कहानी - टूटता हुआ भय - बादशाह हुसैन रिज़वी

जन्म : १ अगस्त १९३७ सिद्धार्थ नगर के हल्लौर नामक गांव में। प्रगतिशील सोच के गंभीर लेखक। शिक्षा : बी.ए. ऑनर्स। कहानी संग्रह : टूटता हुआ भय, पीडा गनेसिया की, चार मेहराबों वाली दालान। उपन्यास : मैं मोहाजिर नहीं हूं। निधन : १८ जून २०१७, गोरखपुर।


                                                                            --------------------


.....उसके घाव बुरी तरह दु:ख रहे थे।


     फूस की उस छोटी सी झोपड़ी में सन्नाटा था। कुछ देर पहले बगीचे से डौंगी-पताई जो वहार-बटोर कर उसकी पत्नी लाई थी, चूल्हे के पास पड़ी थी। वच्चे डरे हुए, सहमी-सहमी आँखों से पिता की ओर देख रहे थे। पत्नी आमा हल्दी-प्याज और कड तेल गर्म कर उसकी देह पर मालिश कर रही थी। दर्द की टीस से वह रह-रह कर कराह उठता।


     पास के गाँव से वह शाम को मजूरी करके लौटा था कि मड़ई के बाहर से बाबू साहब के आदमियों ने उसे पुकारा। उसे लगा कि जैसे वे उसी की राह जोह रहे थे। वसुला, आरी और मैला सा थैला खाट पर रखा और बाहर आ गया।


     ...करे जियौना! बाबू साहव बुलवाये रहे, काहे नाहीं गए? वहुत चर्बी चढ़ गई है का?


    ...तनी मिठाई लाल हलवाई किहाँ काम रहि गवा रहा। चौखट मा दरवाजा लगावै का। उहीं गए रहेन। बस ई-तीन दिन मा...


     ....बाबू साहब की घारी गिरी पड़ी है। वैल खुले मा भीगत है। हथिया जोरों पर है। चल अब उहीं कहे।


    ...अब्बे हाथ-गोड़ धोय के जुरतै... ...


     चल...। बड़ी बात करत है। संतू ने उसे ठोका दिया। वह लड़खड़ा गया। उसने घबरा कर उसकी ओर देखा और चुप-चाप चल पड़ा।


    वे उसे साथ लिए हुए बाबू साहब के घर की ओर बढ़ने लगे। उसने कोई हुज्जत नहीं की। सर झुकाए चलता रहा। डेवढ़ी के बाहर बैठके में बाबू साहब लोगों से गप लड़ा रहे थे। दूर ही से उसने दोनों हाथ जोड़कर दण्डवत किया। उस पर नजर पड़ते ही वह झटके से खड़े जो गए।


  ...क्यों बे हरामी! कई बार बुलवाया, तू आया क्यों नहीं? तेरा दिमाग खराब हो गया क्या? मेरा काम करने में छाती फटती है?


   ...कमवा पूरा होय जाई मालिक! उनहोंने एक भरपूर हाथ उसके मुंह पर जड़ दिया। वह लड़खड़ा गया और गिरते-गिरते बचा। उनका हाथ फिर हवा में लहराया।


    ...यह मेरी तरफ देख क्या रहा है वे ! साले मैं खूव समझता हूं, तुम लोगों का दिमाग फिर गया हैसारी शेखी घुसेड़ दूंगा। वह बेचैनी से अपना होंठ चबाने लगेजैसे उसकी वोटी चवा रहे हों।...कमीना... साला...। धड़-धड़ कई लात-घूसे वह बरसाते चले गए।' '... ले जाओ इसे।' गुस्से में उन्होंने एक भारी ठोकर लगाई और सिरवार की ओर देखकर इशारा किया। मालिक का इशारा मिलते ही वे सब उस पर टूट पड़े और घसीटते हुए बाहर ले आए।


