां चलना है?'


         केदार जी को याद आया, पता तो उनसे पूछा नहीं। उन्होंने गुलजार साहब को फोन मिलाया। काफी मशक्कत के बाद एसएमएस से पता आया। मरीन ड्राइव पर जैसे ही उन्होंने समुद्र को देखा, खिल उठे। बोले- 'आहो, कुछ त जादू जरूर बा समंदर के।' और गुलजार के घर पाली हिल बांद्रा पहुंचने तक मैं दुनिया भर के उन समुद्र तटों को उनकी जबानी देख चुका था जिनका किसी-न-किसी रूप । वियों से रिश्ता रहा है। गुलजार की बैठक में पहुंचते ही केदार जी की नजर मिर्जा गालिब की मूर्ति पर पड़ी। वे चहककर बोले- ‘देखो, क्या बात है। मिर्जा भी है यहां।' जब हम चलने लगे तो गुलजार ने बच्चों से निर्दोषपन से अपने सहयोगी बिंदल जी से कहा- 'बिंदल जी, केदार जी के साथ मेरी एक-दो तसवीरें खींच दीजिए प्लीज।' मैं फिर अवाक था। जिन गुलजार के साथ फोटो खिंचवाने के लिए भीड़ उमड़ती है, वे केदार जी के साथ फोटो खिंचवाने का इसरार कर रहे थे। जिन गुलजार के दीवाने करोड़ों हैं, मैंने उन गुलजार को केदार जी का दीवाना पाया।


         पिछले कुछ सालों से वे सर्दियों में अपनी बहन के यहां कोलकाता चले जाते हैं। एक बार जब मैं वहां शाम को तत्व चिंतन के लिए पहुंचा तो धोती-कुर्ता पहने एक व्यक्ति को पाया। मेरे पूछने से पहले ही वे बोले- ‘आव, आव, ई हमार चाचा हउंवें। गांव से आइल बाड़न ।'


          मैंने कुछ देर बाद पूछ ही लिया- ‘क्या आपके चाचा या चकिया (बलिया) गांववालों को पता है कि आप देश के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं? क्या आपके घरवालों को पता है। कि वे किसके साथ रहते हैं?' 


          उन्होंने परेशान होकर टालने की गरज से कहा- 'ए भाई, तू बहुत बदमाश हो गईल बाड़। पिटइबअ का हो?'


          फिर थोड़ी चुप्पी के बाद कहा- ‘बतिया तोहार ठीके बात का कइल जाउ। इहे संसार ह।'


           फिर वे रवींद्रनाथ टैगोर की बातों में खो जाते हैं। कोलकाता एक तरह से उनका दूसरा घर बनता चला गया। जितने लोग उन्हें हिंदी में जानते हैं उससे ज्यादा दूसरी भारतीय भाषाओं में जानते हैं। महाश्वेता देवी, एन.टी. वासुदेव नायर, यू आर अनंत मूर्ति, गुंटूर शेजेंद्र शर्मा, दिलीप चित्रे, सीताकांत महापात्र, रघुवीर चौधरी, विजयदान देथा से लेकर मंदाक्रांता सेन तक दर्जनों बड़े लेखकों के अंतरंग कहानियों का पूरा संसार उनके आंगन में उतर आता है। वे बताते हैं कि जब इलाज के लिए टैगोर को स्पेशल ट्रेन में शांतिनिकेतन से कोलकाता ले जाया जा रहा था तो कैसे टैगोर एक-एक चीज को ऐसे देख रहे थे जैसे आखिरी बार देख रहे हों। कैसे उनकी भाभी कादंबरी ने आत्महत्या की। जब टैगोर की शवयात्रा निकली तो कोलकाता की सड़कों पर उमड़ा हुजूम कैसे टैगोर के एक-एक बाल तक नोच लेने पर आतुर था। मुझे लगता है कि केदार जी के भीतर कई शहर बसते हैं-कई शताब्दियाँ बसती हैं।


         पिछले हसे अचानक कई सालों बाद उनका घर आना हुआ। मैंने बहुत कोशिश करके इंडिया टुडे की साहित्य वार्षिकी के लिए बातचीत करने को उन्हें मनाया। उन्होंने पहली शर्त यही रखी कि ‘कुछो अनाप-शनाप मत छपिहअ।'


