कविता  - भटकते हुए - राहुल कुमार बोयल 

कविता  - भटकते हुए - राहुल कुमार बोयल 


 


भटकते हुए


 


जब-जब भी पानी को प्रेम से पुकारा


वह नदी की तरह लहराते हुए मिलने आया


जब भी अग्नि का नरमी से जिक्र किया


उसने धूप बनकर मेरी पीठ को सहलाया


हवा पर जब भी कभी स्नेह का स्पर्श रखा


उसने सुगंध बनकर सब ओर विस्तार पाया


उस दिन जाने क्या होगा


जब तुम्हारा नाम लेकर तुम्हे आवाज़ दूंगा मैं !


अहा! विस्मय की पराकाष्ठा होगी


कि प्रेम में गहरी आस्था?


सुनो! मुझे अपना पता कभी मत बताना


मैं भटकते हुए पहुँचना चाहता हूँ तुम तक


नदी की तरह


धूप की तरह


सुगंध की तरह।


                                                                                                                                    राहुल कुमार बोयल  मो.नं. : ७७२६०६०२८७