   ...बेटा! चुपाई मारे विहानै आयके वलहन कर देव, । नाहि तो फिर तुहीं जानेव...।


   उसके होंठ फट गए थे और नाक से भी खून बह रहा था। धोती के टोंगे स उसने खून पोंछ लिया। कुछ देर तक हवेली के बाहर खड़ा फटी-फटी आंखों से देखता रहा। स्वतः उसकी मोटी-खुरदुरी उंगलियां कसती चली गई। सिर को झटक कर अपने से बड़बड़ाता हुआ वह चल पड़ा।


    |...मुफ्त में काम करो, गाली-मार ऊपर से। कौनो इनके दबायल बसायन भी नाहीं। पहिले डेढ़ बीघा जमीन, जब बाबा जियत रहे हर-ज्वाठा, पट्टी-पाटी बनाने के एवज में मिली रही। उहौ नदी के किनारे। हर साल बाढ़ बहाय ले जात रही! बीया-मेहनत उलटे से दण्ड। कबका उहौ छोड़ दिया है। तब्बौ जब देखो तबै...।


    उसे याद आया इसी तरह बल्कि इससे भी ज्यादा बुरी तरह उसके बाप को भी इनके पिता ने पीटा था। वावा को पिटते हुए वह देखता रहा था। कर ही क्या सकता था। दो-एक बार अपने में वह तड़पा भी था। गाली भी निकल गई थी मुँह से। उसे याद आया...बाबा गिड़गिड़ाते रहे, दुहाई देते रहे, लेकिन बड़के बाबू साहब का हाथ दना दन हंटर बरसाता रहा था। उस दिन भी गलती कुछ नहीं थीबाबू साहब की चौकी का मचवा दरक गया था। बाबा बीमार थे। उन्हें जर आ रहा था। तीन-चार दिन देरी हो गई, नहीं जा सके थे। बस इसी पर...। अपनी चोट में वह अपने बाबा का भी दर्द महसूस करके और भी बेचैन हो गया।


   ...आह ! वस...यही ! थोड़ा और मल दो। अ... हां! कराहते हुए उसने पत्नी से कहा और करवट बदल लीउसकी पत्नी ने हल्दी वाली कटोरी नीचे सरका दी और चुपचाप उसी के पैताने बैठी रहीउसकी आंखों से बहते हुए आंसू अब सूख गए थे।...ऊ सब देखत है। उहै समझिहै। भवानी लूटा...।' पत्नी ने आसमान की ओर हाथ उठाकर कोसा। साड़ी के मैले आंचल से वह नाक पोंछने लगी।


    लेटे-लेटे सिर उठाकर उसने देखा छोटकी, मुनिया के पास पड़ी, रोते-रोते सो गई थी। दोनों लड़के अब भी जाग रहे थे।


    ...बच्चे भूखे सूत जइहैं। रूखा-सूखा कुछ नाय ले। उसकी पत्नी खाट से उठी और चूल्हे के पास जाकर सुपेला ढूंढने लगी।


    ...सुपेलवा कहां गा-रे ननकुआ। उसने बड़े लड़के को पुकारा और घड़ा-उबहन उठा कर बाहर कुएं पर पानी लाने के लिए बढ़ गई।


    वह बेसुध सा पड़ा रहा। उस अंधेरी मडैया में अंधेरा कुछ और घना हो गया था। ढिबरी की कांपती-सी लौ पर आंखें गड़ाए वह शून्य में घूरता रहा। पत्नी धुएं में लिपटी हुई, गीली लकड़ी को जलाने की कोशिश में फेंक मारतेमारते निढाल हो गई थी। उसने उठना चाहा लेकिन सर के दर्द से बेहाल होकर पड़ा रहा।


     इर्द-गिर्द की झोपड़ियों में अभी ‘सोउता' नहीं पड़ा था। उनकी बातचीत से उसे लगा लोग-बाग अभी जाग रहे हैं।...उसकी आंखों ने देखा था जब वह बाबू साहब के आदमियों से घिरा हुआ जा रहा था तब ये लोग बाहर खड़े-खड़े तमाशाई की तरह उसे देख रहे थे। लौटा, तब भी किसी की आवाज नहीं फूटी। कुछ पूछा भी नहीं किसी ने। पर यह कोई आज ही की बात तो नहीं। यह तो वरावर रहा है। उसे याद आया ऐसा ही तव भी हुआ था जब रामफेर की बहिन और लौटन की लौंडिया को ठाकुर ने अपने आदमियों से जबदस्ती उठवा लिया था। उलटे उसके घर वालों को पीटा था, छप्पर भी फुकवा दिया था और भगेलू, फतूले, लोहरा और गुन्नी के साथ क्या हुआ था? एक साथ ढेर सारे जख्मों के टांके खुल गए थे। दर्द की शिद्दत से वह छाती को मसलने लगा।