        वे ८३-८४ साल की उम्र में भी अभी भी अपने गांव जाने को तरसते रहते हैं। वहां अपना मकान तो है पर कौन ताला खोले, सफाई कराए, खाना बनाए। तो वे पट्टीदार की दालान में ही रह लेते हैं। जब वे चौकी पर सो रहे होते हैं तो क्या किसी को पता होता है कि देश का विश्वविख्यात कवि सो रहा है।


         वे कहते हैं- ‘गांव के जो लड़के पढ़-लिखकर बाहर चले गए, लेक़रार वगैरह बन गए वे जब गांव लौटते हैं और मुझे देखते हैं तो पहचान लेते हैं। ऐसा सोशल मीडिया और सिलेबस में मेरी कविताओं के शामिल होने से हुआ है।'


         “असंभव। जो जीवन मैंने जीया वह मेरे वश में नही था। मै तो पडरौना में प्रिंसीपली करके ही खुश था, यदि नामवर सिह ने मुझे जेएनयू न बुला लिया होता तो। पता नहीं इतना सब कैसे होता चला गया।'


          'अब तो साहित्य ही हाशिए पर चला गया है। इसमें कैसा लेखन-कैसी कविताई?' मैं निराश होकर पूछता हूँ।


         ‘देखो, समय बदल चुका है। आज देश में जो निजाम है और मैं चाहूं या न चाहूं, अभी यहीं निजाम रहनेवाला है, तो इस निजाम में साहित्य-संस्कृति के लिए कोई न तो जगह है न उम्मीद। पर देश भर में साहित्य लेखन बंद नहीं हुआ है। पर उसकी कोई बड़ी या सामूहिक उपस्थिति नहीं है। और यह सब सारी दुनिया में हुआ है। जिस रूस में एक से एक दिग्गज लेखक हुए, वहां आज क्या हालात हैं? ही सकता है कि भविष्य में कुछ नए तरह का साहित्य आए जिसके बारे में मैं अभी कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं। अच्छा भाई, अब बहुत हो चुका। अब मै चलूंगा।'


          दूसरे दिन मैं फोन करता हूं- ‘सर, इंडिया टुडे से फोटोग्राफर आनेवाला है। उसे कब बुलाऊं? कल दस बजे ठीक रहेगा?'


            'ए भाई, फोटो खिंचवावे के बा त तनी दाढी वाढी बना लेवे द। बारह बजे बोल द।'


             'अरे कौनों रंगीन करता पहिन लेव ना त सफेद करता में फोटो ठीक ना आई।'


             'तू बाड़ा आलतू फालतू बोले लागल बाड़।'


             बहुत मुश्किल से दूसरे दिन फोटो सेशन होता है।


              यहां मैं उनके बारे में उदय प्रकाश का लिखा हुआ सुप्रसिद्ध वाक्य याद करना चाहता हूं कि ‘क्या आइंस्टाइन का वह वाक्य याद नहीं आता जा गांधा जा के बारे में कहा था। क्या हिंदी कविता की धरती पर ऐसा आदमी भी चलता था! हद है कि हमने भी चलता था! हद है कि हमने उसे छुआ भी था। वे आग के कान में कोई मंत्र कहते हैं, और हमारे आपके लिए, हमारी आपकी भाषा में, हवा उसका अनुवाद करती जाती है।' (कथादेश. १९९८)


           उस समय उदय प्रकाश की टिप्पणी समझ में नहीं आई थी। आज केदारनाथ सिंह के संग साथ के बीस वर्ष बाद ठीक से समझ पा रहा हूं। क्या यह कम आश्चर्यजनक है कि आज हम केदारनाथ सिंह को छू सकते हैं, उनसे घंटों बतिया सकते हैं, आमने-सामने देख सकते हैं और कल जब वे नही होंगे तब विश्वास करना कठिन होगा कि हिंदी कविता की धरती पर कोई ऐसा आदमी भी चलता था!'


          फिलहाल तो केदारनाथ सिंह को उनके आनेवाले नए कविता संकलन के लिए बधाई देने का अवसर है।