    बच्चे कच्चा-पक्का जो कुछ मिला, खा-पी कर सो गए थे। उसने कुछ खाया-पिया नहीं। पत्नी फिर से उसके पांव में तेल मलने के लिए बढ़ी तो उसने मना कर दिया। ...हम खाब नाहीं! तू अपना खाये के सो जा।' ...रात काटे से नहीं कट रही थी। एक तो चोट की तकलीफ दूसरे नींद भी कोसों दूर थी। फिर भी रात काटनी थी। सो-जाग कर कट गई।


    सवेरे यह उठना नहीं चाहता था। पोर-पोर टूट रहा था। वह थोड़ा आराम चाहता था पर काम की चिन्ता ने उसे तड़के उठा दिया। अभी सूरज की लाल-लाल टिकिया ऊपर सरक रही थी तभी वह सीवान से फारिंग हो आया। वाहर ठण्डी हवा के झोकों ने उसे चुस्त और तरो ताजा बना दिया। लौटते समय उसने देखा लोग अपने-अपने कामों पर निकल पड़े थे। दो-एक ने चलते-चलते उसकी ओर देखा, जैसे आंखों ही आंखों में उसका हाल-चाल पूछा हो। पर बाबू साहब के आतंक से एक पल रुक कर दो टोक बात करने की किसी में हिम्मत नहीं थी। फिर से उसके अन्दर वही कडुआहट-सी भर गई । मैदान से लौटकर वह भी अपनी आरी वसुला संभालने लगा। तभी बाहर से किसी की आवाज सुनाई पड़ी।'...राम जियावन काका!' ...राम जियावन काका मिस्त्री की डली सी कोई चीज उसके अन्दर घुलती चली गई। जिऔना नहीं, राम जियावन काका! इस सम्बोधन पर वह अन्दर ही अन्दर मुग्ध हो उठा। लपका हुआ वह बाहर आ गया। देखा अनोखे लाल जी थेइलाके के नामी नेता हाथ जोड़ कर वह उनके सामने खड़ा हो गया।


    ...राम-राम काका! इधर आना हुआ तो साचा तनी जियावन काका से मिल लेई । सुना है कल बाबू साहव ने आपको बहुत मारा-पीटा है और धमकी दी है'


     वीरान आंखों में दर्द की तडप लिए, जिनमें आंसू भी झिल-मिला रहे थे, उसने देखा और गर्दन झुका ली।


      ‘मुझे सब पता है काका! चुप बैठने से काम नहीं चलेगा। बहुत हो चुका। आप हमारे साथ चलो। कोई मजाक नहीं। नहीं मौका था नहीं गए। वह जमाना लद गया। अदालत है, कचहरी है। आप दबना मत। बाकी हम देख लेंगे।' नेता की बातें उसे फाहे की तरह लग रही थीं और उसे काफी हद तक उवार गई। उसे लगा अनोखे जी ने उसके दिल की बातें सुन ली हैं।


      यह भी कुछ ऐसा ही सोच रहा था। वेगार करो और ऊपर से लात भी खाओ... हुंह...।'


      रोज-रोज की फजीहत से वह तंग आ गया था '... नेता ठीकै कहत है। वड़ी पहुंच वाले हैं। हाकिम परगना, कलकट्टर सवै काँपत है। दरोगा तहसीलदार की तो कौनो गिनती नहीं।'


     नेता को साथ लिए वह सवेरे ही निकल पड़ानेता ने ही सबसे पहले डाक्टरी मुलाहजा करा लेने की सलाह दी थीउन्हीं के नाते डाक्टर ने तुरंत ही बुला लिया। पहले गांव फिर बाबू साहब का नाम सुनते ही डाक्टर चिहुंक गया। बोला-‘नेता जी! जरा में बहुत जल्दी में हूं। बाहर मरीज देखने जा रहा हूं। फिर कभी। ...अच्छा... और मोटर साईकिल पर बैठ के फुर्र से चल दिया। नेता ने कुछ सोचते हुए मुस्कराकर गर्दन झुका ली। जियावन ठगा हुआ-सा उनकी ओर देखने लगा।


    '...ई तो बाबू साहब किहां बहुत आवत है। जियावन ने दिमाग पर जोर डालकर कहा।'


    ...तुमने पहले क्यों नहीं बताया। ठीक है, चलो कल सवेरे निकल चलते हैं। जिला अस्पताल में ही मुआयना हो जाएगा। रिपोर्ट भी सीधे एस.पी. के यहाँ दिला देंगे। ...बकिन वहां तो खर्चा बढ़ जाई ।


     .....बकिन वहां तो खर्चा बढ़ जाई ।


     ...काका! खर्चा तो पडता ही है...इसकी कहां तक फिकर करोगे ?


    थका-हारा मायूस होकर शाम तक वह घर लौट आया। पत्नी से बात किए बिना चुप-चाप खाट पर आकर पड़ गया। अपनी थकान और सर की चोट को भूलकर वह आज पूरे दिन के बेकार जाने के बारे में सोचने लगा। उसने सोचा काम ही पर निकल गया होता हो आज की मजूरी खरी हो जाती। ऊपर से साढ़े आठ रुपए मुफ्त में गल गए। वह मन ही मन हिसाब जोड़ने लगा। सुबह जगलाल की दुकान पर जिलेबी, तीन बार चाय नमकीन, दो पैकेट सिगरेट, पान ! अब अपने काम पर केहूका लेइ जाओ, त अपन मुंह बांध के तो नाहीं रही। कुछ देर बाद पत्नी ने गुड़ की काली सी चाय माटी की कोसिया में उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा...काम पर नाहीं गयो रहेव का? मिठाई लाल के बड़े बेटवा आए रहें। बहुत बिगड़त रहे। सवेरे काम पर जरूर से बुलाय गए हैं।'


     '...बाबू साहब के मनई आज दोई बेर आय भए हैं। ईही ओर देखत रहे।


    हूंक-फूक कर वह चाय सुड़कता रहा और पत्नी अपनी रौ में बोलती जा रही थी। चाय पीकर उसने कोसिया पत्नी को थमा दी और धोती के बूंट से तम्बाकू निकाल कर अंगूठे से हथेली पर मलने लगा। पति को किसी गहरी चिन्ता में देखकर वह फिर अन्दर चली गई। उसकी सोचों का सिलसिला जारी रहा।



         '...जेको मन मा आबत है पीट के धय देत है। जब जी मा आयी रगेद देहैं। केहू चू नाहीं कई सकत । के नाहीं आवज, समै तो पहुंचे रहत है। एक से एक ऊंचे अधिकारी बड़बर के नेता। सभै...अब इस चक्कर में फंसे तो फिर ...' तुम्हें भी मिटा देगा...गरीब आदमी की इज्जत कैसी? ...उसके अन्दर सदियों से बैठे हुए डर ने उसे चेतावनी भरी सलाह दी और वह अन्दर से सिहर उठा। लगातार बेचैनी में वह करवटें बदलता रहा। वह कब सोया था उसे याद नहीं। हां सुकउवा जब निकला था तब वह जाग रहा था।


     अन्दर का भय, पैसों की मजबूरी या उस दिन की मजदूरी का ख्याल करके उसने वहुत सवेरे अपने औजार संभाले और थैला उठाए मड़ई के बाहर आ गया। कुछ देर वह अनिश्चय की स्थिति में खड़ा कुछ सोचता रहा था कि अपनी मड़ई के सामने आते हुए सिपाही को देखकर वह ठिठक गया। गांव के चौकीदार के बताने पर सिपाही ने डपट कर उसे इशारे से अपने पास बुलाया- ‘दरोगा जी बुला रहे हैं। कबसे बैठे हैं...। जल्दी चल।'


      '...देख क्या रहा है...। चलता है या तेरी मां...सर झुकाए, चुपचाप वह सिपाही के पीछे चलने लगा।


      ...ई कौन आफत आय गई? कुछ उसकी समझ में नहीं आ रहा था। कौन खता हो गई...? भयाक्रान्त वह बढ़ता रहा। सिपाही बाबू साहब की हवेली की ओर मुड़ा तो उसका माथा ठनका। दूर ही से उसने देखा बाबू साहब की लम्बी सी दालान कई लोगों से भरी हुई थी। वहां चाय पान का दौर चल रहा था। उस भीड़ में अपने नेता अनोखे लाल जी को देखकर उसे थोड़ी ढाढस महसूस हुई, सोचा चलो कम से कम इहां अपने नेता तो है ही!


      उस पर नजर पड़ते ही वावू साहव चाय छोड़कर खड़े हो गए


    ...दारोगा जी यही है हरामजादा जिऔना! मेरी खरही फेंकने जा रहा था। आप देखना चाहें तो मौके पे चलकर देख थोड़ी ही फंक पाया था कि हमारे आदमियों ने दौड़ा कर पकड़ लिया। उलटे अपने ही झगड़ने लगा। इस पर तमाम शोर करता फिर रहा है। डाक्टर के यहाँ मुआयना करने गया था मादर...मुकदमा करेगा मुझ पर।


     ...एकदम हक्का-बक्का सा वह देखता रहा। वह कहना चाहता था... ‘सरकार ई सब झूठ है। अपने मारा- पीटा, कूच के धर दिया, अब फसावत है। बेगारी नाहीं किया तो अब उल्टै सतावत है। मगर उसकी आवाज हलक में फंसी रह गई। जन्म से बन्द जबान चाहने पर भी नहीं खुल सकी। फटी-फटी आंखों से देखता, दोनों हाथ जोड़े, मूक, वह खड़ा रहा।


    '...साले बदमाशी छोड़ दो वर्ना उठाकर भीतर कर दूंगा सारी हैकड़ी निकल जाएगी' दरोगा ने एक भद्दी सी गाली दी और अपना हण्टर हवा में लहरा कर दन से पीठ पर छोड़ दिया। वह चोट से बिलबिला उठा और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा। दरोगा ने उसकी गिड़गिड़ाहट पर कोई ध्यान नहीं दियाउंगलियों में फंसी सिगरेट से लंवा कश खींचते हुए वह मुड़े।


    '...अच्छा बाबू साहब मैं चलता हूं। आपने रपट लिखा दी है न! ठीक है। कोई जरूरत होगी तो वताइएगा। वैसे मैं समझता हूं इतना काफी होगा...।'


     डेवढ़ी के बड़े फाटक से होते हुए दरोगा जी बाहर आ गए। लगभग सभी लोग उन्हीं के साथ-साथ चलने लगे। चौकीदार उनकी साईकिल थामे पीछे-पीछे चल रहा था। उन्हीं में अपना नेता भी चला गया। नेता की चुप्पी देखकर उसे बड़ा धक्का लगा। कुछ बोलना, पक्ष लेना तो दूर एक बार उसकी ओर देखा भी नहीं उसने। अभी कल ही कैसी-कैसी बातें कर रहे थे। अब क्या हो गया। अपनी मार और दरोगा जी की धमकी भूलकर वह उन्हीं के बारे में सोचने लगा।


    ...तुम उसे दो कौड़ी के नेता पर झूल रहे थे न, बुलाओ! अब बुलाते क्यों नहीं? उसे तो टुकड़ा चाहिए... टुकड़ा। उसी कुत्ते ने बरगलाया था न! हड्डी चाहता था मिल गई...अब साला दुम हिला रहा है।' उन्होंने जोर का ठहाका लगाया और अन्दर जाते हुए हिकारत से देखकर बोले-तुम सब साले जूते के आदमी हो, जब तक यह नहीं मिलता, अपनी औकात भूल जाते हो।


    दोनों हाथ जमीन पर टेककर वह खड़ा हो गया। उसने कपड़ों पर से धूल, घुटनों, दाढ़ी और नाक से बहुत हुए खून को पोंछा और नफरत भरी दृष्टि से देखता बाहर आ गया।


   वह घर लौटा तो रात हो चुकी थी। पत्नी ढिवरी के सामने बैठी उसकी राह देख रही थी। फटा हुआ कुर्ता, उलझे बाल, माथे का बड़ा सा गुरमा और दाहिनी तरफ होंठ से दाढ़ी तक जमी हुई खून की लकीर, सब कुछ कहे दे रही थी। देखते ही उसकी पत्नी ढाढे मार कर रो पड़ी और हाथ उठा-उठा कर कोसने लगी।


    राम जियावन चुप-चाप खाट पर आंखें मूदे पड़ा रहागांव के दक्खिन की ओर वह छोटी-सी बस्ती ! सभी छप्परों में भयानक सन्नाटा था। लगता था कुछ हुआ ही नहीं। सब एक-दूसरे से अलग-अलग अपनी-अपनी दुनियाओं में मग्न थे। राम जियावन सोच रहा था, वही हुआ जिसका डर था...ई अलग-अलग इसी तरह कब तक हमें पीटा जाता रहेगा? वह अपना नेता कैसी बातें कर रहा था, वह भी दगा दे गया। दोगला कहीं का। इन दोगलन से बचै का चाही, मास्टर साहब ठीकै कहत रहें। प्राइमरी स्कूल के मास्टर की कही बात उसे याद आ गई जो उन्होंने रसफेरवा को समझाते हुए एक दिन कहा था।


   ...सूत गयो हो! कुछ देर बाद पत्नी ने पुकारा तो वह चौक पड़ा।


   ...खयीकवा काढी! भिनहियों तो तनिए-एक खायो रहा...


    '...लेई आओ! बिन खाए कैसे काम चली। और वह पानी का लोटा उठाकर हाथ-मुंह धोने बाहर चला गया।


   दूसरा कोई होता तो इतनी मार खाने के बाद दो दिन घर ही में पड़ा रहता। मगर राम जियावन को पता था चोट सहलाने से काम नहीं चलेगा। काफी सबेरे अपना थैला संभाले वह घर से निकल पड़ा। कुछ सोचते हुए यों ही देर तक मड़ई के सामने खड़ा रहा फिर तेजी से वह मिठाई लाल के घर की ओर चल पड़ा


    दोपहर से दिन ढल गया था फिर भी वह काम में उसी तन्मयता से जुटा रहा। '...का है उस्ताद ! सुना है बाबू साहब की हां कल फिर तलबी भयी रही?'


    उसने कुछ उत्तर नहीं दिया और सिर झुकाए उसी तेजी से काम में लगा रहा।


    ...अरे तब किए चूक होय गई। साला खुर्राट लछमिनिया का उठवाय लिहिस रहा। रमफेरवा तो ओकी बोटी-बोटी काट के फेंक देत। पर हमी लोगन मा एक से एक गांडू हैं, फूट गए। जाय के वताय दिहिन नाहीं तो तबै पता लाग जात बच्चा का। ई-है रही त कौनो दिन आपै मजा चीखी ले हैं।


    बाबू साहब का नाम सुनते ही उसके कानों में कुछ जोर-जोर से बजने लगा। उसने कुछ कहा नहीं। लकड़ी के एक बड़े से कुन्दे को आरी से काटते हुए उसे लगा सहसा उसके हाथ चलाने की रफ्तार तेज हो गई है। तेज-तेज और तेज। उसके हाथ चलते रहे, गर्दन भी उसी हिसाब से हिलती रही। ...लकड़ी का वह कुन्दा अब अचानक एक सिर में बदल गया उसे पता नहीं चला। ख्याल आते ही उसने झटके से आरी खींच ली। फटीफटी आंखों से कटे हुए कुन्दे की ओर देखा और आरी के दांतों पर अंगुली फिराते हुए एक किनारे रख दिया


    अब उसने बसुला उठा लिया था और पल्ले के लिए शीशम के पटरे को चिकना बनाने के लिए बसुला चलाने लगा।


    खरं...खरं, खर...तेज-तेज और तेज। एक के बाद एक। छाल उघढ़ती और गिर-गिर कर ऐंठती रही। अचानक उसे लगा उसने छाल नहीं किसी की खाल उधेड़ कर रख दी हो। घबरा कर उसने बसुला चलाना बन्द कर दिया। वह पसीने में बुरी तरह नहा गया था। वसुला एक किनारे रखकर अंगोछे से पसीना पोंछा और गट-गट लोटा भर पानी खींच कर पी गया।


     उसने अब फिर बसुला उठा लिया था। उसके सघे हुए हाथ तेजी से नई ताजगी और स्फूर्ति से काम में हुट गए थे। छिलके पर छिलका उधेड़ते हुए उसे लगा कि बरसों से अपने अन्दर जमी भय की पर्वो को वह एक-एक कर उधेड़ता चला जा रहा है।